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चालू खाते का घाटा और हमारे प्रयास

नितिन देसाई /  September 24, 2018

चालू खाते के घाटे की खस्ता होती स्थिति के बारे में पिछले कुछ समय से चर्चा चल रही है लेकिन सरकार ने इस बारे में केवल तभी प्रतिक्रिया दी जब रुपये की कीमतों में आ रही गिरावट सुर्खियां बनने लगी। उसने ऐसा शायद इसलिए क्योंकि चुनावी साल में वह इसके राजनीतिक असर को लेकर चिंतित थी और उसे कुछ करते हुए दिखना था। सरकार ने कुछ उपायों की घोषणा की। अगर रुपये की विनिमय दर में आ रही गिरावट को थामने में मदद मिली तो इन उपायों को सफल करार दिया जाएगा। 

कई अर्थशास्त्रियों का कहना है कि रुपये को अपना स्तर तलाशने देना चाहिए ताकि रुपये में अवमूल्यन का लाभ निर्यात को मिले और आयात को हतोत्साहित किया जाए। ऐसा करने से चालू खाते के घाटे कोकम करने में मदद मिलेगी। परंतु इन दिनों विनिमय दर का निर्धारण पूंजी प्रवाह से भी उतना ही होता है जितना कि व्यापार असंतुलन और बाजार के अनुमान से। घटती विनिमय दर नए और मौजूदा विदेशी निवेशकों को हतोत्साहित करती है क्योंकि इसका असर घरेलू प्रतिफल दर पर पड़ता है। नीति निर्माता विनिमय दर को निशाना बनाते हैं क्योंकि शायद वे पूंजी के बहिर्गमन का जोखिम नहीं उठाना चाहते।

बहरहाल, विनिमय दर केवल एक उपाय है। वास्तविक लक्ष्य तो चालू खाते के घाटे में कमी लाना ही होना चाहिए। यह घाटा गत वर्ष के जीडीपी के 1.9 फीसदी के स्तर से बढक़र इस वर्ष 2.8 फीसदी हो जाने का अनुमान है। यह घाटा घरेलू परिवारों, उद्यमों और सरकार के व्यय और उनकी अर्जित आय में असंतुलन को दर्शाता है। यानी चालू खाते के घाटे को कम करने पर केंद्रित किसी भी उपाय का प्रभाव घरेलू व्यय और आय का असंतुलन कम करने के रूप में दिखना चाहिए।

चालू खाते के घाटे को कम करने का सबसे बेहतर तरीका यह है कि निर्यात को बढ़ावा दिया जाए। इससे आय व्यय का अंतर कम होगा और वृद्धि को गति मिलेगी। तेजी के वर्षों में देश के निर्यात की तेज वृद्धि रही। यह वह दौर था जब दुनिया की अर्थव्यवस्था 4 फीसदी से अधिक की दर से बढ़ रही थी। यह सिलसिला 2008 के संकट के बाद भी जारी रहा। वर्ष 2006 में वैश्विक निर्यात के एक फीसदी से बढक़र 2013 में इसकी मात्रा 1.7 फीसदी हो गई। तब से वैश्विक निर्यात में भारत की हिस्सेदारी स्थिर है।

निर्यात वाली व्यवस्था पर काम करना संभव है। अमेरिका में वृद्धि की वापसी हुई है और वह चीन से होने वाले निर्यात को लेकर कड़े कदम उठा रहा है। इससे हमारे निर्यातकों के लिए अवसर तैयार होगा। ये अल्पकालिक उपाय हैं जो सरकार लॉजिस्टिक्स और निर्यात को वित्तीय मदद मुहैया करने में कर सकती है। इसमें जीएसटी का सहज रिफंड भी शामिल है। परंतु जिन उपायों की घोषणा की गई वे बहुत सीमित हैं। 

पैकेज में संभवत: उच्च टैरिफ के साथ आयात कम करने पर जोर दिया गया है। इसका लक्ष्य उन उत्पादों को निशाना बनाना है जिनकी उपलब्धता कम होने का असर घरेलू उत्पादन पर नहीं पड़ेगा। देश के आयात का 60 से 65 फीसदी हिस्सा गैर प्रतिस्पर्धी कच्चे माल और कलपुर्जों का है। इसमें वह कच्चा माल शामिल है जो हमारे पास नहीं है। उदाहरण के लिए कच्चा तेल। कलपुर्जों में सेलफोन के हिस्से शामिल हैं जो देश में ज्यादा नहीं बनते। करीब 20 फीसदी पूंजीगत वस्तुएं ऐसी हैं जिनको सरकार इस डर से नहीं छुएगी कि इससे निवेश पर बुरा असर होगा। निवेश में सुधार इस समय सरकार का प्रमुख लक्ष्य है। ऐसे में 10 फीसदी आयात बचता है जिसमें उपभोक्ता वस्तुएं शामिल हैं। सरकार उच्च शुल्क के साथ इनके आयात को सीमित करने की कोशिश कर सकती है।

