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रेरा की राह में क्यों नजर आ रहा रोड़ा

करण चौधरी और ईशिता आयान दत्त /  September 23, 2018

आंकड़े खुद बयां करते हैं। अब तक महज 10 राज्यों और 5 केंद्र शासित प्रदेशों ने ही रियल एस्टेट एवं अपील ट्रिब्यूनल की स्थापना की है। जबकि दो-तिहाई से भी कम राज्यों में इसका पोर्टल पूरी तरह परिचालन में है।

रियल एस्टेट विनियामक प्राधिकरण (रेरा) की स्थापना के लिए रियल एस्टेट (विनियमन एवं विकास) अधिनियम 2016 को 1 मई, 2017 से प्रभावी बनाया गया था। हालांकि इस कानून के प्रभावी होने के 15 महीने बाद भी देश में रियल एस्टेट क्षेत्र के लेनदेन में कोई खास बदलाव नहीं आया है। विशेषज्ञों का कहना है कि खासतौर पर इस कानून को लेकर कुछ राज्यों की निष्क्रियता और ट्रिब्यूनल की स्थापना में हो रही देरी के कारण इसके प्रभाव पर असर पड़ रहा है। इसके कुछ प्रावधानों को नजरअंदाज किए जाने से केंद्र सरकार अधिनियमित इस मॉडल कानून की मूल भावना प्रभावित हो रही है। निर्माणाधीन परियोजनाओं की परिभाषा में बदलाव और कई प्रमुख प्रावधानों को राज्यों ने इस कानून के दायरे से बाहर रखा है।

उद्योग प्रतिभागियों के अनुसार, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों ने निर्माणाधीन परियोजनाओं की परिभाषा को कमजोर करने के लिए कुछ अपवादों को जोड़ दिया है। यहां तक कि महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे सक्रिय राज्यों ने भी कुछ परियोजनाओं को रियल एस्टेट विनियामक प्राधिकरण यानी रेरा के तहत पंजीकृत होने से छूट देने की घोषणा की है। एनारॉक प्रॉपर्टी कंसल्टेंट्ïस के चेयरमैन अनुज पुरी ने कहा, ‘निर्माणाधीन परियोजना की परिभाषा में बदलाव किए जाने से बड़ी तादाद में परियोजनाएं रेरा के दायरे से बाहर जो गई हैं और खरीदारों के लिए यह एक बड़ी चिंता की बात है।’

विशेषज्ञों ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा तैयार इस कानून में विभिन्न राज्यों ने शुरू में तमाम बदलाव सुझाए थे। उदाहरण के लिए, कुछ राज्यों ने डेवलपरों के कारावास से संबंधित जुर्माना प्रावधानों में बदलाव किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि नकद जुर्माने की गणना से संबंधित प्रावधानों में भी बदलाव किया गया है। इसके अलावा ढांचागत खामियों के मामलों में दायित्व के साथ-साथ डेवलपरों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने के लिए शुल्क में भी कुछ राज्यों ने बदलाव किया है।

नाइट फ्रैंक इंडिया के कार्यकारी निदेशक (अनुसंधान) अरविंद नंदन ने कहा, ‘रेरा के लिए केंद्र सरकार की दृष्टिï के बावजूद विभिन्न राज्यों में इसका कार्यान्वयन लक्ष्य के करीब नहीं है।’ उन्होंने कहा कि अधिकतर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने अद्र्ध-कार्यान्वयन का रास्ता अपनाया है जिससे एक प्रभावी विनियामक की स्थापना नहीं हो सकती।

कुछ राज्यों में परियोजनाओं के पंजीकरण के लिए अंतिम समय-सीमा में विस्तार दिए जाने की बात की जा रही है। परियोजनाओं के पंजीकरण में देरी होने से कार्यात्मक पोर्टल के जरिये ग्राहकों तक सूचनाओं की आपूर्ति बाधित हो रही है। उन्होंने कहा कि अब तक महज 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने कार्यात्मक पोर्टल तैयार किया है और उसमें भी बहुत सारी सूचनाओं में असमानता दिख रही है।

करीबी नजर डालने पर पता चलता है कि अधिकतर राज्यों ने ‘अंतरिम’ प्राधिकरण की स्थापना के बाद स्थायी नियामक के गठन के मोर्चे पर फिलहाल इंतजार करने की रणनीति अपनाई है। केंद्र सरकार के इस कानून के तहत तात्कालिक व्यवस्था के लिए ‘अंतरिम’ प्राधिकरण स्थापित करने की परिकल्पना की गई है। एनारॉक के अनुसार, रेरा फिलहाल महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और पंजाब में ही पूरी तरह प्रभावी हो पाया है। इन राज्यों में महाराष्ट्र सबसे अधिक सक्रिय दिख रहा है। देश भर में रेरा के तहत पंजीकृत कुल करीब 25,000 परियोजनाओं में से दो-तिहाई परियोजनाएं केवल महाराष्ट्र में हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि सूचना परक पोर्टल तैयार करने, परियोजनाओं के पंजीकरण में सावधानी और हालिया फैसलों जैसे महारेरा (महाराष्ट्र रेरा) की सक्रियता से निर्माणाधीन परियोजनाओं में खरीदारों की धारणा पुनस्र्थापित करने और निर्माण विकास प्रक्रिया की पेचीदगियों से निपटने में सफलता मिली है। अपनी स्थापना के बाद से अब तक महारेरा ने 1,000 से अधिक मामलों को निपटाया है। कुछ मामलों में शिकायत दर्ज किए जाने के महज 30 दिनों के भीतर फैसले दिए गए हैं।

नंदन ने कहा, ‘मामलों को योग्यता के आधार पर निपटाने के साथ ही महारेरा त्वरित निपटान तंत्र संबंधी ग्राहकों की उम्मीदों पर खरा उतरा है। इसके अलावा वह ग्राहकों के प्रति रियल एस्टेट डेवलपरों के नजरिये में उल्लेखनीय बदलाव लाने में सफल रहा है।’ उन्होंने कहा कि इससे सबक लेते हुए कर्नाटक भी 60 से अधिक मामलों को तत्काल निपटाते हुए उसी दिशा में अग्रसर है।

बहरहाल, रेरा के लिए अंतरिम विनियमन वले राज्यों में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और बिहार शामिल हैं। हालांकि पश्चिम बंगाल में अभी इसकी शुरुआत नहीं हो पाई है लेकिन इस कानून को लागू करने के लिए महाराष्ट्र एवं कर्नाटक मॉडल का अध्ययन करने के लिए एक समिति गठित की गई है। मिजोरम, मणिपुर, नगालैंड, मेघालय जैसे पूर्वोत्तर राज्यों में स्थानीय भूमि कानून की जटिलताओं के कारण रेरा कानून को लागू करना अभी बाकी है।
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