बिजनेस स्टैंडर्ड - मुनाफाखोरी पर लगाम या मूल्य नियंत्रण का जरिया
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मुनाफाखोरी पर लगाम या मूल्य नियंत्रण का जरिया

श्यामल मजूमदार /  September 19, 2018

भारतीय कॉर्पोरेट जगत मुनाफाखोरी पर रोक के लिए पुख्ता उपाय तलाशने की समस्या से गुजर रहा है। इन उपायों की व्यवहार्यता की पड़ताल कर रहे हैं श्यामल मजूमदार

 
राष्ट्रीय मुनाफाखोरी-रोधी प्राधिकरण (एनएए) इन दिनों बेहद व्यस्त चल रहा है। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के नाम पर कंपनियों को गैरवाजिब मुनाफा कमाने से रोकने के लिए यह प्राधिकरण गठित किया गया है। गठन के बाद से ही प्राधिकरण के समक्ष ऐसी शिकायतों का अंबार लगा है जिसमें कंपनियों के खिलाफ जीएसटी दरों में कटौती का लाभ उपभोक्ताओं को नहीं देने की बात कही गई है। गत नवंबर में रोजमर्रा के उपभोग वाले उत्पादों (एफएमसीजी) और टिकाऊ उपभोक्ता उत्पादों पर जीएसटी दर को 28 फीसदी से घटाकर 18 फीसदी किए जाने के बाद से मुनाफाखोरी संबंधी शिकायतों में काफी तेजी आई है। इन शिकायतों के मुताबिक कई कंपनियों ने जीएसटी दरों में कटौती का लाभ उपभोक्ताओं को स्थानांतरित नहीं किया है।
 
हालांकि मुनाफाखोरी-रोधी प्राधिकरण अपना काम काफी गंभीरता से ले रहा है और एफएमसीजी एवं टिकाऊ उपभोक्ता उत्पाद बनाने वाली कुछ बड़ी कंपनियों को इस सिलसिले में नोटिस भी भेजा है। हिंदुस्तान यूनिलीवर (एचयूएल) भी उनमें से एक है। हाल में मुनाफाखोरी-रोधी महानिदेशालय (डीजीएपी) ने कहा था कि एचयूएल ने जीएसटी दरों में कटौती के लाभ उपभोक्ताओं को नहीं देकर 4.95 अरब रुपये का मुनाफा कमाया है। इस मामले में एनएए जल्द ही अंतिम फैसला सुना सकता है। असल में, कोई भी व्यक्ति मुनाफाखोरी पर लगाम के लिए सख्त प्रावधान किए जाने के मूलभूत सिद्धांत पर एतराज नहीं जता सकता है। इस सिद्धांत के मुताबिक जीएसटी दरों में कमी होने या इनपुट टैक्स क्रेडिट के लाभ उपभोक्ताओं तक पहुंचाने चाहिए। लेकिन समस्या यह है कि भारतीय कॉर्पोरेट जगत को यह मालूम ही नहीं है कि मुनाफाखोरी-रोधी नियमों का किस तरह अनुपालन किया जाए? इसकी वजह यह है कि भारत में इस तरह का कोई कानून ही नहीं है।
 
केंद्रीय उत्पाद एवं सेवा कर नियमों के नियम 126 में प्रावधान है कि 'प्राधिकरण कीमतों में आनुपातिक कटौती की गणना-पद्धति और प्रक्रिया तय कर सकता है'। लेकिन अभी तक एनएए ने उत्पादों की कीमतों में आनुपातिक कटौती का कोई नियम या प्रक्रिया नहीं तय की है। कोई सुस्पष्ट कानून नहीं होने से संशय की स्थिति और गहरा जाती है। मसलन, यह साफ नहीं है कि कीमतों में गिरावट का लाभ किस स्तर पर प्रदान किया जाए? क्या यह लाभ उत्पादन के स्तर पर दिया जाए या उसका लाभ वह स्टॉक रखने वाली कंपनी को ही सीधे दे दिया जाए? आपूर्ति शृंखला की जटिलताओं और लाभ अंतरण के लिए सीमित समय ही मिल पाने जैसे पहलू को ध्यान में रखें तो यह उम्मीद करना अतार्किक होगा कि तैयार उत्पाद के हरेक पैकेट पर समान लाभ दिया जा सके। कुछ मामलों में यह लाभ अधिक हो सकता है जबकि कुछ में यह कम हो सकता है।
 
इसके क्रियान्वयन से संबंधित कुछ व्यावहारिक समस्याएं भी हैं। मौजूदा समय में जीएसटी दर में कटौती की अधिसूचना जारी होने के बाद ही मुनाफाखोरी-रोधी प्रावधानों के अनुरूप मूल्य निर्धारण की शुरुआत होती है। किसी भी बड़ी एफएमसीजी कंपनी के कई उत्पाद एवं पैक होते हैं, लिहाजा कर में कटौती की अधिसूचना जारी होने के बाद उसे सभी पैकेट पर लागू करने में तीन-चार महीने तक का वक्त लग जाएगा। जीएसटी में कटौती होने पर एफएमसीजी उत्पादों के मूल्य, ढांचे और घनत्व से संबंधित कई तरह की जटिलताएं पैदा होती हैं। उद्योग जगत को उत्पादों की नई कीमतें और वजन की परिवर्तित मात्रा हरेक पैकेट पर लिखनी होती है। अन्य क्षेत्रों की तुलना में एफएमसीजी को इस जटिलता का सामना अधिक करना पड़ता है।
 
