बिजनेस स्टैंडर्ड - बागवानी की चुनौतियां
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बागवानी की चुनौतियां

संपादकीय /  September 17, 2018

कृषि मंत्रालय का फसल संबंधी नवीनतम अनुमान बताता है कि वर्ष 2017-18 में बागवानी क्षेत्र की उपज ने खाद्यान्न उत्पादन को लगातार छठे साल भी पीछे छोड़ दिया है। यह अनुमान कृषि में उभर रहे कुछ नए रुझानों का भी जिक्र करता है जिनमें वाजिब नीतिगत कदमों की दरकार है। एक उल्लेखनीय बिंदु यह है कि 2014 और 2015 में सूखे के चलते खाद्यान्नों की पैदावार में जहां अस्थिरता और गिरावट दिख रही है वहीं बागवानी ने अपनी टिकाऊ प्रगति कायम रखी है और मॉनसून का भी उस पर कोई असर नहीं पड़ा है। फलों और सब्जियों के अलावा मसालों, जड़ी-बूटियों, और फूलों जैसे दूसरे बागवानी उत्पादों का रकबा भी बढ़ रहा है। साफ है कि कृषि क्षेत्र में विविधता बढ़ रही है और किसान धीरे-धीरे अधिक मुनाफा देने वाले फलों एवं सब्जियों के उत्पादन जैसी नकदी खेती की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। इस दिशा में बदलाव जारी रखने की जरूरत है। बागवानी के साथ पशुपालन एवं मत्स्यपालन को भी जोड़ दें तो ये मिलकर कृषि में उच्च-मूल्य वर्ग का सृजन करते हैं। अगर समुचित रूप से प्रोत्साहन दिया गया तो कृषि क्षेत्र में व्याप्त असंतोष को दूर करने में भी अहम भूमिका निभा सकते हैं।

 
यह रुझान इस लिहाज से भी अहम है कि किसी खास सरकारी समर्थन केे बगैर ही ऐसा हुआ है। अगर अनाज की तरह बागवानी पर भी समुचित ध्यान दिया गया होता तो भारत इस मामले में दुनिया का अग्रणी देश बन चुका होता। वर्तमान में ताजा एवं प्रसंस्कृत फलों और सब्जियों के वैश्विक बाजार में भारत की हिस्सेदारी बेहद कम है। भारत के इन उत्पादों का दुनिया में दूसरे नंबर का उत्पादक होने के बावजूद यह स्थिति है। एक अन्य वजह से भी बागवानी को सरकारी प्रोत्साहन की जरूरत है। देशवासियों की आय में हो रही क्रमिक बढ़ोतरी के चलते फलों एवं सब्जियों का उपभोग और मांग दोनों ही बढ़ रहे हैं जबकि अनाजों के मामले में गिरावट देखी जा रही है। वैसे अतीत में चारों तरफ व्याप्त भूख को देखते हुए खाद्यान्नों को प्राथमिकता देना सही भी था। लेकिन अब यह लक्ष्य काफी हद तक हासिल किया जा चुका है। ऐसी स्थिति में अपेक्षाकृत अधिक पोषक फलों और सब्जियों की उपलब्धता सुनिश्चित करने को तवज्जो देनी होगी। 
 
दूसरी फसलों की तरह बागवानी उत्पादों के लिए भी लाभकारी मूल्य पर विपणन को सुनिश्चित किया जाना चाहिए। फलों एवं सब्जियों को संरक्षित रखने के लिए शीत-गृहों, वातानुकूलित परिवहन और जल्द खराब होने वाले उत्पादों के प्रसंस्करण की सुविधाएं मुहैया कराने पर भी ध्यान देना होगा। सीधे उत्पादकों से संपर्क रखने वाले संगठित खुदरा क्षेत्र को प्रोत्साहन देने से भी वाजिब दाम पर बिक्री सुनिश्चित की जा सकती है। न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) वाले उत्पादों की सूची में एक भी फल या सब्जी का नहीं होना दुर्भाग्यपूर्ण है। एमएसपी की सूची में कुछ प्रमुख फलों एवं सब्जियों को भी शामिल करना बेहद जरूरी है। खासकर घरों में आम इस्तेमाल वाले आलू, प्याज और टमाटर को एमएसपी दायरे में लाया जाना चाहिए। इन उत्पादों की पैदावार और कीमतों में काफी उठापटक देखने को मिलती है। वर्ष 2017-18 में भी इन जिंसों की उपज में गिरावट देखी गई थी। बहुत जल्दी खराब होने वाले इन कृषि जिंसों के आयात-निर्यात से संबंधित स्थायी नीति नहीं होने को काफी हद तक इनकी कीमतों में अस्थिरता के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। जल्द खराब होने वाले कृषि उत्पादों के मूल्य स्थिरीकरण के लिए एक कोष वर्षों से मौजूद है लेकिन मामूली फंड और निकम्मे प्रशासन के चलते यह शायद ही अपना मकसद पूरा कर पाता है। अब समय आ गया है कि सरकार प्रमुख फलों एवं सब्जियों की उपज को घरेलू एवं निर्यात बाजार में बढ़ती मांग के अनुरूप बढ़ाने के लिए एक सक्षम एवं दीर्घकालिक नीतिगत पहल करे। ऐसा नहीं होने पर शायद कृषि में विविधता की मौजूदा प्रवृत्ति कायम न रह पाए।
Keyword: agri, farmer, crop, monsoon, MSP,,
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