बिजनेस स्टैंडर्ड - आईएलऐंडएफएस पर जापानी नजर
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आईएलऐंडएफएस पर जापानी नजर

देव चटर्जी / मुंबई 09 23, 2018

ओरिक्स नए निवेश से अपना हिस्सा बढ़ाने को तैयार

बिजनेस स्टैंडर्ड आईएलऐंडएफएस पर जापानी नजरजापान की कंपनी ओरिक्स कॉरपोरेशन संकट से जूझ रही इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशियल सर्विसेज (आईएलऐंडएफएस) में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने को तैयार है। अभी उसकी कंपनी में 23.54 फीसदी हिस्सेदारी है। वह आईएलऐंडएफएस की वित्तीय प्रतिबद्घताओं को पूरा करने के लिए विदेश से नई पूंजी भी लाना चाहती है। 23.5 अरब डॉलर राजस्व वाली वैश्विक वित्तीय सेवा कंपनी ओरिक्स के आईएलऐंडएफएस के बोर्ड में दो प्रतिनिधि हैं और वह भारतीय जीवन बीमा निगम (25.34 फीसदी) के बाद इसमें दूसरी सबसे बड़ी हिस्सेदार है। 

एक सूत्र ने कहा, ‘अपनी वैश्विक मौजूदगी के कारण ओरिक्स की सस्ती और दीर्घकालिक पूंजी तक पहुंच है। वह जापान से एक-दो फीसदी की ब्याज दर पर पैसे जुटा सकती है और वह भी 40 साल के लिए। बुनियादी क्षेत्र की परियोजनाओं के लिए दीर्घकालिक पूंजी की जरूरत होती है। जापानी चाहते हैं कि इस सौदे के लिए भारत सरकार जल्दी से जल्दी मंजूरी दे और उन्हें भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से आईएलऐंडएफएस तथा आईएलऐंडएफए फाइनैंशियल पर विशेष ऑडिट रिपोर्ट का इंतजार है। इसी आधार पर वे अगला कदम बढ़ाएंगे।’ इस बारे में आईएलऐंडएफएस को भेजे गए ईमेल का कोई जवाब नहीं आया। ओरिक्स ने भी बिज़नेस स्टैंडर्ड के सवालों का जवाब नहीं दिया। 

आईएलऐंडएफएस और इसकी सहयोगी कंपनियां इस महीने ऋणदाताओं के ब्याज का भुगतान करने में नाकाम रहीं और कंपनी गंभीर नकदी संकट से जूझ रहा है। वित्त वर्ष 2018 के अंत में उसकी समेकित बैलेंस शीट का आकार 1,158 अरब रुपये था। सूत्र ने कहा, ‘पूरे देश में समूह की बुनियादी क्षेत्र की  परियोजनाएं हैं और ओरिक्स भारत की सफलता में योगदान करना चाहती है।’ सूत्र ने विश्वास जताया कि समूह में चल रहा नकदी संकट ज्यादा दिन तक नहीं रहेगा। उसने साथ ही चेताया कि अगर विशेष ऑडिट रिपोर्ट में भ्रष्टाचार या गड़बड़ी के संकेत मिलते हैं तो संभव है कि ओरिक्स अपनी योजना को आगे नहीं बढ़ाएगी। 

सूत्र ने कहा, ‘अगला हफ्ता अहम होगा क्योंकि तभी आईएलऐंडएफएस की चूक का असर दिखेगा।’ शुक्रवार को कंपनी ने आईडीबीआई बैंक के 2.5 अरब रुपये लेटर ऑफ क्रेडिट पर डिफॉल्ट किया। आईएलऐंडएफएस और उसकी सहयोगी कंपनियों को अपनी विभिन्न वित्तीय देनदारियों को पूरा करने के लिए इस महीने के अंत तक करीब 20 अरब रुपये की जरूरत होगी। समूह ने भारतीय जीवन बीमा निगम और भारतीय स्टेट बैंक से तुरंत 35 अरब रुपये का ऋण मांगा है। जानकारों ने आशंका जताई है कि अगर कंपनी को अगले हफ्ते तक पैसा नहीं मिला तो कंपनी कर्ज का भुगतान करने में नाकाम रहेगी जिसका पूरे वित्तीय बाजार पर असर होगा। आईएलऐंडएफएस पर 910 अरब रुपये का कर्ज है।

देश के शीर्ष म्युचुअल फंडों ने आईएलऐंडएफएस और उसकी सहयोगी कंपनियों की ऋण योजनाओं में निवेश कर रखा है। निवेशकों की भुगतान मांग आने पर उनको दूसरी कंपनियों की ऋण योजनाओं से अपना निवेश निकालना पड़ेगा। आईएलऐंडएफएस पहले ही अपनी वित्तीय सेवा कंपनी आईएलऐंडएफएस फाइनैंशियल सर्विसेज को बेचने का फैसला कर चुकी है और उसने कंपनी के लिए बोली आमंत्रित की है। पिछले सप्ताह आईएफआईएन के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्याधिकारी रमेश बावा,चार स्वतंत्र निदेशकों और एक गैर कार्यकारी निदेशक ने बोर्ड से इस्तीफा दे दिया था।

आईएफआईएन के डिफॉल्ट करने के बाद बावा ने इस्तीफा दिया। आरबीआई के नियमों के मुताबिक आईएफआईएन की अगले वर्ष फरवरी तक वाणिज्यिक प्रतिभूतियों तक पहुंच नहीं होगी। आईएलऐंडएफएल अपनी परिसंपत्तियों को बेचकर पैसा जुटाने की कोशिश कर रही है। 2010-11 और 2013-14 के बीच आईएलऐंडएफएस ने रणनीतिक निवेश में हिस्सेदारी बेचकर करीब 14.61 अरब रुपये का लाभ कमाया। 

आईएलऐंडएफएस ने बिजली उत्पादन कंपनी में अपनी हिस्सेदारी बेचकर वित्त वर्ष 2015 और वित्त वर्ष 2016 में 3.61 अरब रुपये का मुनाफा कमाया। उसने वित्त वर्ष 2016 में आईएलऐंडएफएस ट्रस्ट कंपनी में हिस्सेदारी बेचकर वित्त वर्ष 2016 में 1.13 अरब रुपये और वित्त वर्ष 2017 में 37 करोड़ रुपये मुनाफा हासिल किया।

कंपनी को सौर ऊर्जा परियोजनाओं में 49 फीसदी विनिवेश से अपनी ऊर्जा इकाई से 2.23 अरब रुपये का लाभांश भी मिला। लेकिन यह हिस्सा बिक्री समूह की कंपनियों की वित्तीय प्रतिबद्वताओं को पूरा करने के लिए नाकाफी रहीं जिससे कि उनके कर्ज का स्तर बढ़ गया। समूह का कर्ज-इक्विटी अनुपात भी मार्च 2018 के अंत में बढक़र 16.8 गुना हो गया जो एक साल पहले 10.6 गुना था। भारी कर्ज के कारण उसे विभिन्न परियोजनाओं और सहायक कंपनियों में रणनीतिक हिस्सेदारी बेचनी पड़ेगी।

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