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देशहित के आकांक्षी नेता का हश्र संस्थान निर्माताओं के राज में

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  September 21, 2018

सन 1993 में संसद की स्थायी समितियों का गठन इसलिए किया गया था ताकि हर मंत्रालय के कामकाज पर विधायी निगरानी रखी जा सके। किसी मंत्री को स्थायी समिति की सदस्यता की पात्रता नहीं है। गृह मंत्रालय, वित्त और विदेश मंत्रालयों से संबंधित समितियों की अध्यक्षता पारंपरिक रूप से विपक्षी दल के किसी सदस्य के पास रहती है। विभिन्न दलों को सदन में उनकी हैसियत के मुताबिक इन समितियों में सीटों का आवंटन किया जाता है। पार्टी की अनुशंसा पर समिति के अध्यक्ष का चयन हर सदन का अध्यक्ष या चेयरमैन करता है। लोकसभा की स्थायी समिति के चेयरमैन (और सदस्य) सदन के पांच वर्ष के कार्यकाल के उपरांत स्वत: सेवानिवृत्त हो जाते हैं। हालिया इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण नजर नहीं आता जब लोकसभा की स्थायी समिति के चेयरमैन को बदला गया हो। ऐसा केवल तभी हुआ है जब वह मंत्री बन गया हो, या उसने स्वयं इस्तीफा दिया हो या उसे पार्टी से निकाल दिया गया हो। 

 
इस लिहाज से देखा जाए तो इस माह के आरंभ में जब भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन को सूचित किया कि वह रक्षा मामलों की स्थायी समिति के अध्यक्ष मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी  के स्थान पर पूर्व मंत्री कलराज मिश्र को अध्यक्ष बना रही है तो किसी के लिए संशय करने की कोई वजह नहीं थी। इस लोकसभा के कार्यकाल में अभी छह महीने की अवधि शेष है। खंडूड़ी को वैसे भी सेवानिवृत्त होना ही था। ऐसे में जाहिर है उन्हें हटाने का मकसद केवल उन्हें दंडित करना या शर्मिंदा करना ही है। 
 
खंडूड़ी की बात करें तो अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में प्रख्यात स्वर्णिम चतुर्भुज योजना का काम उनके ही नेतृत्व में हुआ था। यह वही योजना है कि जिसे उस सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिना जाता है। खंडूड़ी भारतीय सेना में इंजीनियर रह चुके हैं। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया लेकिन उनके भीतर सैनिक हमेशा प्रभावी रहा। एक बार उन्होंने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा था, 'मेरे प्रमुख ने मुझसे सड़कें बनाने को कहा है तो मैं सड़कें बनाऊंगा।' उन्होंने बहुत सहजता से यह स्वीकार कर लिया कि उन्होंने सड़क निर्माण की राह में आ रहे अवैध गुरुद्वारे, मस्जिद और यहां तक कि मंदिर भी तोड़े। 
 
सन 2007 में जब खंडूड़ी को उनके गृह राज्य उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बनाया गया तब भी उन्होंने यही रुख अपनाया। वह जातिवादी लड़ाई के भंवर में उलझ गए। उनके सीधे सपाट रुख और रवैये ने उनकी मदद नहीं की।  उसके बाद भाजपा 2012 के विधानसभा चुनाव में बुरी तरह हार गई और यह सब उनकी निगरानी में हुआ। खंडूड़ी 2014 के लोकसभा चुनाव में जीतने में कामयाब रहे। वह गढ़वाल से सांसद चुने गए। उम्मीद की जा रही थी कि उनको मंत्री बनाया जाएगा लेकिन हालांकि उम्र की सीमा को देखते हुए वह स्वयं इसे खारिज कर देते। इसके बजाय उनको रक्षा मामलों पर संसद की स्थायी समिति का अध्यक्ष बना दिया गया। 
 
इस वर्ष मार्च में स्थायी समिति ने एक रिपोर्ट पेश की। इस रिपोर्ट में मुख्य बात यह कही गई थी कि रक्षा क्षेत्र को इतनी कम धनराशि आवंटित हुई है कि उससे सेना की अनिवार्य जरूरतें भी पूरी नहीं की जा सकतीं। रिपोर्ट में कहा गया, 'आधुनिकीकरण के लिए दी गई 21,338 करोड़ रुपये की राशि तो 125 मौजूदा योजनाओं की 29,033 करोड़ रुपये के पूर्व प्रतिबद्घता, 10 दिन के गहन युद्घ के लिए जरूरी हथियारों की खरीद तथा अन्य हथियार फैक्टरियों की जरूरतों के जरूरी भुगतान के लिए भी पर्याप्त नहीं।'
 
इस रिपोर्ट का उद्देश्य था रक्षा मंत्रा और वित्त मंत्रालय को झकझोरना। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि नौसेना के बजट में किया गया 2.84 फीसदी का इजाफा तो मुद्रास्फीति का दबाव तक नहीं झेल पाएगा। कहा गया कि हथियारों का रखरखाव तथा आपातकालीन खरीद के लिए और अधिक धनराशि की आवश्यकता होगी।  रिपोर्ट में कहा गया, 'भारतीय सेना की मौजूदा स्थिति बताती है कि उसके 68 फीसदी हथियार बहुत पुराने हो चुके हैं, 24 फीसदी हथियार वर्तमान श्रेणी के हैं और केवल आठ फीसदी हथियार उत्कृष्ट श्रेणी के हैं।'
 
सेना ने स्वयं समिति के समक्ष कहा था कि कुल बजट का 22 से 25 फीसदी हिस्सा आधुनिकीकरण के लिए होना चाहिए। परंतु केवल 14 फीसदी बजट इसके लिए आवंटित किया गया जो कि निहायत अपर्याप्त है। यानी स्थायी समिति उन सभी बातों का समर्थन कर रही थी जो सशस्त्र सेनाओं ने कही थीं। एक सैनिक के रूप में खंडूड़ी को लगा होगा कि इस नई भूमिका में यह उनका काम है कि देश के हित में इन बातों को सामने लाएं। भाजपा ने उनकी बातों पर कार्रवाई करने के बजाय उन्हें ही हटा दिया। 
 
एक समाचार पत्र में प्रकाशित हालिया आलेख में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सराहना करते हुए उन्हें संस्थान निर्माता बताया गया है। शाह ने लिखा है, 'संगठन और संस्थान अंतत: उन लोगों से बनते हैं जो उनमें अपने साझा दृष्टिकोण को व्यक्तिगत हितों के ऊपर रखते हैं।' ऐसा लगता है मानो वह खंडूड़ी की बात कर रहे हों। यह देखने वाली बात है कि संस्थान निर्माताओं के राज में उनका क्या हश्र हुआ।
Keyword: parliament, committee, B. C. Khanduri,
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