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मध्यस्थता के दौरान दिवालिया संहिता के तहत समाधान पर लगाम

अदालत से
एम जे एंटनी /  September 16, 2018

जब किसी मध्यस्थता अधिकरण ने विवाद के समाधान के लिए फैसला सुना दिया हो और उसके खिलाफ अपील की गई हो तो फिर उस मामले में ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) को लागू नहीं किया जा सकता है। उच्चतम न्यायालय ने के कृष्णन बनाम मेसर्स विजय निर्माण कंपनी वाद में यह फैसला सुनाया है। इस दौरान न्यायालय ने राष्ट्रीय कंपनी कानून अधिकरण और अपीलीय अधिकरण के फैसले को भी निरस्त कर दिया। दोनों कंपनियों के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 67 के दो अतिरिक्त लेन बनाने के लिए एक करार हुआ था। बकाया भुगतान को लेकर दोनों पक्षों के बीच विवाद हो गया जिसके बाद मामला मध्यस्थता में चला गया। हालांकि मध्यस्थता अधिकरण के फैसले से कोई भी पक्ष संतुष्ट नहीं था लिहाजा मध्यस्थता एवं मेलमिलाप अधिनियम की धारा 34 के तहत अपील दायर की गई। इसी दौरान दिवालिया संहिता की धारा 9 के तहत भी एक अर्जी दायर कर दी गई। अधिकरण ने कहा कि मध्यस्थता अधिनियम के तहत दायर अपील प्रासंगिक नहीं है लिहाजा फैसले पर स्थगन नहीं दिया जा सकता है। जब मामला उच्चतम न्यायालय में पहुंचा तो उसने कहा कि अधिकरणों का रवैया गलत था लिहाजा उन्हें निरस्त किया जा रहा है। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि परिचालक लेनदार ऋण वसूली प्रक्रिया के विकल्प के तौर पर दिवालिया संहिता को समय-पूर्व लागू नहीं कर सकते हैं।

 
प्रभावित होने पर तीसरे पक्ष को अपील का अधिकार
 
बम्बई उच्च न्यायालय ने कहा है कि मध्यस्थता प्रक्रिया के निर्णय से अगर  तीसरा पक्ष भी प्रभावित होता है तो वह अपील दायर करने का हकदार है। न्यायालय ने प्रभात स्टील बनाम एक्सेल मेटल वाद में दायर 13 अपीलों का निपटारा करते हुए मध्यस्थता एवं मेलमिलाप अधिनियम 1996 की धारा 37 के तहत एक आदेश पारित किया। इन सभी अपीलों में अलग-अलग बिंदुओं को रखा गया था लेकिन उनमें कानून का समान सवाल उठाया गया था। इस पर न्यायालय ने कहा कि याची कंपनियों को ऐसी स्थिति में दीवानी अदालत में नहीं भेजा जा सकता है। उच्चतम न्यायालय और कई उच्च न्यायालय भी कह चुके हैं कि जब मध्यस्थता प्रक्रिया में सीधे तौर पर शामिल नहीं होने वाला पक्ष भी अगर उसके अंतरिम आदेश से प्रभावित होता है तो वह उसके खिलाफ अपील दायर कर सकता है। बम्बई उच्च न्यायालय ने भी इस राय से सहमति जताते हुए कहा कि अगर प्रभावित पक्ष को अपील का अधिकार नहीं दिया जाता है तो वह न्याय की अवधारणा के विपरीत होगा।
 
अनावश्यक विलंब पर मध्यस्थ की नियुक्ति निरस्त
 
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने कहा है कि अगर एक मध्यस्थ अनावश्यक विलंब की वजह से अपने दायित्वों का निर्वहन करने में नाकाम रहता है तो उसका निर्णय निरस्त हो जाएगा और उसकी जगह दूसरे मध्यस्थ को यह कार्य सौंप दिया जाएगा। मध्यस्थता एवं मेलमिलाप अधिनियम के मुताबिक जब किसी मध्यस्थ का निर्णय निरस्त होता है तो उसकी जगह पर वैकल्पिक मध्यस्थ की नियुक्ति पूर्व-निर्धारित मानदंडों के हिसाब से ही होनी चाहिए। देवकी नंदन स्टील वक्र्स बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य बिजली बोर्ड मामले में न्यायालय ने एक सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता को मध्यस्थ नियुक्त किया था। लेकिन उन्होंने इस दायित्व के निर्वहन में कोई रुचि नहीं दिखाई। बिजली बोर्ड भी चार वर्षों तक इस पर चुप्पी साधे बैठा रहा। न्यायालय ने मध्यस्थ नियुक्त किए गए पूर्व अभियंता और बिजली बोर्ड दोनों के रवैये को लापरवाही भरा बताते हुए उसकी निंदा भी की। बहरहाल न्यायालय ने मध्यस्थता प्रक्रिया के जल्द निपटारे के लिए एक वकील को नया मध्यस्थ नियुक्त किया है।
 
