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राफेल सौदा, पारदर्शिता और सरकार का दंभ

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  September 16, 2018

अगर 'मूर्खता' बहुत कड़ा शब्द लग रहा हो तो आप इसके लिए कोई कोमल शब्द भी चुन सकते हैं, बशर्ते कि आपको लगे कि यह कोमल शब्द सरकार के उस दंभ को ठीक से परिभाषित कर रहा है जो वह इन दिनों दिखा रही है। सरकार का यह दंभ साफ दिख रहा है क्योंकि वह करीब 1,000 करोड़ डॉलर के सौदे को लेकर किसी भी सवाल का जवाब देने से लगातार इनकार कर रही है। इसके लिए वह दो लोकतांत्रिक सरकारों के बीच गोपनीयता के प्रावधान का हवाला दे रही है जबकि सारा खर्च संसदीय और लेखा निगरानी के अधीन होता है। या फिर वह दिन पर दिन हास्यास्पद दलीलें दे रही है।

 
आज हथियार बाजार में प्लेटफॉर्म, हथियारों और अन्य उपकरणों को लेकर कोई गोपनीयता नहीं बरती जाती। अगर आप राफेल के साथ मीटियर मिसाइल खरीद रहे हैं तो पाकिस्तानी और चीनी वायुसेना ही नहीं कोई नौसिखिया भी आपको उनके बारे में जानकारी दे देगा। इस दौरान गोपनीयता बरतनी हो तो वह संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और नीतियों को लेकर होनी चाहिए। मीटियर मिसाइल की कीमतों को लेकर हम जाने कब से खुली चर्चा देख सुन रहे हैं। इसकी सार्वजनिक चर्चा में कोई दिक्कत नहीं थी। केवल अहम ही आड़े आ रहा था: कैसे कोई रक्षा सौदे में हम पर सवाल उठा सकता है? क्या हम बोफोर्स के जमाने की कांग्रेस की तरह हैं?
 
अब भाजपा को लग रहा है कि क्यों बोफोर्स के बाद रक्षा खरीद करने वाली किसी भी सरकार को चोर कहे जाने की आशंका बनी रहती है। इस समस्या से तीन तरह से निपटा जा सकता है। पहला तरीका ए के एंटनी वाला: कुछ मत खरीदो और दुनिया भर की निजी हथियार कंपनियों पर प्रतिबंध लगा दो। उनके कार्यकाल में हुई इकलौती रक्षा खरीद रूस के साथ हुई और वह पूरी तरह सरकारी सौदा था। वहां मूल्य को लेकर पारदर्शिता या प्रतिस्पर्धा का कोई सवाल नहीं था। इसके अलावा अमेरिका से खुद उपकरण खरीदे गए। दूसरा, पारदर्शी प्रक्रिया की स्थापना। साहसिक ढंग से खरीदारी लेकिन उठने वाले सवालों के जवाब देने के लिए तैयार रहना। तीसरा, किसी सम्राट की तरह खरीदारी करना। यानी तमाम प्रक्रियाओं को धता बताते हुए खरीदारी करना और किसी भी सवाल का जवाब देने से इनकार करना। यह दंभ से भरी हुई मूर्खता है और दिखाता है कि कैसे मोदी सरकार अपने लिए गड्ढा खोद लिया है। 
 
हर बीतते दिन के साथ सरकार अपने लिए गड्ढा गहरा करती जा रही है। पहले 126 राफेल विमान खरीदे जाने थे और उनमें से 108 सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) द्वारा बनाए जाने थे। इस सौदे को रद्द करने के लिए यह दलील दी जा रही है कि कंपनी के पास बुनियादी ढांचा मौजूद नहीं था। दुनिया में कोई भी कंपनी ऐसी नहीं होगी जिसके पास किसी खास विदेशी लड़ाकू विमान के निर्माण का पूरा बुनियादी ढांचा पहले से मौजूद हो। कोई भी जवाबदेह व्यक्ति बता देगा कि एचएएल ये विमान बनाने के लिए किसी भी अन्य कंपनी की तुलना में बेहतर विकल्प है क्योंकि वह दशकों से विमान बनाती है। यह अलग किस्सा है कि भारत ने वाजपेयी के दौर में बड़ा अवसर गंवा दिया था जब भारतीय वायु सेना मिराज 2000 की पूरी असेंबली लाइन को भारत स्थानांतरित करना चाहती थी। अगर ऐसा होता तो एचएएल राफेल के निर्माण के लिए तैयार होती। परंतु जॉर्ज फर्नांडिस एकल वेंडर खरीद के हामी नहीं थे। 
 
