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ग्रामीण युवाओं को कृषि से जोड़े बगैर नहीं बनेगी बात

खेती-बाड़ी
सुरिंदर सूद /  September 17, 2018

भारत के लिए आबादी की बढ़ती उम्र अभी उतनी गंभीर समस्या नहीं बनी है लेकिन यही बात कृषि के बारे में नहीं कही जा सकती है। मुश्किल से पांच फीसदी युवा आबादी ही खेती से जुड़ी है जबकि ग्रामीण आबादी की करीब 60 फीसदी संख्या खेती और संबंधित गतिविधियों में आंशिक या पूर्ण रूप से संलग्न है। स्पष्ट है कि आधुनिक युवाओं का कृषि से मोहभंग हो चुका है और एक पेशे के तौर पर उन्होंने इसे काफी हद तक तिलांजलि दे दी है। इसका नतीजा यह हुआ है कि खेती में लगी आबादी तेजी से उम्रदराज होती जा रही है। कृषि के भविष्य के लिहाज से ऐसा होना काफी बुरा है क्योंकि इससे कृषि अपनी पूरी क्षमता तक पहुंचने से वंचित रह सकता है। 

 
कृषि कार्यों में युवाओं की भागीदारी काफी अहम है क्योंकि वे अधिक ऊर्जावान और उत्पादक होने के साथ ही नए विचारों एवं उन्नत तकनीक अपनाने के मामले में काफी उदार होते हैं। इसके अलावा युवाओं में जोखिम लेने का साहस होता है और वे धारा के विपरीत जाकर भी काम करने से परहेज नहीं करते हैं। कृषि क्षेत्र को शारीरिक दमखम के अलावा मानसिक ताकत की भी जरूरत है। इसके अलावा उत्साही एवं उद्यमी प्रवृत्ति की भी दरकार है जो युवाओं में भरपूर होती है।  शहरी युवाओं की तरह ग्रामीण क्षेत्र के युवा भी बेहतर करियर एवं विकास संभावनाओं की तलाश कर रहे हैं लेकिन उन्हें गांवों में यह नजर नहीं आ रहा है। विकास कार्यक्रमों और नीतियों की नाकामी के चलते खेती अब भी मुनाफे का धंधा नहीं बन पाया है जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में जीवन की गुणवत्ता भी समुचित रूप से सुधर नहीं पाई है। इस वजह से ग्रामीण युवाओं का कृषि एवं ग्राम्य जीवन से अलगाव होता जा रहा है। कृषि-योग्य भूमि के आकार में लगातार गिरावट, नवोन्मेषी विचारों एवं तकनीकी ज्ञान के अभाव, वित्त की सहज उपलब्धता न होने, कृषि उत्पादों की कारगर मार्केटिंग सुविधा के अभाव, निर्णय-निर्माण प्रक्रिया और नीतिगत मामलों में युवाओं की सीमित भागीदारी होने के अलावा एक व्यवसाय के तौर पर खेती की खराब छवि होने से ग्रामीण युवा तेजी से इससे विमुख हो रहे हैं। इन सभी बिंदुओं पर तत्काल एवं समग्र तौर पर ध्यान देने की जरूरत है ताकि युवा आबादी को गांवों में रहने के लिए प्रेरित किया जा सके। 
 
कृषि में युवाओं की रुचि बनाए रखने की जरूरत का अहसास थोड़ी देर से हुआ है। मशहूर कृषि विशेषज्ञ एम एस स्वामीनाथन की अगुआई वाले राष्ट्रीय किसान आयोग ने भी वर्ष 2006 की अपनी रिपोर्ट में इसका जिक्र किया था।  उस रिपोर्ट के बाद संसद में 2007 में स्वीकृत राष्ट्रीय किसान नीति में भी इसे एक उद्देश्य के तौर पर शामिल किया गया था। निस्संदेह उसके बाद से इस दिशा में कुछ नीतिगत कदम उठाए गए हैं लेकिन उनका असर सीमित इलाके तक ही रहा है।  भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने युवाओं को कृषि की तरफ आकर्षित करने और उन्हें बनाए रखने के लिए 2015-16 में एक अनूठे कार्यक्रम 'आर्या' की शुरुआत की थी। लेकिन अभी तक इसका प्रसार केवल 25 जिलों में ही हो सका है। कुछ समय पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इसका विस्तार 100 जिलों तक करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। आर्या योजना के तहत करीब 14 लाख युवाओं को हर साल रोजगारपरक प्रशिक्षण दिया जाएगा।
 
