बिजनेस स्टैंडर्ड - रुपये की गिरती सेहत से व्यापार घाटे पर असर
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रुपये की गिरती सेहत से व्यापार घाटे पर असर

बाजार संकेतक
देवांग्शु दत्ता /  September 19, 2018

निवेशकों के दिमाग में इन दिनों प्रमुख देशों के बीच छिड़ा व्यापार युद्ध और गिरता रुपया चिंता का सबब बना हुआ है। बातचीत के बावजूद अमेरिका और चीन में व्यापार युद्ध को लेकर जबानी जंग जारी है। अमेरिका ने चीन के कुछ और उत्पादों पर आयात शुल्क लगाकर इन चिंताओं को बढ़ाने का काम किया है। इस बीच ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों के चलते कच्चे तेल की कीमतें 80 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं। केंद्र सरकार और राज्यों की तरफ से उत्पाद शुल्क में राहत दिए जाने से इनकार के बाद पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतों में गिरावट की संभावना नहीं दिख रही है। ट्रांसपोर्टरों और एयरलाइन ऑपरेटरों का कहना है कि पेट्रोलियम उत्पादों की ऊंची कीमतों के चलते उनकी परिवहन लागत गत वर्ष की तुलना में करीब 30 फीसदी बढ़ गई है।

 
ईंधन मोर्चे पर उच्च मुद्रास्फीति को खाद्य मुद्रास्फीति के निचले स्तर ने संतुलित किया हुआ है। ये दोनों ही अवयव काफी अस्थिर रहते हैं। अगस्त में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक एक साल पहले की तुलना में 3.7 फीसदी बढ़ गया जबकि जुलाई में यह 4.2 फीसदी की गिरावट पर रहा था जो दस महीनों का निम्नतम स्तर था। इसी तरह अगस्त में थोक मूल्य सूचकांक एक साल पहले की तुलना में 4.53 फीसदी की बढ़त पर रहा जबकि जुलाई में यह 5.09 फीसदी बढ़ा था। खाद्य उत्पादों ने इस सूचकांक को भी नीचे लाने का काम किया। प्रमुख मुद्रास्फीति में हल्का सुधार देखा गया लेकिन यह आधार प्रभाव का नतीजा भी हो सकता है।
 
रुपये के कमजोर होने का असर विदेशी मुद्रा बाजार में भी महसूस किया जा रहा है। हालांकि भारतीय रिजर्व बैंक जब दखल देता है तो रुपये में थोड़ा-बहुत सुधार होता है लेकिन इसकी फिसलन थमने का नाम नहीं ले रही है। बाह्यï वाणिज्यिक कर्ज लेने वाली कंपनियों की चिंता रुपये की गिरती सेहत ने बढ़ा दी है। सरकार का कहना है कि वह गैर-जरूरी आयात में कटौती करने के लिए कदम उठाने जा रही है। इसके अलावा सरकार विदेशी मुद्रा वाला अधिक निवेश जुटाने की भी कोशिश कर रही है। अगस्त में व्यापार घाटा मामूली गिरावट के साथ 17 अरब डॉलर से अधिक रहा जबकि जुलाई में यह 18 अरब डॉलर के करीब था। निर्यात बढऩे के बावजूद आयात के उच्च स्तर पर बने रहने से व्यापार घाटा कम नहीं हो रहा है। वित्त मंत्री ने भरोसा जताया है कि बेहतर कर संग्रह और बढ़ती हुई आर्थिक वृद्धि के चलते 2018-19 में राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 3.3 फीसदी तक ही सीमित रहेगा। हालांकि कच्चे तेल में अगर नरमी नहीं आती है तो चालू खाते का घाटा जीडीपी का 2.8-3.0 फीसदी रह सकता है।
 
