बिजनेस स्टैंडर्ड - इस साल ई-कॉमर्स नीति नहीं!
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इस साल ई-कॉमर्स नीति नहीं!

शुभायन चक्रवर्ती और करण चौधरी / नई दिल्ली September 18, 2018

भारत में डिजिटल कारोबार के लिए बेहतर माहौल बनाने और उसे नियमों के दायरे में लाने के लिए प्रस्तावित ई-कॉमर्स नीति इस साल आने की संभावना नहीं है। इस मामले से जुड़े सूत्रों ने यह संकेत दिया है। सरकार को प्रस्तावित नीति पर शुरुआती परिचर्चा पत्र पेश करने के बाद इस नीति को छोडऩे को मजबूर होना पड़ रहा है, जिसका कारोबारी संगठनों और ग्राहकों ने यह कहते हुए कड़ा विरोध किया कि यह ओला, मेक माई ट्रिप, पेटीएम सहित अन्य ई कॉमर्स फर्मों के पक्ष में है। वाणिज्य विभाग और अन्य मंत्रालयों के वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा कि हिस्सेदारों के साथ चर्चा के लिए अभी कोई तिथि नहीं तय की गई है और आम चुनाव नजदीक आ रहे हैं, ऐसे में अंतिम नीति संभवत: नई सरकार के गठन के बाद ही आने की संभावना है। 
 
इस प्रस्ताव के खिलाफ कई मंत्रालयों ने तर्क दिए थे। साथ ही प्रधानमंत्री कार्यालय के समक्ष प्रतिनिधिमंडलों ने अपना पक्ष रखा था। इसे देखते हुुए सचिवों की एक नई स्थायी समिति का गठन किया गया, जिसकी पहली बैठक पिछले सप्ताह हुई थी। एक अधिकारी ने कहा, 'नई समिति गठित करने का फैसला तब हुआ, जब यह पाया गया कि नीति को लागू करने की शुरुआती अंतिम तिथि अक्टूबर तक ऐसा किया जाना व्यावहारिक नहीं है।'  इसके साथ ही पिछले एक महीने से विदेशी निवेशक, वेंचर कैपिटल फंड और निजी इक्विटी कारोबारी अपना निवेश सुरक्षित करने में जुटे हैं। उद्योग के अनुमान के मुताबिक यह निवेश 75 अरब डॉलर से ज्यादा हो सकता है, जो विभिन्न डिजिटल कॉमर्स फर्मों में पिछले एक दशक में लगाया गया है। 
 
सूत्रों के मुताबिक देश में बड़े निवेशकों में से एक सॉफ्टबैंक ग्रुप, जिसने पेटीएम सहित कई कंपनियों में निवेश किया है, ने नीति आयोग सहित वाणिज्य एवं वित्त मंत्रालयों को पत्र लिखकर चिंता जताई। इसके साथ ही टाइगर ग्लोबल, सेकोया कैपिटल और अमेरिका, ब्रिटेन, सिंगापुर और संयुक्त अरब अमीरात सहित अन्य देशों के पीई इन्वेस्टमेंट्स फर्मों के प्रतिनिधिमंडल ने कई मंत्रालयों से मुलाकात की।  अमेरिका की एक निवेश फर्म के वरिष्ठ उपाध्यक्ष ने कहा, 'सॉफ्ट बैंक ने सरकार से बात की और साफ सुथरी व संतुलित ई-कॉमर्स नीति बनाने को कहा। ऐसी स्थिति में जहां कंपनी में 95 प्रतिशत धन निवेशकों का लगा हो, उन्हें कोई अधिकार नहीं हो, यह इन वैश्विक निवेशकों की चिंता का विषय है।' 
 
छोटे वेंचर फंडों ने भी कहा कि वे सॉफ्टबैंक ग्रुप, टाइगर ग्लोबल जैसे बड़े निवेशकों के प्रतिनिधियों के संपर्क में हैं, जिससे उनकी योजनाओं को लेकर सरकार के साथ चर्चा की जा सके। उद्योग से जुड़े एक व्यक्ति ने कहा, 'सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि वह विदेशी निवेशकों व अंतरराष्ट्रीय ई कॉमर्स फर्मों की सिफारिशों को शामिल करे। अगर आप मसौदा नीति तैयार करने में शामिल कंपनियों व लोगोंं की सूची देखें तो आप पाएंगे कि इसमें सिर्फ भारतीय कंपनियों के लोग हैं।'
 
बहरहाल वाणिज्य विभाग ने कहा कि औद्योगिक नीति और संवर्धन विभाग (डीआईपीपी) के सचिव रमेश अभिषेक की अध्यक्षता में गठित समिति केवल ई कॉमर्स से जुड़े समग्र मसलों पर ही विचार करेगी। अधिकारी ने कहा, 'इसकी बैठक हर महीने होगी लेकिन अगली बैठक की तिथि का फैसला नहीं किया गया है।' इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना तकनीक, रक्षा और वित्त मंत्रालय के अलावा रिजर्व बैंक और प्रवर्तन निदेशालय इस निकाय में शामिल हैं।  खासकर भंडार मॉडल आधारित ई-कॉमर्स मे सीमित प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को अनुमति दिए जाने के प्रस्ताव को लेकर कारोबारियों के संगठनोंं जैसे कन्फेडरेशन आफ आल इंडिया ट्रेडर्स  और स्वदेशी जागरण मंच ने सरकार पर दबाव बनाया है। 
Keyword: e commerce, policy, online, digital,,
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