सरकार एक सीधा सच नहीं बताएगी कि 126 राफेल विमान खरीदने पर सेना और नौसेना के बजट पर बुरा असर होता। यही वजह थी तात्कालिक जरूरत के मुताबिक दो बेड़े पर्याप्त समझे गए। कोई यह कहना नहीं चाहता है कि एचएएल को किसी दूसरी कंपनी के पक्ष में नहीं त्यागा गया बल्कि इसलिए त्यागा गया क्योंकि ऑर्डर का आकार छोटा हो गया था और मिलकर विमान बनाने की बात नए सौदे में शामिल नहीं थी। आपातकालीन खरीद के लिए यह दलील तैयार की गई कि वायु सेना की लड़ाकू शक्ति खतरनाक स्तर तक गिर गई थी। यह तथ्य तो हम 15 वर्ष से जानते हैं। पहली बार विमानों की जरूरत 2001 में जताई गई थी। यह राफेल सौदा एक ऐसे देश की अक्षमता पर टिप्पणी है जो महाशक्ति बनने का स्वप्न देखता है और अपनी वायुसेना के लिए दशकों की अहम जरूरत के बाद दो जंगी विमानों के बेड़े खरीद रहा है। ये दोनों बेड़े भी 2022 तक पूरी तरह लड़ाकू क्षमता से लैस नहीं होंगे। भारत जैसे देश को या तो अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा को किसी बड़ी महाशक्ति से आउटसोर्स करना चाहिए या फिर कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश को पाकिस्तान और चीन को सौंप देना चाहिए। सेना की जरूरत खत्म करके उस धन को स्वास्थ्य और शिक्षा पर खर्च किया जा सकता है। 
 
सन 2014 में मोदी ने एक मजबूत निर्णय क्षमता संपन्न राष्ट्रीय सुरक्षा नीति देने का वादा भी किया था। उन्होंने संप्रग पर आरोप लगाया था कि वह सशस्त्र बलों को कमजोर कर रही है और उनके लिए नए हथियार नहीं खरीद रही है। लोगों ने उस वक्त उन पर यकीन कर लिया था। अब उन लोगों का मोदी से सवाल पूछना जायज है। इसका जवाब रक्षा क्षेत्र में मेक इन इंडिया के चुनिंदा तमाशों और एयर शो से नहीं दिया जा सकता। रक्षा विनिर्माण क्षेत्र में एफडीआई हास्यास्पद रूप से कम है। उसका तो उल्लेख भी नहीं किया जा सकता। यह सरकार भी उतनी ही कमजोर दिल, अकल्पनाशील, जरूरत से ज्यादा सतर्क और नाकाम रही है जितनी कि संप्रग सरकार। बात सिर्फ इतनी है कि संप्रग ने कभी बेहतरी का वादा नहीं किया जबकि भाजपा ने किया था। 
 
राफेल अगले वर्ष भारतीय आकाश में उड़ता नजर आएगा। ये दोनों बेड़े आएंगे लेकिन भाजपा सरकार ने पूरा मामला जिस तरह बिगाड़ दिया है उसका असर आने वाले वर्षों में रक्षा खरीद पर पड़ेगा। रक्षा क्षेत्र के मेक इन इंडिया की बात करें तो यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि दशकों में पहली बार हो रहे रक्षा सौदे में एक ऐसे कारोबारी घराने को लाभार्थी बनाया गया जो अत्यंत विवादित है। वह भी तब जबकि देश में अभी तक निजी क्षेत्र की किसी कंपनी द्वारा कोई बड़ा सैन्य उपकरण नहीं बनाया गया है। भारत जैसे देश को इसका अभ्यस्त होने में वक्त लगेगा क्योंकि यहां तो निजी विमानन कंपनियों और फोन कंपनियों को अपनाने में भी आधा दशक लग गया। जब एक ऐसा कारोबारी घराना नए नवेले रक्षा सौदे में शामिल हो जिसकी अनेक परियोजनाओं को लेकर विवाद हो चुका हो, तो आपको समझ जाना चाहिए कि समस्या उत्पन्न होगी। 
 
अब आप कहेंगे कि वह राफेल के लिए एक स्क्रू तक नहीं बनाएगी या उसे दसॉ से मिलने वाला ठेका 600 से 1,200 करोड़ रुपये से अधिक का नहीं होगा। अधिकांश ठेका राफेल निर्मित एक लोकप्रिय जेट फाल्कॉन के पंख बनाने के लिए है। भले ही आप सच बोलें लेकिन लोग वही मानेंगे जो वे मानना चाहते हैं। आत्मघाती विचित्रता की अति तो तब हुई जब उक्त कारोबारी घराने ने मीडिया घरानों और पत्रकारों (मुझ समेत) को नोटिस भेजना शुरू कर दिया। उन्हें शायद लगा कि इससे हर कोई खामोश हो जाएगा। मुझे अंदाजा नहीं है कि राफेल मामले में सरकार के दावे को किस बात ने अधिक नुकसान पहुंचाया। ऑफसेट लाभार्थी के अतिरंजित दावे या इस दंभ भरे नोटिस ने? दुख की बात है कि इस पूरे प्रकरण से वायु सेना और रक्षा क्षेत्र में मेक इन इंडिया के स्वप्न को धक्का पहुंचा। 
 
देश का कोई भी रक्षा सौदा, रक्षा दलालों, फिक्सरों, कॉर्पोरेट लॉबीइस्टों और स्वघोषित 'सब जानने वालों' के बीच घोटाला कहे जाने को अभिशप्त है। बोफोर्स के बाद के दशक में हर सरकार ने ऐसे ही आरोप और अपमान से बचने के लिए प्रक्रिया को घुमाया। मोदी सरकार के पास अवसर था कि वह पारदर्शिता, खुलासे और संबद्घता के साथ इसे बदल दे लेकिन उसने यह अवसर गंवा दिया।
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