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पनडुब्बी निर्माण में रूस और एलऐंडटी की साझेदारी

दोधारी तलवार
अजय शुक्ला /  September 16, 2018

रक्षा मंत्रालय फ्रांस से खरीदे गए 36 राफेल विमानों को लेकर विवादों में उलझा हुआ है। इस बीच उसने 400,000 करोड़ रुपये मूल्य के रक्षा उपकरण खरीदने की प्रक्रिया शुरू की है। यह प्रक्रिया पूरी होने में भले वर्षों लगें लेकिन भाजपा चुनाव प्रचार में इनका इस्तेमाल कर सकती है। इन सौदों में 125,000 करोड़ रुपये के 110 लड़ाकू विमान, 75,000 करोड़ रुपये के 57 नौसैनिक विमान, 40,000 करोड़ रुपये की एस-400 रक्षा प्रणाली, 15,000 करोड़ रुपये की आर्टिलरी गन, 10,000 करोड़ रुपये की राइफल, 35,000 करोड़ रुपये के युद्धपोत और 25,000 करोड़ रुपये में दो नौसैनिक हेलीकॉप्टर शामिल हैं।

 
ये आवश्यक तो हैं लेकिन विवादास्पद भी। उधर प्रोजेक्ट 75-आई के रूप में 40,000 करोड़ रुपये की एक खरीद ऐसी भी है जो अविवादित भी है, मेक इन इंडिया के अनुरूप भी और अत्यंत आवश्यक भी। इसमें देश में छह पनडुब्बियां बनाने की बात शामिल है। इसके तहत एक भारतीय कंपनी विदेशी निर्माता से तकनीक हासिल कर निर्माण करेगी। निविदा प्रक्रिया आरंभ हो चुकी है। वैश्विक पनडुब्बी निर्माताओं को जून 2017 में ही सूचना दी जा चुकी है और अक्टूबर में उनकी प्रतिक्रिया भी मिल चुकी है। नौसेना प्रमुख के मुताबिक चार वैश्विक कंपनियों ने रुचि दिखाई है। रूस से रोसोबोर्नएक्सपोर्ट, जर्मनी से टिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स, स्वीडन से कॉकस और फ्रांस से नेवल ग्रुप। नेवल ग्रुप पहले ही मझगांव डॉक लिमिटेड, मुंबई (एमडीएल) में छह स्कॉर्पियन पनडुब्बियों के निर्माण में साझेदार है। जापान की मित्सुबिशी हेवी इलेक्ट्रिकल्स ने इसलिए इनकार कर दिया क्योंकि वह ऑस्ट्रेलिया को पनडुब्बी दे रही है। 
 
एडमिरल लांबा ने कहा कि 2018 के अंत तक इस दिशा में प्रगति होने की आशा है लेकिन खरीद प्रक्रिया की जटिलता के चलते इसमें काफी समय लग सकता है। देश को हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती मौजूदगी का जवाब देना है। ऐसे में पनडुब्बियों की तत्काल जरूरत है। चीन जल्दी ही 60 पनडुब्बियों का परिचालन करेगा जबकि भारतीय नौसेना 15 पर सिमट रही है। इस क्षेत्र में पाकिस्तान भी चुनौती बना हुआ है। सन 1999 में हमने 24 पनडुब्बियां बनाने की 30 वर्षीय योजना बनाई थी लेकिन आज तक केवल एक ही बन सकी है जबकि पांच निर्माणाधीन हैं। ऐसे में प्रोजेक्ट 75-आई की शुरुआत अनिवार्य हो गई है।
 
