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आसान नहीं है बैंकिंग संकट से निजात

अजय शाह /  September 18, 2018

बैंकों को अब पहले की तरह उच्च महंगाई और कम ब्याज दर के मिश्रण का लाभ नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में उनके लिए संकट से निजात पाना आसान नहीं रहा। विस्तार से बता रहे हैं अजय शाह

 
वर्ष 1991 के बाद के इतिहास में भारत तेजी और धीमेपन के दो दौर से गुजरा है। सन 1994 में निवेश में तेजी ने सन 1990 के दशक की चिंताओं को दूर किया और 2008 में निवेश में आई उछाल ने 2011 की कठिनाइयों को। रोचक प्रश्न यह है कि इस बार मंदी से निजात पाना इतना मुश्किल क्यों लग रहा है? इसकी व्याख्या का एक तत्त्व तो यह है कि मुद्रास्फीति में 4 फीसदी की कमी आई है। शुरुआत करते हैं तेजी और गिरावट के पहले दौर से। सन 1994-95 में निजी गैर वित्तीय कंपनियों की सकल जमा परिसंपत्ति 27.2 फीसदी की दर से बढ़ी। इसके बाद हमें एक के बाद एक छह झटके लगे। एशियाई संकट, सन 1998 में आरबीआई द्वारा मुद्रा का बचाव, वाजपेयी के परमाणु परीक्षण और वाई2के की घटना, आईटी क्षेत्र का नाटकीय पतन और अमेरिका में आतंकी हमला। इन घटनाओं में जबरदस्त निराशा का माहौल बनाया। इससे मंदी की शुरुआत हुई, फिर बैंकिंग संकट आया और शेयर बाजार भी गिरे। 
 
सकल जमा परिसंपत्ति वृद्घि दर 2002-03 में 7.7 फीसदी के निचले स्तर पर आ गई। यह 20 फीसदी की गिरावट थी। जब भी अर्थव्यवस्था दबाव और तनाव में आई, भारत ने कई उल्लेखनीय सुधार किए। इसके बाद तेजी और गिरावट का दूसरा दौर आया। वर्ष 2008-09 में एक बार फिर सकल जमा परिसंपत्ति वृद्घि 26.7 फीसदी के स्तर पर पहुंची और उसके बाद गिरावट का दौर आया। वर्ष 2015-16 में यह 6.7 फीसदी तक गिर गई। 2016-17 में यह सुधरकर 7.2 फीसदी रही। एक बार फिर हमें 20 फीसदी की गिरावट देखने को मिली। 
 
इन दो गिरावटों की कहानी दो बैंकिंग संकटों की कहानी की पृष्ठïभूमि तैयार करती है। वर्ष 1999-2003 में सीएमआईई डेटाबेस में आधा बैंक ऋण फम्र्स में उच्च तनाव वाला ऋण था। लगातार दो वर्ष तक ब्याज कवर अनुपात 1.5 से भी खराब रहा। कारोबारी चक्र के उठाव वाले दिनों में केवल 15 फीसदी बैंक ऋण ही फंसी हुई कंपनियों में करीब था। दूसरी गिरावट के दौर में हालात ज्यादा खराब हुए और लगभग 60 फीसदी बैंक ऋण फंसा हुआ था। इतिहास खुद को दोहराता नहीं है लेकिन इन दोनों अनुभवों को पलट कर देखना बहुत जानकारीपरक हो सकता है। इससे आज के संकट से निपटने की राह तलाशने में भी मदद मिल सकती है। पहली अवधि में एक कारक ऐसा था जिसने बैंकों की मदद की लेकिन वह अब नदारद है। वह कारक है मुद्रास्फीति। 
 
