बिजनेस स्टैंडर्ड - समझ की कमी
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समझ की कमी

संपादकीय /  September 19, 2018

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का पहेलीनुमा वक्तव्य देने का पुराना इतिहास रहा है। परंतु उत्तर प्रदेश में चीनी उत्पादन को लेकर दिया गया उनका हालिया वक्तव्य तो उन मानकों पर भी भारी पड़ता है। आदित्यनाथ ने राज्य के किसानों से कहा कि वे कम गन्ना बोएं क्योंकि अधिक चीनी के प्रयोग से मधुमेह होता है। इस बात ने सबको चकित कर दिया है। सबसे पहली बात तो यह कि किसी भी तरह के कार्बोहाइड्रेट शरीर की इंसुलिन संवेदनशीलता को प्रभावित कर सकते हैं और मधुमेह की वजह बन सकते हैं। केवल चीनी को इसका दोष नहीं  दिया जा सकता। दूसरी बात, उत्पादन और खपत दो अलग-अलग क्षेत्र हैं और इन पर अलग-अलग ही विचार किया जाना चाहिए। सबसे बढ़कर आदित्यनाथ का वक्तव्य दिखाता है कि उनमें बाजार आधारित अर्थव्यवस्था और प्रोत्साहन की नीति को लेकर समझ की किस कदर कमी है। सीधी सहज बात यह है कि आदित्यनाथ को यह समझना चाहिए कि अगर उत्तर प्रदेश के किसान बहुत अधिक गन्ना उगा रहे हैं तो ऐसा इसलिए कि सरकार उन्हें प्रोत्साहन दे रही है, उन्हें ऐसा करने के लिए भुगतान कर रही है। 

 
चीनी उत्पादन का क्षेत्र कृषि अर्थव्यवस्था का इकलौता सबसे जटिल और सुधार रहित क्षेत्र है। इसके लिए न केवल गन्ना किसानों की राजनीतिक मजबूती जिम्मेदार है बल्कि चीनी मिल मालिक भी इसके लिए उतने ही जवाबदेह हैं। कुछ राज्यों में चीनी मिलों पर शक्तिशाली राजनेताओं का नियंत्रण है। इसका परिणाम यह है कि दशकों से राज्य और केंद्र सरकारें इस क्षेत्र को सब्सिडी और संसाधन देती आ रही हैं। इनके चलते अतिशय उत्पादन शाश्वत समस्या बन गया है। अर्थशास्त्रियों ने कहा है कि भारत इस वित्त वर्ष में 3.5 करोड़ टन से अधिक चीनी का उत्पादन करेगा। यह हमारी घरेलू खपत की जरूरत से करीब 40 फीसदी अधिक है। देश में पहले ही एक करोड़ टन चीनी का भंडार मौजूद है। एक वैश्विक अर्थव्यवस्था में घरेलू मांग और आपूर्ति में ऐसी विसंगति कोई खास मायने नहीं रखती। भारत सरकार पहले ही निर्यात और आयात पर नियंत्रण कायम किए हुए है ताकि चीनी जैसी जिंसों की घरेलू कीमत का 'प्रबंधन' किया जा सके। इसका अर्थ यह हुआ कि भारतीय किसान कभी वैश्विक आपूर्ति शृंखला का हिस्सा बन ही नहीं पाए। इसके अलावा देश के चीनी उद्योग पर लगे जटिल नियंत्रण का एक अर्थ यह है कि देश के उच्च निर्यात को विश्व व्यापार संगठन में सफलतापूर्वक चुनौती दी जा सकती है। 
 
इस बीच किसानों को रियायत देते रहने के कारण ही इस वित्त वर्ष के आरंभ में ही सब्सिडी का बकाया 21,000 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका था। इसमें दो राय नहीं कि इस वर्ष अतिरिक्त उत्पादन के बाद इसमें और अधिक इजाफा होगा। देश के कुल गन्ना उत्पादन में उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 38 फीसदी है और जाहिर तौर पर उसके बजट पर भी इस बकाये का असर होगा। यह एक ऐसी नीति का परिणाम है जो गन्ना किसानों को प्रसन्न करने के लिए बनी और जिसके परिणामस्वरूप उनका प्रतिफल उनकी लागत से 90 से 100 फीसदी तक अधिक है। अतीत में गन्ने की कीमत तय करने के लिए सुधार करने के प्रयास हुए हैं  इसमें केंद्रीय बैंक के पूर्व गवर्नर सी रंगराजन के नेतृत्व वाली समिति की अनुशंसाएं भी शामिल हैं। परंतु उत्तर प्रदेश में आदित्यनाथ ने उनमें से किसी का क्रियान्वयन नहीं किया है। चीनी के अतिशय उत्पादन और सरकार के तनावग्रस्त बजट की समस्या का एक ही स्थायी हल है: गन्ना क्षेत्र में कुछ इस तरह सुधार करना ताकि किसानों को सीधे चीनी के बाजार से जोड़ा जा सके। इसके बाद अगर किसानों को आय समर्थन की आवश्यकता है तो कीमतों के साथ छेड़छाड़ के बजाय प्रत्यक्ष हस्तांतरण करना उचित होगा।
Keyword: sugar, farmer, mills, yogi adityanath,,
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