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भूमि एवं श्रम सुधारों में केंद्र पर भारी पड़ते राज्य

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  September 20, 2018

भारत में 1991 के सुधारों के बाद से आर्थिक नीति पर विमर्श काफी हद तक भूमि एवं श्रम नीतियों की जड़ता को दूर करने की जरूरत पर केंद्रित रहा है। जहां अन्य क्षेत्रों में लागू सुधारों ने अर्थव्यवस्था को काफी लाभ पहुंचाए हैं, वहीं विशेषज्ञों का कहना है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में विनिर्माण क्षेत्र के अंशदान को 25 फीसदी के स्तर तक पहुंचाने के लिए विनिर्माण में नई जान फूंकना जरूरी है। लेकिन ऐसा हो पाना एक स्वप्न ही होगा जब तक देश के भूमि एवं श्रम कानूनों को नरम करने वाले सुधार नहीं किए जाते हैं। मई 2014 में बनी नरेंद्र मोदी सरकार ने यह उम्मीद जगाई थी कि वह 2013 के भूमि अधिग्रहण एवं पुनर्वास कानून में सुधार के लिए जरूरी साहस दिखाएगी ताकि उद्योग जगत के लिए कारखाने एवं सड़कें बनाने के मकसद से जमीन खरीदना आसान हो सके। इसी के साथ एक समग्र श्रम संहिता लाकर श्रम कानून में बदलाव की भी उम्मीद की गई थी। इस श्रम संहिता के लागू होने पर कामगारों की छंटनी के पहले मुआवजा पैकेज के मसले पर सरकार की मंजूरी लेने की बाध्यता भी खत्म हो जाती। 

 
सच तो यह है कि मोदी सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन की कोशिश की थी। इसके लिए वह एक अध्यादेश भी लेकर आई थी लेकिन इस संशोधित नियम का इतना तीव्र राजनीतिक विरोध हुआ था कि सरकार को संसद में इसे पारित कराने पर अपने कदम पीछे खींचने के लिए मजबूर होना पड़ा था। इसी तरह सरकार को श्रम कानूनों को शिथिल करने के मामले में भी श्रम संगठनों के विरोध का सामना करना पड़ा था। आज जिस श्रम कानून का मसौदा पेश किया जा रहा है वह मूल योजना से काफी अलग है। इसमें 100 से कम कर्मचारियों वाले संगठनों में छंटनी के पहले सरकार की मंजूरी लेने की अनिवार्यता को बरकरार रखा गया है। इसके अलावा कर्मचारियों को दिए जाने वाले राहत पैकेज के मामले में भी कोई प्रगति नहीं दिख रही है।
 
हालांकि सरकार ने राज्यसभा में राजनीतिक विरोध और सत्तारूढ़ भाजपा से जुड़े श्रम संगठनों के प्रतिरोध को देखते हुए एक बीच का रास्ता निकालने की कोशिश की। उसने राज्य सरकारों से अपने स्तर पर भूमि एवं श्रम कानून बनाने को कहा ताकि इन कानूनों की सख्ती दूर की जा सके। सरकार ने राज्यों को यह आश्वासन भी दिया कि राज्यों के ऐसे कानूनों को राष्ट्रपति की तरफ से किसी विलंब या समस्या के बगैर अनुमति मिल जाएगी। सवाल है कि क्या राज्यों खासकर भाजपा-शासित राज्यों ने केंद्र सरकार के इस प्रस्ताव पर पहल की है? फौरी आकलन से देश में भूमि एवं श्रम कानूनों में सुधार के संदर्भ में एक रोचक जानकारी मिलती है। सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के कांची कोहली और देबायन गुप्ता का एक अध्ययन बताता है कि तमाम बड़े राज्यों ने अपने भूमि अधिग्रहण कानूनों में बदलाव किए हैं और केंद्र के बनाए कानून को एक तरह से नरम कर देने वाले नियम बनाए हैं। गुजरात का ही उदाहरण लेते हैं। गुजरात ने भूमि अधिग्रहण करारों को सामाजिक प्रभाव आकलन से छूट दे दी है। इसके अलावा तमाम तरह की परियोजनाओं के लिए जमीन के मालिक की सहमति लेने की बाध्यता भी नहीं रह गई है। महाराष्ट्र में भूमि अधिग्रहण के दौरान सामाजिक प्रभाव आकलन और भू-स्वामियों की सहमति के प्रावधान केवल निजी परियोजनाओं के लिए ही जरूरी रह गए हैं जबकि सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) की परियोजनाओं को इससे छूट दी गई है। तमिलनाडु ने भी औद्योगिक उद्देश्य या राजमार्ग निर्माण के लिए होने वाले अधिग्रहण में सामाजिक प्रभाव आकलन और सहमति से छूट दी है। तेलंगाना ने भी कई परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण संबंधी प्रावधान ढीले किए हैं।
 
