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छोटे, सुंदर और किफायती हैं नए मोबाइल टावर

सुरजीत दास गुप्ता /  September 23, 2018

जब आप चंडीगढ़ में प्रवेश करते हैं तो सडक़ के किनारे नजर आने वाला बड़ा ट्यूलिप या हैदराबाद में एक विला के बगल में उसकी सुंदरता बढ़ाता ताड़ का पेड़ असल में मोबाइल टावर हैं। इन्हें मोनोपोल टावर (बिजली के खंभे के समान) कहना ज्यादा उचित होगा। 

रिलायंस जियो देशभर में अपनी 4जी सेवाओं के लिए ऐसे नए टावर लगा रही है। जियो ऐसे टावर लगाने में सबसे पहले उतरी है। वह पुराने भद्दे टावरों को छिपाने के लिए यह प्रयोग कर रही है। ये वास्तविक पौधे या पेड़ नहीं हैं, बल्कि यह जियो और टावर क्षेत्र की कंपनियों इंडस टावर, एटीसी और भारती इन्फ्राटेल का टावरों को सुंदर बनाने का प्रयोग है। 

लेकिन मोनोपोल टावरों में सुंदरता के अलावा भी कई खासियत हैं। इन्हें चलाने के लिए जेनरेटर की जरूरत नहीं है क्योंकि इन्हें केवल 750 वाट बिजली की जरूरत होती है। यह बिजली बैटरियों का एक पैक मुहैया कराता है। यह परंपरागत मोबाइल टावरों से अलग है, जिनमें 2.5 किलोवाट बिजली की जरूरत होती है। नए टावरों में बिजली बहुत कम खर्च होती है और न ही ये प्रदूषण फैलाते हैं। न ही इनमें बिजली उपकरणों को रखने के लिए शेल्टर या एयर कंडीशनर की जरूरत होती है। सभी उपकरण खंभे के अंदर के खाली स्थान में लगे होते हैं। 

जगह के लिहाज से 30 मीटर ऊंचे टावर को केवल दो मीटर जगह की जरूरत होती है, जबकि पुराने टावरों के लिए 50 गुना अधिक जगह की जरूरत होती है। इससे जगह के लिए लाइसेंस फीस में काफी बचत होगी।  नए टावर प्रीफैब्रिकेटेड मैटेरियल से बने हैं। इन टावरों को महज 5 से 6 घंटे में लगाया जा सकता है, जबकि पुराने टावरों को लगाने में कई दिन लगते थे। नए टावर लगाने में आने-जाने वाले लोगों को कोई परेशानी नहीं होती।

जो चीज इन्हें पहले के टावरों से और ज्यादा अलग करती है, वह इनकी अन्य कार्यों में उपयोगिता है। इनका इस्तेमाल बहुत सी गैर-दूरसंचार सेवाओं जैसे गली की लाइट लगाने, यातायात नियंत्रण के लिए कैमरे लगाने और हवा की गुणवत्ता की निगरानी के लिए उपकरण लगाने में किया जा सकता है। इन्हें बनाना सस्ता पड़ता है। ऐसे प्रत्येक टावर की लागत करीब 10 लाख रुपये आती है, जो जमीन पर लगने वाले पुराने टावर की लागत 20 से 25 लाख और छत पर लगने वाले टावर की लागत 12 से 15 लाख रुपये से कम है। 

निस्संदेह उनकी रेंज कम होती है यानी वे कम दूरी तक नेटवर्क मुहैया कराते हैं। यह स्पेक्ट्रम के आधार पर 300 से 500 मीटर होती है। यही वजह है कि इनमें बिजली की खपत कम है। पुराने और बड़े टावरों की रेंज पांच किलोमीटर है। मोनोपोल टावरों में फाइबर बैकहॉल की जरूरत होती है ताकि वे 4जी प्लेटफॉर्म (और बाद में 5जी पर) सृजित होने वाले डेटा का प्रबंधन कर सके। बैकहॉल के लिए ई और वी बैंड जैसे नए वायलेस विकल्पों पर विचार किया जा रहा है। हालांकि सरकार ने अभी यह फैसला नहीं किया है कि इनकी नीलामी की जाए या इन्हें मामूली फीस पर मुहैया कराए। 

