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म्युचुअल फंडों में निवेश होगा अब और भी सस्ता

जयदीप घोष और संजय कुमार सिंह /  September 23, 2018

म्युचुअल फंडों के खर्च अनुपात पर भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) लगातार चिंता जताता रहा है और इस अनुपात को घटाने के लिए पिछले एक दशक के दौरान उसने कई कदम भी उठाए हैं। इसलिए इन खर्चों पर और भी कैंची चलाने तथा अग्रिम कमीशन पर रोक लगाने जैसे उसके हालिया निर्णयों पर किसी को कोई अचंभा नहीं होना चाहिए।

सेबी के इन दिशानिर्देशों से खर्च अनुपात में और भी कमी आ जाएगी। कमी कितनी होती है, यह योजना के आकार पर निर्भर करेगा। इस उद्योग से जुड़े लोगों का अनुमान है कि 10 अरब रुपये से 300 अरब रुपये तक की योजनाओं में इस निर्देश के कारण खर्च अनुपात 10 आधार अंक से लेकर 30 आधार अंक तक कम हो जाएगा। लंबी अवधि के लिए रकम लगाने वाले निवेशकों के नजरिये से यह कमी अच्छी खासी है।

अभी तक इक्विटी म्युचुअल फंड ज्यादा से ज्यादा 2.50 फीसदी कमीशन दे सकते थे। अब इसकी सीमा घटाकर 2.25 फीसदी कर दी गई है यानी इससे अधिक कमीशन नहीं दिया जा सकता। मॉर्निंगस्टार इन्वेस्टमेंट एडवाइजर इंडिया के निदेशक (प्रबंधक अनुसंधान) कौस्तुभ बेलापुरकर ने कहा, ‘खर्च अनुपात में कमी निवेशकों के लिए अच्छी बात है।

निवेश पर उन्हें जो लागत देनी पड़ती है, वह इस कदम के बाद घटेगी और उनका प्रतिफल बढ़ जाएगा।’ हालांकि इक्विटी और डेट दोनों ही प्रकार के फंडों के खर्च अनुपात में कमी की गई है, लेकिन इक्विटी फंडों पर इनका अधिक असर होगा।

विशेषज्ञों की मानी जाए तो अग्रिम कमीशन खत्म करना सेबी का अच्छा कदम है। बेलापुरकर कहते हैं, ‘अभी तक अगर कोई वितरक ग्राहक को हर साल बदल देता था तो उसे अग्रिम कमीशन भी मिलता था और ट्रेल कमीशन भी उसकी जेब में हर साल पहुंच जाता था। अब अग्रिम कमीशन खत्म कर दिया गया है तो वितरक के लिए ग्राहक बदलने का कोई फायदा नहीं होगा।’

एडलवाइस म्युचुअल फंड में मुख्य कार्याधिकारी राधिका गुप्ता ने कहा, ‘अग्रिम कमीशन को खत्म कर  देना और पूरी तरह से ट्रेल मॉडल को अपनाना बहुत अच्छा कदम है और यह प्रोत्साहन का बेहतर मॉडल है। इससे ग्राहक लंबी अवधि के लिए संपत्तियां तैयार करने के वास्ते प्रोत्साहित होते हैं। वितरक साझेदार फंड से जुड़ा रहेगा और उसे प्रबंधनाधीन संपत्ति में वृद्धि का पूरा फायदा मिलेगा।’

इससे पहले कुछ फंड हाउस केवल ट्रेल मॉडल ही अपनाते थे और दूसरे फंड हाउस अग्रिम और ट्रेल दोनों मॉडलों पर चलते थे। लेकिन सेबी के नए फैसले के बाद अब सभी फंडों को पूरी तरह से ट्रेल मॉडल पर ही चलने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। म्युचुअल फंडों पर अनुसंधान करने वाली दिल्ली की एजेंसी वैल्यू रिसर्च के मुख्य कार्याधिकारी धीरेंद्र कुमार को लगता है कि सेबी के निर्देश के बाद भी यह बदलाव बहुत आसान और सुगम नहीं होगा। उनका कहना है कि कुछ अरसे तक फंड कंपनियों को इससे परेशानी हो सकती है। लेकिन वह मानते हैं कि इस कदम से पारदर्शिता बहुत अधिक बढ़ जाएगी। 

इससे भी अहम बात यह है कि अब फंड हाउस अब केवल योजना से ही खर्च अनुपात का भुगतान कर सकते हैं। उन्हें संपत्ति प्रबंधन कंपनी अथवा एसोसिएट या प्रायोजक अथवा न्यासी से भुगतान करने की इजाजत नहीं मिलेगी। इससे डायरेक्ट प्लान पहले की तुलना में सस्ते हो जाएंगे।

कुमार इसे समझाते हुए कहते हैं, ‘सेबी के वर्तमान नियम कहते हैं कि डायरेक्ट प्लान का खर्च अनुपात नियमित प्लान में से बिक्री अथवा वितरण की लागत घटाने के बाद ही तय किया जाना चाहिए। लेकिन संपत्ति प्रबंधन कंपनियां बिक्री अथवा वितरण पर होने वाले खर्च का कुछ हिस्सा अपने पास से चुका रही हैं, इसलिए इस लागत में किसी तरह की पारदर्शिता नहीं है। इस कारण डायरेक्ट प्लान में निवेश करने वालों को पूरा फायदा नहीं मिल पा रहा था। मगर अब यह पूरा खर्च योजना ही उठाएगी, जिससे वितरण खर्च अथवा लागत पर और भी स्पष्टïता होगी। इस तरह डायरेक्ट प्लान में निवेश करने वालों को और भी फायदा होगा।’

Keyword: Sebi, Plan, Sales, Mutual Fund, Investment, Share market,
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