कुछ राज्यों ने भूमि अधिग्रहण कानून 2013 से संबंधित ऐसे नियम बनाने शुरू किए हैं कि उनसे प्रशासन को काफी गुंजाइश मिल जाती है। इनमें उत्तर प्रदेश, झारखंड, ओडिशा और तमिलनाडु शामिल हैं। हरियाणा, छत्तीसगढ़ और त्रिपुरा जैसे राज्यों ने तो अधिग्रहीत जमीन के लिए दिए जाने मुआवजे की राशि में भी कटौती कर दी है।  जहां तक श्रम कानूनों को नरम करने का सवाल है तो अभी तक नौ राज्य अपने औद्योगिक विवाद निपटान कानूनों में बदलाव कर चुके हैं। इन संशोधनों के बाद मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, झारखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, असम और आंध्र प्रदेश में अब कर्मचारियों को नौकरी से हटा पाना अधिक आसान हो गया है। इनमें से आंध्र को छोड़कर बाकी सभी राज्य भाजपा-शासित हैं। गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश ने तो नौकरी से हटाए जाने पर दिए जाने वाले मुआवजे के बारे में तगड़े प्रावधान किए हैं।
 
निश्चित रूप से केंद्र ने भी सभी क्षेत्रों में सीमित अवधि वाले अनुबंधपरक नियुक्तियों को मंजूरी दी हुई है। हालांकि अनुबंध पर रखे जाने वाले कर्मचारियों को भी नियमित कर्मचारियों के बराबर वेतन एवं भत्ते ही दिए जाते हैं। भूमि अधिग्रहण कानून के संदर्भ में भूतल परिवहन मंत्री नितिन गडकरी का मानना है कि अगर आप कीमत देने को तैयार हैं तो भूमि अधिग्रहण कोई समस्या नहीं है। गडकरी अधिग्रहण में अपनी जमीन गंवाने वाले लोगों को आकर्षक मुआवजा पैकेज सुनिश्चित कर सड़क निर्माण की रफ्तार में तेजी लेकर आए हैं।
 
हालांकि श्रम एवं भूमि कानूनों में किए गए सुधार से अर्थव्यवस्था को होने वाले लाभ अभी पूरी तरह नजर नहीं आ रहे हैं। लेकिन अगर इतने राज्यों ने इन कानूनों में दो वर्षों के लिए ही ढील दी है तो संभवत: समय आ गया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के भुला दिए गए बाजार सुधारों पर विमर्श को बदला जाए। पुराने आख्यानों के उलट चुनावी दबावों एवं आग्रहों के लिहाज से अधिक संवेदनशील राज्यों ने भूमि एवं श्रम कानूनों में सुधार की दिशा में अधिक काम किए हैं। इसके विपरीत केंद्र अपेक्षाकृत पीछे ही रहा है। खास बात है कि विनिर्माण क्षेत्र में स्थायी वृद्धि को अगर हासिल किया जाना बाकी है तो फिर गलती कहीं और ही है।
Keyword: land, labor, policy, GDP, economy,,
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