पहले खुदरा महंगाई की औसत दर 8 फीसदी थी। आरबीआई के पास कोई लक्ष्य नहीं था और हम मुद्रास्फीति से बहुत आराम से निपट रहे थे। 20 फरवरी, 2015 को पहली बार आरबीआई ने 4 फीसदी खुदरा महंगाई का लक्ष्य रखा। उसी समय मौद्रिक नीति ढांचा समझौता अस्तित्व में आया। मुद्रास्फीति का लक्ष्य बाद में आरबीआई अधिनियम में शामिल कर लिया गया।  जब आम परिवार 3 फीसदी की ब्याज दर पर अपना पैसा बैंक खातों में रख रहे थे और मुद्रास्फीति की दर 8 फीसदी थी तब उनकी वास्तविक आय 5 फीसदी ऋणात्मक थी। जब कंपनियां चालू खाते पर पैसा शून्य ब्याज पर रख रही थीं तो उनकी आय 8 फीसदी ऋणात्मक थी। इससे बैंकों को बहुत बड़ी राहत मिल रही थी। एक अन्य संबद्घ मुद्दा नॉमिनल यानी असमायोजित वृद्घि का है। पुराने समय में मुद्रास्फीति 8 फीसदी होती थी और जीडीपी वृद्घि दर अधिक रहती थी। बैंकों की बैलेंस शीट हर चार वर्ष में दोगुनी हो जाती थी। फंसी हुई परिसंपत्ति कुछ समय के लिए छिप जाती थी और बढ़ती बैलेंस शीट के बीच फंसा हुआ कर्ज कम खतरनाक प्रतीत होता था। इस बीच बैंकों और आरबीआई में बुरी खबर को छिपाने की प्रवृत्ति बढ़ती गई। 
 
ये कारक उन बैंकों के पक्ष में रहे जिनकी परिसंपत्तियां फंसी हुई थीं। हर वर्ष उनका मुनाफा समायोजित होता रहा। हर वर्ष उनकी बैलेंस शीट बढ़ती रही। कुछ ही वर्ष के भीतर एक संकटपूर्ण बैंकिंग व्यवस्था प्रबंधन योग्य नजर आने लगी।  अब हालात बदल चुके हैं। खुदरा महंगाई की दर 4 फीसदी है। आम परिवार बैंक बचत खाते में करीब 3 फीसदी की आय अर्जित कर रहे हैं और इसलिए उनकी वास्तविक प्राप्ति एक फीसदी ऋणात्मक है। यानी आम परिवारों का नुकसान 4 फीसदी कम हुआ है। वर्ष 1991-2015 के अनुभव को अगर 2015 के बाद के अनुभव के समक्ष रखकर देखें तो ऐसा हुआ है। इसी प्रकार कंपनियों को अभी भी चालू खाते के लिए शून्य फीसदी ब्याज मिल रहा है इसलिए उनका नुकसान 4 फीसी ऋणात्मक है। यानी पुराने दिनों से तुलना की जाए तो इसमें भी 4 फीसदी का सुधार हुआ है। बैंक अभी भी प्रतिदेय जमा को लेकर सही स्थिति में नहीं हैं और वहां वास्तविक प्रतिफल दर नकारात्मक है परंतु बैंक जिस कदर मुनाफा कमा रहे थे वह अब बंद हो गया है। 
 
इसी तरह बैंकों की बैलेंस शीट में वृद्घि भी धीमी पड़ी है। मुद्रास्फीति 8 फीसदी से घटकर 4 फीसदी रह गई है और कुल वृद्घि दर धीमी पड़ी है। आम घरों के पास विकल्प अधिक हैं और वे शायद ही बैंक में पैसा रखना चाहें। जाहिर है बैंकों की बैलेंस शीट अब धीमी गति से बढ़ेगी।  इन बातों से समझा जा सकता है कि आखिर क्यों बैंकिंग संकट का दूसरा संकट पहले की तुलना में अधिक कठिन है। हालांकि अब हमारे पास नया आईबीसी का प्रावधान है लेकिन बैंक के ग्राहकों के साथ तो अभी भी ज्यादती हो रही है। परंतु वृहद आर्र्थिक माहौल बदल चुका है। मुद्रास्फीति 4 फीसदी घटी है और नॉमिनल जीडीपी वृद्घि दर भी कम हुई है। बैंकों को प्रतिदेय जमा से मिलने वाली सब्सिडी में कमी आई है अैर अब समय के साथ और बैलेंस शीट वृद्घि के साथ संकट से निजात पाना मुश्किल हो गया है। 
 
एक बात जो दूसरी गिरावट के वक्त बदली है वह है कि आईबीसी का प्रादुर्भाव। आईबीसी में भूषण स्टील जैसी परिसंपत्तियों को संभालने की क्षमता है जो हर वर्ष 30 लाख टन इस्पात तैयार कर रही थी। आईबीसी आसानी से नये मालिक के अधीन उसको 50 लाख टन सालाना उत्पादन वाली इकाई में बदलने की क्षमता रखता है। यह बदलाव पहली गिरावट के दौर में उपलब्ध नहीं था। हमें आईबीसी के क्रियान्वयन को गहराई से देखना होगा। ताकि हम हर वर्ष कुछ बड़े लेनदेन से हर महीने ऐसे बड़े लेनदेन तक का सफर तय कर सकें।
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