राजकोषीय स्थिति को संभालने के लिए उपभोग मांग काफी अहम होगी। इस आंकड़े को बिगाड़े बगैर सरकारी व्यय बढ़ाया नहीं जा सकता है। पहली तिमाही में उपभोग संतोषजनक था लेकिन रुपये में गिरावट होने से प्रमुख मुद्रास्फीति में आगे और बढ़ोतरी होगी। इसकी वजह यह है कि जीडीपी में 40 फीसदी से अधिक योगदान व्यापार का ही होता है। डॉलर के मौजूदा स्तर को देखते हुए अधिकतर भारतीयों को यह लगेगा कि उनकी आय घट गई है जिससे उपभोग पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
 
आम चुनाव से संबंधित खर्चे बढऩे से वित्त वर्ष की चौथी तिमाही (जनवरी-मार्च 2019) में मांग बढऩे की संभावना है। लेकिन त्योहारी मौसम की शुरुआत अक्टूबर से ही होगी और अधिकांश घरों में अगले दो महीनों में बड़ी खरीदारी होने की संभावना है। उपभोग में सुधार देखने के लिए हमें थोड़ा इंतजार करना होगा।  बिजली क्षेत्र की कंपनियों पर बकाया कर्ज की स्थिति साफ नहीं है। इस कर्ज की बड़ी राशि उन परियोजनाओं में लगी है जो अधूरी पड़ी हुई हैं या व्यवहार्य नहीं रह गई हैं। इस्पात कंपनियों के पास उत्पादक परिसंपत्तियां हैं लेकिन बिजली क्षेत्र की दिवालिया प्रक्रिया के दौरान नीलामी के लिए उपलब्ध परिसंपत्ति बहुत कम होंगी। ऐसे में कानूनी उलझनें दूर होने के बाद भी बैंकों को तगड़ा हेयरकट झेलना पड़ेगा।
 
बाजार ने एस्सार स्टील की बिक्री पर करीबी नजर रखी हुई है। काफी ऊंची बोलियां लगाई गई हैं लेकिन आर्सेलर-मित्तल को अगर 420 अरब रुपये की बोली के साथ इसके अधिग्रहण का मौका मिलता है तो उसे बकाया देनदारियों का भुगतान भी करना होगा। हालांकि न्यूमेटल जेवी ने भी तगड़ी बोली लगाई है लेकिन आर्सेलर-मित्तल ने इसे मुखौटा कंपनी करार देते हुए बोली के अयोग्य ठहराने की मांग की है। आईएलऐंडएफएस मामले का भी बाजार धारणा पर असर देखा जा रहा है। इसकी मूल कंपनी काफी बड़ी है लेकिन बड़े पैमाने पर पुनर्गठन के बगैर किसी बेलआउट योजना को सही नहीं ठहराया जा सकता है। कर्ज अदायगी में चूक निश्चित रूप से ऋण बाजार और संबंधित फंडों पर करारी चोट करेगी। इसके अजीबोगरीब स्वामित्व ढांचे के चलते यह समस्या पैदा हुई है। फिलहाल नकद-प्रवाह बहुत कम है और पोर्टफोलियो विनिवेश की कोई संभावना नहीं दिखती है। इस कंपनी में 160 सहायक इकाइयों की मौजूदगी को देखते हुए बैलेंस शीट का भी कोई खास मायने नहीं रह जाता है।
 
रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति मुख्यत: अगस्त के महंगाई आंकड़ों को ध्यान में रखते हुए ब्याज दरों की समीक्षा करेगी। यह समिति ब्याज दरों को यथावत रखने का निर्णय कर सकती है। दूसरी तरफ समिति रुपये को थोड़ा सहारा देने के लिए दरें बढ़ाने के बारे में भी सोच सकती है। रुपये को संभालने के लिए दखल देते रहे रिजर्व बैंक से इस फैसले की भी उम्मीद की जा सकती है। अगर दरें बढ़ाई जाती हैं तो बैंकों और दूसरे ऋणदाताओं को अधिक नुकसान उठाए बगैर इस संकट से निकल पाना मुश्किल होगा। पिछले हफ्ते विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के पैसे निकालने से शेयर बाजार में जोरदार हलचल रही। तकनीकी स्तर पर बाजार 11,760 का स्तर छूने के बाद गिरावट के दौर में है।
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