बिजनेस स्टैंडर्ड - मोदी सरकार ने गंवा दी बौद्धिक संपदा और गति
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Tuesday, October 23, 2018 07:15 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

मोदी सरकार ने गंवा दी बौद्धिक संपदा और गति

शेखर गुप्ता /  September 23, 2018

एक वर्ष पहले एकदम सुनिश्चित नजर आ रहा मोदी सरकार का दूसरा कार्यकाल अब दूर की कौड़ी नजर आ रहा है। इसकी वजह एकदम साफ हैं। शुरुआत करते हैं तीन सवालों से। पहला, क्या नरेंद्र मोदी सरकार प्रतिभा के खिलाफ है? दूसरा, अगर हां तो क्या यह बीते सात दशकों की सबसे अधिक प्रतिभा विरोधी सरकार है? और तीसरा, क्या मोदी, भाजपा और मतदाताओं को वाकई इस बात से कोई फर्क पड़ता है? पहले और दूसरे प्रश्न का उत्तर तो हां है। तीसरे सवाल के जवाब पर अवश्य बहस हो सकती है, बशर्ते कि आधारभूत बातें स्थापित हो जाएं।

सबसे पहले कैबिनेट की बात करते हैं। आप समझ सकते हैं कि यह मोटे तौर पर अनुभवहीन लोगों से बनी है। भाजपा 10 वर्ष तक सत्ता से बाहर रही और वाजपेयी की कैबिनेट के अधिकांश सहयोगी बुजुर्ग होकर मार्गदर्शक मंडल में पहुंच चुके थे। राजनाथ सिंह, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज और अनंत कुमार जैसे अपेक्षाकृत युवा चेहरों को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया। नितिन गडकरी के पास अपने राज्य में बुनियादी विकास की दिशा में काम करने का अनुभव है।

पीयूष गोयल कड़ी मेहनत करने वाले मंत्री हैं और प्राय: चार या पांच विभाग उनके पास रहे आए हैं। इनके अलावा आपको मोदी सरकार के 10 मंत्रियों के नाम भी याद नहीं आएंगे। मैंने पत्रकारिता के छात्रों से लेकर ब्लूचिप कंपनियों के सीईओ तक विविध श्रोताओं को संबोधित करते हुए अक्सर उनसे यह पूछा है कि अब जबकि मोदी सरकार अपने कार्यकाल के पांचवें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है, क्या आप देश के कृषि मंत्री का नाम बता सकते हैं? आज तक किसी ने इसका जवाब नहीं दिया। अगर आप बताएं कि उनका नाम राधा मोहन सिंह है तो सामने से प्रश्न आता है कि ये हैं कौन? 

सवाल अच्छा है लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है कि वह कौन हैं। हकीकत तो यह है कि उनके कार्यकाल में औसत कृषि विकास दर संप्रग के कृषि मंत्री शरद पवार के कार्यकाल की तुलना में आधी है। प्रधानमंत्री ने 2017 में वादा किया था कि 2022 तक किसानों की आय को दोगुना किया जाएगा।

इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए हरित क्रांति जैसा कोई कदम जरूरी है। इसके बजाय हमारा देश तो कृषि शोध समेत विज्ञान को ही नकारने में लगा है। जब तक इन चीजों को ठीक नहीं किया जाता है तब तक देश को कृषि प्रयोगशालाओं से नई तरह के प्रतिभा पलायन का सामना करना होगा। जाहिर है गाय के गोबर, गोमूत्र और वैदिक जैविक खेती के क्षेत्र में शोध करने में कोई खास भविष्य नहीं है।