जहां तक छोटे पैकेट का सवाल है तो जीएसटी दर में हुई कटौती के हिसाब से उस पैकेट के मूल्य में कटौती कर पाना व्यावहारिक रूप से नामुमकिन है। अब तीन रुपये में मिलने वाले एक शैम्पू सैशे का ही उदाहरण लीजिए। अगर कोई कंपनी जीएसटी दर में हुई कटौती के हिसाब से कीमत में कमी करती है तो उसे इस सैशे का मूल्य 2.73 रुपये करना पड़ेगा। ऐसी स्थिति में उद्योग जगत की स्थापित परंपरा यह है कि उस उत्पाद के मूल्य में कटौती न कर उसकी मात्रा बढ़ा दी जाए। उपभोक्ता के नजरिये से देखें तो यह उत्पाद के मूल्य में कटौती की ही तरह है।
 
मुनाफाखोरी पर लगाम के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश एवं नियमों का अभाव होने से उत्पाद की मात्रा बढ़ाने की स्थापित परंपरा का ही अनुसरण करते हुए अधिकांश एफएमसीजी विनिर्माताओं ने जीएसटी दर में कटौती से हुए लाभ सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंचाने की कोशिश की। लेकिन कुछ अजीब कारणों से डीजीएपी ने उत्पाद की मात्रात्मक वृद्धि को मूल्य कटौती मानने से इनकार कर दिया है। ग्राहक को किसी पैकेट में मिलने वाली अधिक मात्रा को भी उस उत्पाद के मूल्य में कटौती की ही तरह देखा जाना चाहिए। आखिरकार इसका लाभ उपभोक्ता को ही हो रहा है। मुनाफाखोरी -रोधी कानून का मकसद भी तो यही है। 
 
कुछ कंपनियों ने प्रमोशनल योजनाओं के जरिये उपभोक्ताओं को लाभांवित करने की वैकल्पिक रणनीति भी अपनाई है। ये कंपनियां जीएसटी दर में हुई कटौती से हुए लाभ को उपभोक्ता तक पहुंचाने के लिए प्रमोशनल योजनाएं लेकर आईं। हालांकि अभी तक यह साफ नहीं है कि ऐसी प्रमोशनल बिक्री योजनाएं कानून के दायरे में आती हैं या नहीं। इस कानून में कुछ और बेतुके पहलू भी हैं। सरकार ने उपभोक्ताओं तक शीघ्र लाभ पहुंचाने के लिए उद्योग जगत को घटी हुई कीमत वाले स्टिकर पुराने पैकेटों पर चिपकाने की इजाजत दी थी। लेकिन असल में यह विकल्प लागू कर पाना व्यावहारिक नहीं था। इसकी वजह यह है कि कोई भी व्यक्ति उस स्टिकर को उखाड़ सकता है। इसके अलावा हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि एफएमसीजी इकाइयों में उत्पादन बड़े पैमाने पर होता है। ग्राहक तक पहुंचने के क्रम में एक साथ बड़ी संख्या में ये उत्पाद कारखाना, वितरक, थोक विक्रेता और खुदरा विक्रेता के स्तर पर मौजूद रहते हैं। ऐसी स्थिति में संशोधित मूल्य वाले स्टिकरों को हरेक पैकेट पर चिपकाना व्यावहारिक रूप से नामुमकिन हो जाता है।
 
नियमों के अभाव से एक और जटिलता पैदा हुई है। मुनाफाखोरी-रोधी प्रावधानों को लागू करने की कोई सुनिश्चित समयसीमा नहीं होने से उद्योग जगत के समक्ष यह बात साफ ही नहीं हो पाती है कि उपभोक्ताओं को कटौती के लाभ कब तक देते रहने हैं? खास तौर पर यह समस्या उस समय और जटिल हो जाती है जब कंपनियों की कुल उत्पादन लागत विभिन्न कारकों से बढ़ गई हो। मसलन, मुद्रास्फीति के मौजूदा हालात में विनिर्माता कब तक कीमतों को बनाए रख सकते हैं? अगर कोई कंपनी इनपुट लागत बढऩे की वजह से उत्पादों के दाम बढ़ाने का फैसला करती है तो उसकी शिकायत मिलने पर एनएए क्या कार्रवाई करेगा? मौजूदा परंपरा के मुताबिक एनएए उस कंपनी से उत्पाद मूल्य में बढ़ोतरी की वजह पूछ सकता है और कंपनी से अपने फैसले को सही ठहराने के लिए जरूरी दस्तावेज पेश करने को कह सकता है। असल में यह उत्पाद की कीमत तय करने से ज्यादा कुछ नहीं है। ऐसे में तथाकथित कारोबारी सुगमता का क्या होगा?
Keyword: corporate, profit, NAA, GST, FMCG,,
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