स्पेक्ट्रम की कम फ्रिक्वेंसी बेहतर कवरेज मुहैया कराती है और इसे ध्यान में रखते हुए ही पुराने टावरों को डिजाइन किया गया था। हालांकि वे ज्यादा क्षमता और गति के लिए उपयुक्त नहीं हैं। इस वजह से वे दूरसंचार कंपनियों के लिए बिल्कुल उपयुक्त थे। उस समय उनकी रणनीति अपने नेटवर्क कवरेज का विस्तार कर वॉयस कॉल इस्तेमाल करने वाले ज्यादा से ज्यादा ग्राहक हासिल करना थी। लेकिन 4जी से डेटा क्रांति और आगे 5जी आने से पूरा खेल बदल गया है। दूरसंचार कंपनियों को 5जी (4जी से 100 गुना तेज) सेवाएं देने के लिए बड़ी मात्रा में स्पेक्ट्रम की जरूरत होगी। यह केवल उच्च बैंड 3.2 गीगाहट्र्ज से 3.8 गीगाहट्र्ज के बीच उपलब्ध है। 

ये फ्रिक्वेंसी कवरेज नहीं देती हैं, मगर उनमें तेज रफ्तार से बड़ी मात्रा में डेटा को संभालने की क्षमता होती है और यही डेटा क्रांति के लिए सबसे जरूरी है। इसलिए छोटे टावर यह काम यानी सीमित दायरे में ज्यादा डेटा को संभालने का काम करते हैं। हालांकि कम ग्राहकों को सेवाएं देते हैं। एक पुराना टावर जितने ग्राहकों को सेवाएं देता है, उतने ग्राहकों को सेवाएं देने के लिए अधिक नए टावरों की जरूरत होगी।

सेल्यूलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के महानिदेशक राजन एस मैथ्यूज ने कहा, ‘इस समय छोटे टावरों की संख्या 5 फीसदी से अधिक नहीं है। लेकिन हमारा अनुमान है कि अगले 2-3 वर्षों में ये 30 से 40 फीसदी हो जाएंगे। आगे हमें यह देखने को मिलेगा कि बड़े टावर कवरेज मुहैया कराएंगे और छोटे टावर क्षमता मुहैया कराएंगे। टावर कंपनियों का अनुमान है कि पूरे देश में 4जी नेटवर्क के लिए ही 2.5 लाख से 5 लाख के बीच अतिरिक्त टावरों की जरूरत होगी। उनमें से ज्यादातर छोटी रेंज के टावर होंगे। इस समय देश में 5,71,000 टावर हैं। 

क्या इससे टावर कंपनियों के लिए कारोबारी मॉडल बदल जाएगा? इस समय दूरसंचार कंपनियां इंडस टावर्स जैसी स्वतंत्र टावर कंपनियों द्वारा लगाए जाने वाले टावरों को किराये पर लेती हैं। अगर जियो और अन्य दूरसंचार कंपनियां खुद के मोनोपॉल टावर लगाने का फैसला लेती हैं तो क्या होगा? भारत में एक बड़ी टावर कंपनी के शीर्ष कार्याधिकारी ने कहा, ‘छोटे टावर आसानी से कम से कम दो किरायेदारों को सेवाएं दे सकते हैं। अब इस बाजार में केवल तीन कंपनियां हैं, जिनमें से एक के खुद के टावर हैं। हां, किराये कम हो सकते हैं क्योंकि इनमें कम निवेश की जरूरत होती है। हालांकि यह इसलिए बराबर हो जाएगा क्योंकि अब ज्यादा टावरों की जरूरत होगी।’
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