देशहित में इस परियोजना को नामांकन आधार पर जल्द शुरू करना आवश्यक है। यानी बोली हासिल करने वाला अपना साझेदार स्वयं चुन ले। लार्सन ऐंड टुब्रो रूस की रोसोबोर्नएक्सपोर्ट का तकनीकी साझेदार है। दोनों को साथ मिलकर अमूर श्रेणी की छह पनडुब्बियां बनानी चाहिए। रूसी साझेदार का चयन भारत की 30 वर्षीय योजना के अनुरूप ही होगा क्योंकि केंद्रीय कैबिनेट ने कहा था कि अगर पहली छह पनडुब्बी पश्चिमी होती हैं तो दूसरी पूर्वी मूल की हों ताकि पूर्व और पश्चिम की बेहतरी हासिल हो सके। रूस की फॉक्सट्रॉट और किलो श्रेणी की पनडुब्बियों को लेकर नौसेना का अनुभव बहुत अच्छा रहा है। यही बात लीज पर ली गई दो परमाणु पनडुब्बियों पर भी लागू होती है। अमूर श्रेणी की पनडुब्बियां किलो श्रेणी की मौजूदा पनडुब्बियों से बहुत बेहतर हैं। रूसी पनडुब्बी पर ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल की तैनाती करना काफी आसान होगा। 
 
देश के निजी पोत कारखानों में एलऐंडटी इकलौता है जिसके पास पनडुब्बी बनाने का बुनियादी ढांचा और क्षमता दोनों हैं। चेन्नई के निकट नया कठुआपल्ली शिपयार्ड, गुजरात के हजीरा की कमी पूरी करता है। यह अरिहंत श्रेणी की परमाणु क्षमतायुक्त पनडुब्बियों के लिए मशीनरी तैयार करता है। उसके पास रूसी डिजाइन और धातु उद्योग के साथ काम करने का गहरा अनुभव है। हमारे देसी युद्धपोत निर्माण में भी इन दोनों को अहमियत दी जाती है। प्रोजेक्ट 75-आई में डीआरडीओ द्वारा विकसित एआईपी सिस्टम को शामिल करने की आवश्यकता है। एलऐंडटी ही इसे जोडऩे वाली कंपनी है। कंपनी के एक वरिष्ठ इंजीनियर के मुताबिक उसके पास प्रोजेक्ट 75-आई के तहत बनने वाली रूसी पनडुब्बी की 85 फीसदी तकनीक पहले से मौजूद हैं। एलऐंडटी के अलावा केवल अनिल अंबानी की रिलायंस नेवल ऐंड इंजीनियरिंग लिमिटेड के पीपावाव शिपयार्ड में पनडुब्बी बनाने की क्षमता है। परंतु आपूर्ति के मामले में उसका कमजोर प्रदर्शन उसे एक खराब विकल्प साबित करता है। राफेल मामले में रिलायंस डिफेंस का नाम उछलने के बाद सरकार भी हिचक सकती है।
 
प्रोजेक्ट 75-आई का दूसरा बड़ा दावेदार एमडीएल है। उसका कहना है कि छह स्कॉर्पियन पनडुब्बियां बनाते वक्त उसे खासा अनुभव हो चुका है। अगर सरकारी कंपनी एमडीएल को सामरिक साझेदार बनने का अवसर मिला भी तो वह कीमत के मामले में एलऐंडटी का मुकाबला शायद ही कर पाए। एमडीएल के पास बुनियादी ढांचा है लेकिन उसे तकनीक हस्तांतरण के लिए ज्यादा पैसे चुकाने होंगे। वैसे भी स्कॉर्पियन का निर्माण फ्रांसीसी तरीके से हुआ है। रूस की तकनीक अलग है। इसके अलावा छह स्कॉर्पियन के बाद भी एमडीएल के पास काफी काम है। इसमें कई पुरानी पनडुब्बियों का रखरखाव शामिल है जो समय लेगा। स्वयं स्कॉर्पियन को उन्नत करने और उनमें एआईपी लगाने का वक्त करीब आ रहा है। पहली पनडुब्बी आईएनएस कलावरी गत वर्ष सेवा में आई और 2023 में उसका उन्नयन करना होगा। यह काम एमडीएल ही करेगी। 
 
सवाल यह है कि अमेरिका रूस से इस पनडुब्बी खरीद पर क्या कहेगा? यहां अमेरिका का मामला कमजोर प्रतीत होता है क्योंकि उसने भारत के साथ पनडुब्बी तकनीक साझा करने से हमेशा इनकार किया है। अगर वह प्रतिबंध लगाने की धमकी देता है तो भारत जवाब में कह सकता है कि वह हमें वर्जीनिया श्रेणी की परमाणु पनडुब्बी बनाने दे तो हम अमूर को त्याग देंगे। 
Keyword: Rafale, defense, Submarine, india, BJP,,
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