बहरहाल, सरकार को पहले उदार धनविप्रेषण योजना के जरिये बाहर जाने वाली राशि पर ध्यान देना चाहिए। गत वर्ष इससे करीब 1,100 करोड़ डॉलर की राशि बाहर गई। इसका बड़ा हिस्सा यात्रा, उपहार और शिक्षा या रिश्तेदारों को देने में व्यय हुआ। इसे करों या सीमा को कम करके सीमित किया जा सकता है। इसका उत्पादकता पर भी कोई बुरा असर नहीं होगा। विनिर्माताओं पर शुल्क बढ़ाने का असर उत्पादन लागत और भारतीय उद्योग की वैश्विक प्रतिस्पर्धी क्षमता पर पड़ सकता है।

असली समस्या तीसरी श्रेणी के उपायों से है जो इस तरह डिजाइन किए गए हैं कि भारतीय निगमों को विदेशी ऋण लेने और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों को देश के डेट बाजार में निवेश के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। इससे चालू खाते का घाटा कम करने में मदद नहीं मिलेगी।

मौजूदा हालात में जीडीपी की तुलना में घाटे में प्रति एक फीसदी बढ़ोतरी की भरपाई के लिए हमें 200 करोड़ डॉलर की अंतरराष्ट्रीय मुद्रा की आवक की आवश्यकता है। ईरान पर लगे प्रतिबंध के कारण कच्चे तेल की कीमत दबाव में है। अगर उनमें प्रति बैरल 10 डॉलर की और बढ़ोतरी होती है तो मौजूदा आयात के हिसाब से रोजाना 1,500 करोड़ डॉलर का बोझ बढ़ेगा। ये अनुमान मौजूदा आवक के अलावा हैं।

उधारी में रियायत मौजूदा पैकेज के मूल में है। सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि विदेशी मुद्रा में ऋण लेने वाले को अपने भविष्य की जवाबदेही की हेजिंग नहीं करनी होगी। इससे प्रीमियम लागत में 4-5 फीसदी की बचत होती है लेकिन जोखिम कम नहीं होता। अपने कर्ज की स्थिति को लेकर चिंतित निगम ऐसा नहीं करेंगे। जो लोग इस रियायत का लाभ लेंगे वे अदूरदर्शी होंगे। मसाला बॉन्ड की बात करें तो भारतीय बैंक गारंटर के रूप में सामने आएंगे और कॉर्पोरेट ऋण में विदेशी पोर्टफोलियो निवेश के लिए व्यापक गुंजाइश होगी।

हाल में आई पूंजी के विरुद्ध अतिरिक्त उधारी के स्तर पर विचार कीजिए। भुगतान संतुलन के आंकड़ों के मुताबिक बीते पांच साल में वाणिज्यिक ऋण की औसत शुद्ध आवक 50.7 करोड़ डॉलर रही और पोर्टफोलियो निवेश 1,450 करोड़ डॉलर रहा। बीते दो वर्षों में रुपये के दबदबे वाले मसाला बॉन्ड से 50 करोड़ रुपये जुटे। 

इस वर्ष ये बढक़र 2,000 करोड़ डॉलर कैसे होंगे? अगर यह संभव हो भी तो क्या पहले ही संकट से जूझ रहे बैंकों और अत्यधिक नकदी वाले निगमों को इस कर्ज के बोझ तले डालना उचित होगा? साफ कहा जाए तो हम शायद एक नए एनपीए संकट की ओर बढ़ रहे हैं। चालू खाते के घाटे को कम करने के उपाय व्यापारिक असंतुलन कम करने पर केंद्रित रहने चाहिए। सैद्धांतिक तौर पर ऐसा निर्यात की सुविधा और एफडीआई के माध्यम से होना चाहिए। इससे वैश्विक पूंजी बाजार अधिक प्रभावित होगा, बजाय कि ऋण को शिथिल बनाने के मौजूदा प्रयासों से।
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