बिजनेस स्टैंडर्ड - बोर्ड निदेशकों को जानने की मुहिम
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बोर्ड निदेशकों को जानने की मुहिम

सुदीप्त दे और वीणा मणि /  September 23, 2018

इसकी शुरुआत शेल कंपनियों के प्रसार पर अंकुश लगाने और व्यवस्था का दुरुपयोग करने वाले कंपनी बोर्डों के जालसाजों पर नजर रखने के लिए की गई थी। कंपनी मामलों के मंत्रालय ने जुलाई में निदेशक पहचान संख्या (डीआईएन) धारकों के ब्योरों के सत्यापन के लिए नई केवाईसी प्रक्रिया की घोषणा की थी। 

हालांकि इस दो महीने की मुहिम के अंतिम चरण में निदेशकों ने शिकायत की कि यह दवा बीमारी से भी खराब रही है। बहुत सी कंपनियों में लंबे समय तक बोर्ड सदस्य रह चुके अरुण दुग्गल ने कहा, ‘केवाईसी प्रक्रिया विशेष रूप से अंतिम कुछ सप्ताह में जटिल और अव्यवस्थित थी।’ उन्होंने कहा कि इसमें विदेशी निदेशकों को और भी ज्यादा दिक्कतें आई हैं। मंत्रालय को उद्योग के दबाव के चलते पिछले सप्ताह निदेशकों को अपनी निदेशक पहचान संख्या अद्यतन करने के लिए 15 दिन का अतिरिक्त समय देना पड़ा। 

सभी हितधारक इस बात से सहमत हैं कि इस मुहिम से कंपनियों के नियमों का पालन करने और नियामकों के निगरानी करने में सुधार आएगा। हालांकि बहुत से निदेशकों के लिए ई-केवाईसी को पूरा करना चुनौतीपूर्ण रहा। भारतीय कंपनी सचिव संस्थान के अध्यक्ष मकरंद लेले ने कहा, ‘केवाईसी प्रक्रिया के तहत प्रत्येक निदेशक के लिए डिजिटल हस्ताक्षर रखना जरूरी है। हालांकि डिजिटल हस्ताक्षर लेने में समय लगता है।’ विशेषज्ञों ने कहा कि वीडियो सत्यापन की अनिवार्यता से यह प्रक्रिया और जटिल बनी। 

लेले ने कहा कि विदेशी निवेशकों को विभिन्न सबूत जुटाने और उनके सत्यान में कई दिन लगते हैं। उन्होंने कहा, ‘विदेशी निदेशकों के लिए ओटीपी हासिल करना एक वास्तविक समस्या है।’ बहुत अधिक यात्रा करने वाले बहुत से निदेशकों, विशेष रूप से उद्यमियों और उद्योगपतियों को रास्ते में ओटीपी हासिल करने में दिक्कत आई।  

हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि बहुत से निदेशकों के ब्योरा न मुहैया कराने की वजह अनुपालना को लेकर उनका रुख और संभवतया उनकी अज्ञानता हो सकती है। खेतान ऐंड कंपनी में पार्टनर कल्पना उनाडकट ने कहा, ‘वे कंपनियां, जिनमें अनुपालना के लिए अच्छी टीम नहीं हैं, उनके अंतिम तिथि तक केवाईसी प्रक्रिया पूरी न करने के आसार हैं।’

नांगिया एडवाइजर्स के निदेशक सुमित नायब ने कहा कि जो निदेशक पैन, आधार, मोबाइल नंबर, ईमेल आईडी और डिजिटल हस्ताक्षर जैसे अपने अहम ब्योरे निदेशक पहचान संख्या (डीआईएन) से नहीं जोडऩा चाहते हैं, उन्हें केवाईसी प्रक्रिया जटिल लगेगी। उनमें से बहुत से निदेशकों के अपने डीआईएन ब्योरों के फिर से सत्यापन के लिए आगे नहीं आने के आसार हैं। उन्होंने कहा कि केवाईसी की पालना नहीं करने वाले निदेशकों की संख्या अधिक होने की वजह डीआईएन को वापस करने से संबंधित नियमों की शर्तें कड़ी होना भी हो सकता है। 

जिन कंपनियों के बोर्ड में डीआईएन सत्यापन नहीं कराने वाला निदेशक होगा तो उनके कामकाज पर कोई असर नहीं पड़ेगा। नायब  ने कहा, ‘डीआईआर 3केवाईसी (ई-फॉर्म) नहीं भरने से केवल डीआईएन निष्क्रिय होगा और निदेशक वर्तमान कंपनियों को चलाने में अयोग्य नहीं होंगे।’

लॉ फर्म एसएस राणा ऐंड कंपनी में प्रबंध सहयोगी लूसी राणा ने कहा कि निष्क्रिय डीआईएन को फिर से सक्रिय कराया जा सकता है। इसके लिए ई-फॉर्म भरना होगा और कंपनी (पंजीकरण कार्यालय एवं फीस) नियम, 2014 के तहत उल्लिखत अतिरिक्त फीस का भुगतान करना होगा। 

हालांकि हालिया कार्यवाही एवं अयोग्यता से निदेशक भविष्य में किसी गलती से बचेंगे। उनाडकट ने कहा, ‘सभी कंपनियों के बोर्ड निदेशक अनुपालनाओं को गंभीरता से लेने को बाध्य होंगे।’ कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि काले धन को सफेद बनाने की गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए निदेशकों के लिए केवाईसी को जरूरी बनाने में कुछ नया नहीं है। ऐसा वैश्विक स्तर पर भी होता है। सिंगापुर और ऑस्ट्रेलिया समेत बहुत से देशों में निदेशकों के लिए केवाईसी अनिवार्य है। विशेषज्ञों ने कहा कि ऑस्ट्रेलिया ने धन शोधन निरोधक कानूनों में बदलाव किया है, लेकिन निदेशकों से केवाईसी ब्योरे लेना ऐच्छिक है। 

हालांकि दुग्गल इस दृष्टिकोण से सहमत नहीं हैं। वह कहते हैं, ‘मुझे नहीं पता कि अन्य किसी देश में बोर्ड सदस्यों के लिए इतनी जटिल केवाईसी प्रक्रिया है।’ उनका सुझाव यह है कि सरकार को पेशेवरों की एक समिति बनानी चाहिए, जो केवाईसी व्यवस्था को आसान और प्रभावी बना सके और इसके हर साल दोहराव की जरूरत न पड़े। उन्होंने कहा, ‘कोई नया नियम बनाने में सबसे प्रमुखता इस चीज को दी जानी चाहिए कि क्या इससे ईमानदार, योग्य और उपयुक्त लोग कंपनियों के बोर्डों से जुडऩे से विमुख होंगे और इससे कंपनियों को चलाने की व्यवस्था कमजोर होगी।’

ज्यादातर विशेषज्ञों का मानना है कि शुरुआती अड़चनों के बावजूद निदेशकों के लिए केवाईसी में बदलावों के हाल के चरण से बोर्ड व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही आएगी। लेले ने कहा, ‘असली परीक्षा यह होगी कि सरकारी एजेंसियां कितने बेहतर तरीके से अनुपालनाओं को लागू कर पाती हैं।’
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