लापरवाही होने पर बीमा कंपनी की देनदारी घटी
 
अगर वाहन का मालिक ही उसे चला रहा है और लापरवाही बरतने की वजह से उसकी मौत हो जाती है तो बीमा कंपनी को कम मुआवजा राशि का ही भुगतान करना होगा। उच्चतम न्यायालय ने नैशनल इंश्योरेंस कंपनी बनाम आशालता भौमिक मामले में यह निर्णय दिया है। तेज रफ्तार में कार चलाने की वजह से हुए हादसे में एक कारोबारी की मौत हो गई थी। उसकी पत्नी और बच्चों ने मुआवजे के लिए वाहन दुर्घटना दावा अधिकरण में अर्जी लगाई जिसने बीमा कंपनी को 10 लाख रुपये देने का आदेश दिया। बीमा कंपनी ने इस आदेश के खिलाफ त्रिपुरा उच्च न्यायालय में अपील की लेकिन उसे कोई राहत नहीं मिली। फिर यह मामला उच्चतम न्यायालय लाया गया जहां अधिकरण के फैसले को पलटते हुए मुआवजे की राशि को 2 लाख रुपये कर दिया गया है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि कार चालक लापरवाही से तेज रफ्तार में गाड़ी चला रहा था लिहाजा निजी दुर्घटना के लिए निर्धारित बीमा राशि ही उसके परिजनों को मुआवजे के तौर पर दी जाएगी।
 
गुम इंदिरा विकास पत्रों की राशि चुकाने का आदेश
 
राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने डाक अधीक्षक की अपील को निरस्त करते हुए कहा है कि गुमशुदा इंदिरा विकास पत्रों की परिपक्वता राशि का भुगतान उन्हें करना होगा। ओडिशा में रहने वाले कुछ लोगों के डाक विभाग से खरीदे गए इंदिरा विकास पत्र गुम हो गए थे। उन्होंने इनकी गुमशुदगी के बारे में पुलिस से शिकायत भी की थी लेकिन परिपक्वता अवधि पूरा होने पर उनका भुगतान का दावा डाक विभाग ने नकार दिया। कई वर्षों बाद भी डाक विभाग के पास उस राशि के दूसरे दावेदार नहीं आए। इस आधार पर आयोग ने कहा कि डाक विभाग अनिश्चित काल तक उस रकम को अपने पास नहीं रख सकता है। ऐसी स्थिति में यह उचित एवं तर्कसंगत होगा कि समुचित पहचान एवं एहतियात बरतते हुए डाक विभाग परिपक्वता राशि का बंटवारा कर दे। वैसे विभाग का कहना था कि इस मामले में आयोग का अधिकारिता नहीं बनती है क्योंकि याची उपभोक्ता की श्रेणी में ही नहीं आते हैं। लेकिन उपभोक्ता आयोग ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया।
 
'असाधारण स्थिति में ही विवेकाधिकार का इस्तेमाल'
 
कलकत्ता उच्च न्यायालय ने साफ किया है कि किसी उच्च न्यायालय का अपने अधिकार-क्षेत्र वाली अदालतों के संचालन की शक्ति काफी व्यापक है लेकिन विवेकाधिकार का इस्तेमाल असाधारण स्थितियों में ही किया जाना चाहिए। बज बज कंपनी लिमिटेड बनाम नैशनल इंश्योरेंस कंपनी मामले में न्यायालय ने यह व्यवस्था दी है। इस मामले में पश्चिम बंगाल राज्य उपभोक्ता आयोग ने क्षेत्राधिकार तय करने में गलती कर दी थी। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत 1 करोड़ रुपये तक की राशि वाले मामलों की ही सुनवाई की शक्ति राज्य उपभोक्ता आयोग को दी गई है। इस मामले में याची कंपनी ने 34 लाख रुपये के मुआवजे का दावा किया था लेकिन उसका बीमा कवर 1 करोड़ रुपये से अधिक था। निधारित सीमा से अधिक राशि होने की दलील देते हुए राज्य उपभोक्ता आयोग ने इस मामले की सुनवाई करने से मना कर दिया। इस पर कंपनी ने उच्च न्यायालय में अर्जी लगाते हुए कहा कि आयोग ने क्षेत्राधिकार तय करने में गलती की है लिहाजा न्यायालय उसे सुनवाई का निर्देश दे। इस पर न्यायालय ने कहा कि सामान्यत: यह मामला राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग के विचारार्थ जाना चाहिए लेकिन वह भी अपने विवेकाधिकार का इस्तेमाल करते हुए राज्य उपभोक्ता आयोग को मामले की सुनवाई करने को कह  सकता है। उसने राज्य उपभोक्ता आयोग से अपने क्षेत्राधिकार के निर्धारण में हुई गलती सुधारते हुए मामले की सुनवाई करने का निर्देश दिया है। 
Keyword: supreme court, high court, IBC, उच्चतम न्यायालय,
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