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सेवा क्षेत्र से भरपाई नहीं

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  September 21, 2018

इस कैलेंडर वर्ष में अब तक रुपये के डॉलर मूल्य में 13 फीसदी की गिरावट आई है। इस बात ने देश के वस्तु एवं सेवा व्यापार में बढ़ते घाटे की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया है। कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से भी इस घाटे में नाटकीय इजाफा हुआ है। विदेशों से होने वाले धनप्रेषण को शामिल कर लें तो भी वर्ष 2017-18 में इसके सकल घरेलू उत्पाद का 2.6 फीसदी रहने की उम्मीद है। यह वर्ष 2012-13 के बाद का उच्चतम स्तर है। सरकार ने प्रतिक्रियास्वरूप निर्यात को बढ़ावा देने और गैर जरूरी आयात कम करने की बात करनी शुरू कर दी है।

 
निर्यात में आए ठहराव पर विचार करना जरूरी है। मोटेतौर पर इससे तात्पर्य है वाणिज्यिक वस्तुओं के निर्यात का। तेल कीमतों में होने वाले तेज उतार-चढ़ाव के कारण अगर इस कारक को ध्यान में रखा जाए तो निराश करने वाली बात यह है कि इस दशक में गैर तेल निर्यात में बहुत धीमी गति से बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह वर्ष 2010-11 के 21,000 करोड़ डॉलर से बढ़कर 2017-18 में 26,500 करोड़ डॉलर तक ही पहुंचा है। यानी सात वर्ष में केवल 26 फीसदी की बढ़ोतरी और सालाना 3 फीसदी की औसत वृद्घि दर। यह वर्ष 2011 तक के निर्यात प्रदर्शन के एकदम विपरीत है। सन 1990 के दशक में गैर तेल निर्यात 140 फीसदी बढ़ा था। सन 2000 से 2009 के बीच तो 395 फीसदी की शानदार दर दर्ज की गई। मौजूदा दशक के दौरान गैर तेल निर्यात में 40 से 50 फीसदी की वृद्घि देखने को मिल सकती है जो खासी कम मानी जाएगी। 
 
समान अवधि में गैर तेल आयात में भी कमी आई है। वर्ष 2010-11 के 28,800 करोड़ डॉलर से बढ़कर 2017-18 में यह 35,000 करोड़ डॉलर हुआ। यानी बमुश्किल 21 फीसदी की बढ़ोत्तरी। यह दर समान अवधि की निर्यात वृद्घि की दर के आसपास ही है। ऐसे में कोई सवाल पूछ सकता है कि चिंता की क्या बात है? वास्तविक संदर्भ में भी देखें तो वस्तु व्यापार में गैर तेल क्षेत्र का घाटा सात वर्ष में 5,500 करोड़ डॉलर से बढ़कर 6,200 करोड़ डॉलर हुआ है। यह मामूली बढ़ोतरी है। यानी मसला कुलमिलाकर तेल का है।
 
एक पल के लिए ऐसा लगा कि सॉफ्टवेयर निर्यात तेल की कमी पूरी कर देगा क्योंकि सॉफ्टवेयर निर्यात में कमोबेश उतनी ही बढ़ोतरी देखने को मिल रही थी जितना तेल आयात का बिल था। ऐसा हुआ भी है। सॉफ्टवेयर निर्यात वर्ष 2000-01 के 630 करोड़ डॉलर के मामूली स्तर से बढ़कर 2010-11 में 4,760 करोड़ डॉलर तक जा पहुंचा। गत वर्ष तो यह 16,000 करोड़ डॉलर हो गया। जबकि समान वर्ष में तेल आयात का बिल 10,900 करोड़ डॉलर का था। हालांकि रिजर्व बैंक ने सेवा व्यापार को लेकर जो मासिक रिपोर्ट जारी की है उसमें विरोधाभासी आंकड़े नजर आते हैं। यह कतई सकारात्मक तस्वीर पेश नहीं करता। उदाहरण के लिए आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2011-12 में कुल सेवा निर्यात 13,700 करोड़ डॉलर था। यह सॉफ्टवेयर निर्यात से दोगुना था। बहरहाल रिजर्व बैंक के 2017-18 के आंकड़ों के मुताबिक सेवा निर्यात 16,300 करोड़ डॉलर रहा। यह राशि सॉफ्टवेयर निर्यात से तो कम है ही, यह समग्र सेवा निर्यात में धीमापन भी दर्शाता है। वर्ष 2011-12 से अब तक क्षेत्र में 19 फीसदी की ही वृद्घि देखने को मिली। इन आंकड़ों को उद्योग जगत द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों से मिलाकर देखना होगा। 
 
ध्यान देने वाली बात यह है कि सेवा व्यापार का शुद्घ अधिशेष अपेक्षाकृत धीमी गति से बढ़ा है। वर्ष 2011-12 में कुल सेवा आयात 8,600 करोड़ डॉलर का था यानी 5,100 करोड़ डॉलर का शुद्घ अधिशेष। गत वर्ष सेवा आयात 10,200 करोड़ डॉलर रहा। इसमें 1,000 करोड़ डॉलर से अधिक की बढ़ोतरी देखने को नहीं मिली यानी छह वर्ष में करीब 20 फीसदी वृद्घि। यह सॉफ्टवेयर निर्यात को लेकर उद्योग जगत के आंकड़ों से काफी कम है। सेवा व्यापार के शुद्घ अधिशेष में स्थिरता का अर्थ यह है कि यह तेल व्यापार में घाटे से कमतर रहने लगा। गत वर्ष यह 6,100 करोड़ डॉलर के सेवा अधिशेष की तुलना में 8,500 करोड़ डॉलर था। सन 2010-11 में दोनों आंकड़े काफी करीब थे। इस वर्ष यह अंतर और बड़ा हो जाएगा। संक्षेप में कहें तो सेव निर्यात, देश के तेल आयात के संकट का हल नहीं साबित हुआ है। हमें वस्तु व्यापार में आए ठहराव पर ध्यान केंद्रित करना होगा। वस्त्र एवं औषधि जैसे क्षेत्रों को देखते हुए यह बात खासतौर पर ध्यान देने लायक है।
Keyword: dollar, rupees, GST, crude oil, रुपये, गिरावट,
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