बिजनेस स्टैंडर्ड - नियमन की नाकामी
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नियमन की नाकामी

संपादकीय /  September 24, 2018

इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशियल सर्विसेज लिमिटेड (आईएलऐंडएफएस) का मौजूदा संकट समूचे वित्तीय क्षेत्र को प्रभावित कर सकता है। इसके लिए उसके ऋण का जटिल ढांचा तथा उसकी ढांचागत विशेषताएं भी आंशिक तौर पर उत्तरदायी हैं। कंपनी ने अनेक अनुषंगियों की मदद से दीर्घावधि की कई परियोजनाओं को ऋण दिया। उसने इसकी फंडिंग उच्च दर वाले ऋण से भी की।

समस्या यह है कि कई बार परिपक्वता को लेकर चूक हो सकती है। दीर्घावधि के प्रतिफल अल्पावधि के ऋण से फंड किए जाते हैं। यह अस्थिर हो सकता है और कारोबारी चक्र की मंदी से आसानी से प्रभावित हो सकता है।  आईएलऐंडएफएस की मजबूत क्रेडिट रेटिंग को देखते हुए पूंजी बाजार के कई फंडों ने इसमें व्यापक तौर पर रुचि दिखाई।

अब वह रेटिंग किसी काम की नहीं रह गई है। ऐसे में इस कंपनी के ढहने या दिवालिया प्रक्रिया से गुजरने का जोखिम पैदा हो गया है जिसने समूचे वित्तीय बाजार को प्रभावित किया है। मूडीज का अनुमान है कि इसका बैंक ऋण जोखिम, बैंकों के कुल ऋण का 0.5 से 0.7 फीसदी है। जबकि उसके बकाया डिबेंचर और वाणिज्यिक पत्र क्रमश: घरेलू कॉर्पोरेट ऋण बाजार के एक प्रतिशत और दो प्रतिशत के बराबर हैं।

जो फंड इस कंपनी के नुकसान की भरपाई कर रहे हैं वे अन्य परिसंपत्तियों की बिक्री कर सकते हैं, इससे बाजार में अफरातफरी पैदा हो सकती है। ऋण के वितरण को लेकर काफी व्यापक अनिश्चितता का माहौल है। इसका असर ऋण प्रक्रिया पर भी पड़ सकता है। 

प्राथमिकता तो यह सुनिश्चित करना होनी चाहिए कि इस कंपनी के अंशधारक पर्याप्त फंड मुहैया कराएं ताकि अल्पावधि की नकदी बहाल हो सके। फिलहाल यही बड़ी समस्या है। इस हालत की काफी जिम्मेदारी उन पर है। आखिर संकटग्रस्त संस्थानों की जोखिम प्रबंधन समिति की बैठक बीते तीन वर्ष में केवल एक बार हुई है।

इसके बावजूद भारतीय वित्तीय क्षेत्र के लिए इसके व्यापक सबक भी सीखे जाने चाहिए। एक सबक तो यही है कि अब तक यह मुख्य प्रश्न अनुत्तरित है कि आखिर बुनियादी विकास को वित्तीय मदद किस तरह मुहैया कराई जाए। सरकार के पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। लंबी अवधि के बैंक ऋण नए नियामकीय तंत्र के आगमन के बाद समाप्तप्राय हैं।

गैर बैंकिंग वित्तीय सेवा प्रदाताओं की अपनी अलग समस्याएं हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि राष्ट्रीय बुनियादी निवेश फंड जैसे नए ढांचों की शुरुआत धीमी है। अब वित्तीय संस्थानों के विकास की धारणा पर विचार किया जाए और यह देखा जाए कि क्या वे बुनियादी ढांचा क्षेत्र की फंडिंग की समस्या के हल का हिस्सा बन सकते हैं। 

यह भी स्पष्ट है कि आईएलऐंडएफएस को इस स्थिति तक पहुंचना ही नहीं था जहां एक व्यवस्थित जोखिम शुरू हो गया था। भारतीय रिजर्व बैंक को बहुत पहले हस्तक्षेप करना चाहिए था। एक नियामकीय संस्था भी है जिसका काम है आईएलऐंडएफएस जैसे बहुक्षेत्रीय संस्थानों के जोखिम का प्रबंधन करना।

यह है वित्तीय स्थिरता एवं विकास परिषद (एफएसडीसी)। इसे समूचे वित्तीय क्षेत्र के सर्वोच्च नियामक के रूप में डिजाइन किया गया था। यह जरूरतों को पूरा करने में नाकाम रही है और अन्य नियामकों के लिए रबर स्टैंप बनकर रह गई है। उदाहरण के लिए देश की सबसे बड़ी बीमा कंपनी द्वारा एक नाकाम बैंक को खरीदने का मामला एफएसडीसी के लिए एकदम सही मामला था लेकिन उस पर शायद ही चर्चा हुई। यह पर्याप्त नहीं है।

सरकार ने हाल ही में परिषद की सदस्य संख्या बढ़ाई है लेकिन जरूरत पूर्णकालिक सदस्यों की संख्या, स्वतंत्र क्षमता बढ़ाने और वित्त मंत्री के बजाय इसे एक स्वतंत्र मुखिया प्रदान करने की है। कमजोर नियमन और समन्वय की कीमत देश की अर्थव्यवस्था को चुकानी पड़ रही है।

Keyword: debenture, Infrastructure, IL&FS, Financial Crisis, company, Debt, Fund,
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