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लोकलुभावन वादे और सपने दिखाकर लूट लेते हैं अपने

देवाशिष बसु /  September 21, 2018

बहुत संभव है कि गड़बड़ी हममें यानी जनता में ही हो। अपनी अल्प स्मृति के कारण ही हम लगातार चुनाव के पहले किए जाने वाले वादों पर यकीन कर लेते हैं। बता रहे हैं देवाशिष बसु 

 
देश की मौजूदा सरकार के सत्ता में आने के चार वर्ष बाद चालू खाते का घाटा बढ़ा हुआ है, मुद्रा कमजोर है, सरकारी बॉन्ड प्रतिफल 8.2 फीसदी है (एक वर्ष पहले अधिकांश लोग इसके 6 फीसदी से कम रहने की उम्मीद जता रहे थे) और ईंधन कीमतों में हुआ इजाफा अर्थव्यवस्था को धक्का पहुंचा रहा है। गत सप्ताहांत सरकार के समझदार लोगों ने इस गड़बड़ी से निजात पाने का प्रयास किया। परंतु आप किसी खास नतीजे की उम्मीद मत कीजिए, उनके पास बहुत सीमित विकल्प हैं। सरकार साहसिक और राष्ट्रवादी हो सकती है लेकिन प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया ने वित्त मंत्रालय के सूत्रों के हवाले से बताया कि आम आदमी के इस्तेमाल में आने वाले ईंधन पर करों में कटौती इसलिए नहीं की जा सकती है क्योंकि उसके पास यह गुंजाइश ही नहीं है कि वह विकास कार्यों में कटौती किए बिना राजस्व में किसी तरह की कमी बरदाश्त कर सके। शायद इस सरकार को उच्च ईंधन कीमतों पर मुद्रास्फीति के प्रभाव का अंदाजा ही नहीं है। यह गरीबों पर बहुत बुरा असर डालता है। इसका संबंध केवल निजी वाहनों के पेट्रोल टैंक भरवाने से नहीं है। सरकार अपनी महत्त्वाकांक्षी योजनाओं, लोकलुभावन वितरण आदि बातों को लेकर इस कदर आसक्त है कि वह वह अपने फालतू व्यय में से भी जरा सी कटौती करने की स्थिति में नहीं है।
 
याद कीजिए सन 2014 के मध्य में कितनी आशाएं जगी थीं। मोदी सरकार पिछली सरकार के कामों की आलोचना करती हुई सत्ता में आई थी और देश में बदलाव की अपेक्षा जगी थी। प्रधानमंत्री ने वादा किया था कि वह चौकीदार की भूमिका निभाते हुए भ्रष्टाचार कम करेंगे और देश में सुशासन लाएंगे। केंद्र सरकार पर बड़े भ्रष्टाचार का आरोप कोई नहीं लगा सकता है लेकिन आम जनता को प्रभावित करने वाले भ्रष्टाचार में कोई कमी भी नहीं आई है। फिर चाहे मामला राजस्व का हो, पुलिस का हो या स्थानीय निकायों का।
 
दूसरी बात, उन्होंने अच्छे दिन लाने का वादा किया था। उन्होंने इसकी परिभाषा नहीं दी थी लेकिन मैं कल्पना कर सकता हूं कि लोगों के लिए अच्छे दिन का अर्थ था कानून का शासन, अच्छी व्यवस्था, रोजगार के अवसर, बेहतर परिवहन, शिक्षा और स्वास्थ्य तथा स्थिर कीमतें। इनमें से किसी भी क्षेत्र में कोई खास प्रगति नहीं हुई है।  मोदी ने छह बड़ी योजनाओं की घोषणा के साथ शुरुआत की: डिजिटल भारत, स्वच्छ भारत, स्वच्छ गंगा, बालिकाओं के लिए शिक्षा, कौशल विकास और हरित भारत। विचित्र बात है कि उनको लगा कि केंद्र की हस्तक्षेपकारी सरकार की मदद से ये मुख्यमंत्रीनुमा योजनाएं, उसी तीव्रता से देश भर में लागू की जा सकती हैं। आश्चर्य नहीं कि इन योजनाओं से कुछ खास हासिल नहीं हुआ और ये प्रचार-प्रसार का जरिया बनी रहीं।
 