इन कार्यक्रमों का सही दिशा में क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के लिए एक रोडमैप भी तैयार किया गया है। हाल ही में नई दिल्ली में संपन्न एक सम्मेलन में इस रोडमैप को अंतिम रूप दिया गया। युवाओं को कृषि कार्यों के लिए आकृष्ट एवं प्रोत्साहित करने (माया) के मकसद से इस सम्मेलन का आयोजन ज्ञान-आधारित कृषि से जुड़ी विभिन्न संस्थाओं ने किया था। इस सम्मेलन में स्वीकृत रणनीति में युवाओं को रोजगार तलाशने वाले की जगह रोजगार देने वाला बनाने की बात कही गई है। सम्मेलन के आयोजकों में शामिल संस्था ट्रस्ट फॉर एडवांसमेंट ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज के चेयरमैन आर एस परोदा का मानना है कि अगर युवा रोजगार प्रदाता बन जाते हैं तो वे ग्रामीण क्षेत्रों में बदलाव के एजेंट बन सकते हैं।
 
कृषि कार्यों में युवाओं को आकर्षित करने के लिए तैयार इस रोडमैप में युवाओं को आर्थिक प्रगति और सामाजिक प्रतिष्ठा के तमाम मौके मुहैया कराने और खेती एवं संबद्ध कार्यों में आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है। रोडमैप में कहा गया है कि अगर युवाओं को बढिय़ा तरीके से तैयार किया जाए तो शिक्षित ग्रामीण युवा भी एग्री-क्लिनिक जैसी सेवाओं का हिस्सा बन सकते हैं। एग्री-क्लिनिक में शिक्षित युवा किसानों को फसलों के चयन, बीमारियों से बचाव, कीटनाशकों के इस्तेमाल और रोजमर्रा की समस्याओं से दो-चार होने में मदद कर सकते हैं। इसके अलावा शिक्षित युवा ग्रामीण इलाकों में कृषि-सेवा केंद्र भी खोल सकते हैं जहां पर छोटे एवं सीमांत किसानों को किफायती दरों पर महंगे कृषि उपकरण मुहैया कराए जाएंगे। इन उपकरणों के इस्तेमाल से छोटे एवं सीमांत किसान भी कम लागत पर अपनी कृषि उपज बढ़ा सकते हैं। 
 
इस रोडमैप में किसानों की तरफ से तैयार फसलों को भौतिक एवं ऑनलाइन बाजारों में बेचने में युवाओं को सहयोगी बनाने की भी बात कही गई है। पढ़े-लिखे युवा इलेक्ट्रॉनिक नैशनल एग्रीकल्चर मार्केट (ई-नाम) में किसानों की तरफ से मोलभाव कर कृषि उत्पादों की खरीद-बिक्री कर सकते हैं। सरकार भी अपने स्तर पर निवेश अनुदान, आसान कर्ज और दूसरी सुविधाएं मुहैया कराने में कृषि व्यवसाय से संबंधित स्टार्टअप में अपना योगदान दे सकती है। इसी तरह की सुविचारित धारणाओं की मदद से ग्रामीण क्षेत्र के युवाओं को कृषि कार्यों की तरफ आकर्षित किया जा सकता है। सरकार को इनके कारगर क्रियान्वयन पर फौरन ध्यान देने की जरूरत है।
Keyword: agri, farmer, crop, youth, MSP, एमएसपी,
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