जब इंदिरा गांधी हरित क्रांति चाहती थीं तो उन्होंने सी सुब्रमण्यम जैसे काबिल और आधुनिक सोच वाले व्यक्ति को कृषि मंत्री बनाया। इस सरकार में ऐसा कौन है जो दूसरी हरित क्रांति की दिशा में ले जा सके? कृषि मंत्रालय अन्य क्षेत्रों की स्थिति का बढिय़ा रूपक है। लोगों से सवाल जवाब के दौरान जब मैंने स्वास्थ्य, रसायन एवं उर्वरक, भारी उद्योग, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, सामाजिक न्याय और लघु उद्योग मंत्रियों के बारे में पूछा तो समान प्रतिक्रिया मिली। इसमें दो राय नहीं कि मौजूदा मंत्रिमंडल अब तक के इतिहास का सबसे अधिक नाम और चेहराविहीन मंत्रालय है।

अगर प्रधानमंत्री के पास एक अच्छी टीम होती तो भी ठीक था, क्योंकि सभी तरह के संचालन, विचार और क्रियान्वयन वहीं से होते हैं। उनके पास यकीनन कुशल और समर्पित नौकरशाह हैं लेकिन रचनात्मकता का क्या? निश्चित रूप से प्रधानमंत्री एक श्रेष्ठ व्यक्ति हैं। जैसा कि वह कहते हैं, वह देश के तमाम जिलों की यात्रा कर चुके हैं। परंतु एक महानतम नेता भी महाद्वीप के आकार के देश के बारे में सबकुछ नहीं सोच सकता।

यह केवल संयोग नहीं हो सकता है कि प्रधानमंत्री के इर्दगिर्द मौजूद तमाम सलाहकार या चर्चा समूह समाप्त कर दिए गए हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड (एनएसएबी) में केवल पांच सदस्य हैं और यह अतीत की छाया रह गया है। अतीत में यह एक प्रमुख रणनीतिक संगठन था जो राष्ट्रीय नीतियां बनाता था।

मसौदा परमाणु सिद्धांत उनमें से एक है। इसमें सार्वजनिक बौद्धिकों से लेकर रणनीतिक विचारक तक सदस्य थे। अब इसके सदस्य मनमाने ढंग से अपने हित के क्षेत्र में काम करते हैं। बड़ी अटल बिहारी वाजपेयी और ब्रजेश मिश्रा की बहस और संबद्धता, विचारों की उर्वरता की परंपरा समाप्त हो चुकी है। नया छोटा एनएसएबी केवल राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को रिपोर्ट करता है।

प्रधानमंत्री और कैबिनेट की दो वैज्ञानिक सलाहकार परिषद रुक-रुक कर काम कर रही हैं। मोदी सरकार ने अपना प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार सरकार का पांचवां वर्ष करीब आने पर नियुक्त किया। इस पद पर एक प्रमुख वैज्ञानिक को बिठाया गया लेकिन इसका दर्जा राज्य मंत्री से सचिव का कर दिया गया।

इससे पहले जब प्रसिद्ध वैज्ञानिक आर चिदंबरम ने एपीजे अब्दुल कलाम का स्थान लिया था तब भी इसका दर्जा कैबिनेट मंत्री से घटाकर राज्य मंत्री किया गया था। प्रधानमंत्री की वैज्ञानिक सलाहकार परिषद की अध्यक्षता पहले भारत रत्न सीएनआर राव के पास थी। अब यह लगभग निष्क्रिय है।

मोदी सरकार ने चार साल में चार अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा वाले अर्थशास्त्रियों में से तीन गंवा दिए। ये हैं रघुराम राजन, अरविंद पानगडिय़ा और अरविंद सुब्रमण्यन। चौथे, आरबीआई के मौजूदा गवर्नर ऊर्जित पटेल नोटबंदी जैसी शर्मिंदगी के बाद सरकारी अनुपालन छोडक़र, किसी तरह पेशेवर प्रतिष्ठा और संगठनात्मक स्वायत्तता के लिए जूझ रहे हैं। 