अच्छे दिन लाने के लिए यह आवश्यक था कि पहले सिद्धांतों का पालन किया जाए। पहला, सरकार की भूमिका को सीमित करना, उसे क्रियान्वयन तक सीमित करना और यह सुनिश्चित करना कि वह नागरिकों को परेशान और दंडित न करे। खासतौर पर गरीबों को। दूसरा, निजी पहलों और व्यक्तियों को प्रोत्साहित करना ताकि वे नए उत्पाद, नई विधाओं को सामने लाने में अधिक से अधिक रुचि लें। इसके बजाय सरकार ने पिछली सरकार के तर्ज पर ही न केवल नियंत्रण कायम रखना बरकरार रखा बल्कि उसने सरकार की भूमिका को कम करने के बजाय और बढ़ा दिया। 
 
सरकारी विमानन कंपनी एयर इंडिया का उदाहरण हमारे सामने है। सरकार ने घाटे में चल रही एयर इंडिया के हालात में पहले पहल विशेषज्ञ की मदद से बदलाव लाना चाहा लेकिन ऐसा नहीं हो सका। उसके पश्चात सरकार ने एयर इंडिया की बिक्री करने की घोषणा की लेकिन विशेषज्ञों द्वारा निर्धारित कीमत पर इसे चरणबद्ध ढंग से बेचना उसे उचित नहीं लगा।  पूरी एयर इंडिया को खरीदने के लिए कोई तैयार नहीं था क्योंकि सरकार इसमें हिस्सेदारी रखना चाहती थी। ऐसे में इसके निजीकरण का विचार त्याग दिया गया और यह अभी भी करदाताओं पर बोझ बनी हुई है। चार अनुषंगियों और मुख्यालय की बिक्री करके कुछ वसूली करने का प्रयास किया गया लेकिन यह राशि कंपनी के कर्ज और घाटे के समक्ष बेहद कम है।
 
इसका दूसरा बड़ा उदाहरण है सरकारी बैंकों की निरंतर नाकामी और उनमें भ्रष्टाचार के मामलों का लगातार सामने आना। कई बैंकों में शीर्ष के पद लंबे समय से रिक्त पड़े हुए हैं। सबसे अहम बात यह है कि पिछली सरकार पर फंसे हुए कर्ज को बढ़ाने का इल्जाम तो लगाया जाता है लेकिन नए सिरे से फंसा हुआ कर्ज उत्पन्न होना जारी है। आज भी न तो बैंक और न ही सरकार इसके लिए जवाबदेह है।  बहुत संभव है कि गलती हमारी यानी आम जनता की ही हो। हम बार-बार चुनाव के पहले किए जाने वाले वादों पर यकीन कर बैठते हैं क्योंकि हमारी स्मृति कमजोर है। चुनाव के दौरान राजनेता लुभावने वादों के साथ सामने आते हैं और ऐसी योजनाएं पेश करते हैं जिन पर हम भरोसा कर बैठते हैं। दिलचस्प बात यह है कि उन्हें पता है कि लोग चाहते क्या हैं। ऐसे में अगर आप उनके चुनाव प्रचार अभियान पर नजर डालें तो पाएंगे कि देश और विदेश में राजनेता एक समान बातें, संदेश और वादे दोहराते रहते हैं।
 
सन 1992 में जॉर्ज बुश के समक्ष प्रतिद्वंद्वी के रूप में खड़े बिल क्लिंटन का नारा था कि वह यथास्थिति के खिलाफ बदलाव लाना चाहते हैं। इसके अलावा उनका प्रचार अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य सेवा पर केंद्रित था। इसके 16 वर्ष बाद बराक ओबामा भी बदलाव के नारे के साथ सत्ता में आए। हमारे देश में पश्चिम बंगाल में 2011 में ममता बनर्जी और 2014 में प्रधानमंत्री मोदी परिवर्तन के नारे के साथ चुनाव जीते।  मोदी इस समय आयुष्मान भारत नामक स्वास्थ्य सेवा लाने के लिए प्रयासरत हैं। क्लिंटन और ओबामा अमेरिका में उनसे पहले यह प्रयास कर चुके हैं। क्लिंटन ने बुश के खिलाफ अर्थव्यवस्था की हालत को हथियार बनाया। मौजूदा विपक्ष हमारे यहां सरकार के खिलाफ यही कर रहा है। अंतत: मजाक हमारा बनेगा। हम एक बार फिर ऐसी ही कोई सरकार चुन लेंगे और यह प्रक्रिया चलती रहेगी। 
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