नोटबंदी के बाद जब अर्थव्यवस्था संघर्ष कर रही थी तब इस सरकार ने जोरशोर से प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद को दोबारा शुरू किया। प्रधानमंत्री इस परिषद से मिलते तक नहीं। वह केवल सरकार में शामिल दो प्रमुखों विवेक देवरॉय और पूर्व आईएएस तथा व्यय सचिव रतन वाटल से मिलते हैं। शेष चार की कोई उपादेयता नहीं। प्रधानमंत्री के लिए अधिकांश रिपोर्ट यही दो लोग तैयार करते हैं और मेरी जानकारी में इन रिपोर्ट को बाकी लोगों से साझा नहीं किया जाता। यह पूरी तरह अंदरूनी लोगों की सरकार है।

काबिलियत की कोई कद्र नहीं है। हमें इस बात को तभी समझ जाना चाहिए था जब प्रधानमंत्री ने उत्तर प्रदेश के चुनाव प्रचार में कहा था कि  हार्डवर्क (कड़ी मेहनत) से हार्वर्ड को पीछे छोड़ा जा सकता है। हकीकत यह है कि हार्वर्ड में दाखिला लेने के लिए कड़ी मेहनत लगती है और अगर सरकार खुले विचारों की है तो वह हार्वर्ड, एमआईटी, येल और यहां तक कि जेएनयू से बेहतरीन लोगों को अपने साथ जोड़ सकती है।

आश्चर्य नहीं हुआ जब सरकार ने मुख्य आर्थिक सलाहकार सुब्रमण्यन के पद छोडऩे के बाद इस पद की न्यूनतम अर्हता ही घटा दी। अब इस पद को संभालने के लिए आर्थिक विषयों में डॉक्टरेट जरूरी नहीं रही। मोदी और शाह दोनों को लगता है कि अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली पिछली कैबिनेट पूरी तरह उनकी पार्टी की नहीं थी। अब उनके पास बहुमत है वे किसी बाहरी को जगह देना नहीं चाहते, भले ही वह कितना भी प्रतिभाशाली हो।

यहां तीसरा सवाल पैदा होता है। क्या मतदाता को इन बातों से फर्क पड़ता है? अच्छे नेताओं के पास बेहतरीन दिमाग भी होता है। परंतु उनका दिल भी बड़ा होता है। इंदिरा गांधी भी अपनी सरकार अपने कार्यालय से चलाती थीं लेकिन उनके आसपास प्रतिभाशाली लोगों का जमावड़ा था। रोनाल्ड रीगन आकर्षक व्यक्तित्व और शानदार वक्ता थे लेकिन बौद्धिक नहीं। उन्होंने भी बेहद प्रतिभाशाली आर्थिक और रणनीतिक टीम बनाई और शीतयुद्ध में जीत हासिल की।

मोदी और शाह को शायद लगता है कि उन्हें जो चाहिए वह पार्टी में ही मौजूद है। परंतु हर तरह के संसाधन सीमित होते हैं। मोदी सरकार की बौद्धिक संपदा तीसरे वर्ष तक समाप्त हो गई। सरकार ने सुधार के जो कदम वापस लिए हैं, वे इस बारे में काफी कुछ बताते हैं। उनमें पहला है चिकित्सा शिक्षा सुधार विधेयक। नीति आयोग ने चार वर्ष में इसका मसौदा तैयार किया था। दूसरा मामला है निजी कंपनियों को कोयला खदान बेचने का।

इन बातों से पता चलता है कि मोदी सरकार किन परिस्थितियों से दो चार है। प्रमुख क्षेत्रों में ठहराव आ गया है, सरकार अपनी गति खो रही है, बार-बार चिढ़ नजर आ रही है। रक्षा मंत्री जायज सवाल पूछने पर भी जिस तरह पत्रकारों को झिडक़ रही हैं, वैसा मैंने पहले नहीं देखा। यही वजह है कि मोदी सरकार का दूसरा कार्यकाल जो साल भर पहले तय नजर आ रहा था वह अब दूर की कौड़ी नजर आ रहा है।

Keyword: naredra modi, PM, Prime Minister, Intellectual property, Cabinet, Ministry, Minister, Government,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या सीबीआई विवाद से सरकार की साख पर पड़ेगा असर?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.