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आर्थिक मोर्चा

संपादकीय /  September 16, 2018

अर्थव्यवस्था के समक्ष उत्पन्न चुनौतियों से निपटने के लिए उठाए जाने वाले कदमों को लेकर जारी अटकलों पर सरकार ने पिछले कुछ दिनों में विराम लगा दिया है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि सरकार बजट में घोषित राजकोषीय सुदृढ़ीकरण के रास्ते पर चलने के लिए प्रतिबद्ध है। राजकोषीय सुदृढ़ीकरण के लिए चालू वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 3.3 फीसदी तक सीमित रखना होगा। जेटली ने कहा है कि पूंजीगत व्यय में कटौती किए बगैर ही यह लक्ष्य हासिल कर लिया जाएगा। उनकी दलील है कि बजटीय पूंजीगत व्यय का 44 फीसदी हिस्सा पहले ही व्यय हो चुका है और बचे हुए समय में बाकी राशि भी खर्च कर लिए जाने का उन्हें भरोसा है। लागत बढऩे से आर्थिक वृद्धि को समर्थन देने की जरूरत के लिहाज से यह एक अच्छी खबर है। यह साफ तौर पर राजस्व संग्रह पर ध्यान केंद्रित करता है। 

 
वैसे इस मामले में सरकार डांवाडोल नजर आ रही है। जहां जेटली का यह कहना सही है कि प्रत्यक्ष कर संग्रह का बढऩा अच्छी बात है वहीं अप्रत्यक्ष कर के मामले में स्थिति उतनी साफ नहीं है। भले ही जेटली कहते हैं कि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को लेकर स्थिति अब व्यवस्थित हो चुकी है लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। एकीकृत जीएसटी पूल के वितरण में देरी इस ओर इशारा करती है कि अप्रत्यक्ष करों के बारे में सटीक अनुमान लगा पाना अभी मुश्किल ही रहने वाला है। वित्त मंत्री को विश्वास है कि गैर-कर राजस्व की प्राप्ति लक्ष्य के अनुरूप रहेगी लेकिन कई विश्लेषकों को इसकी कम  संभावना दिख रही है। बहरहाल अर्थव्यवस्था की स्थिति को लेकर सरकार का यह भरोसा ऐसे समय सामने आया है जब वैश्विक चिंताएं सभी उभरती अर्थव्यवस्थाओं को परेशान कर रही हैं। खासकर मुद्राओं की कीमत में आई गिरावट बड़ी चिंता का विषय बन गई है। पिछले एक साल में एशिया की बदहाल मुद्राओं में रुपया भी शामिल है। गिरते रुपये के अलावा कच्चे तेल की कीमतें बढऩे से भी चालू खाते के घाटे पर दबाव पड़ रहा है। हालांकि विदेशी भुगतान खाता कमजोर होते हुए भी अभी खतरे की जद में नहीं है लेकिन सरकार ने चालू खाते के घाटे को काबू में रखने के लिए पांच-सूत्री योजना की घोषणा कर दी है। इस योजना के कई पहलुओं से हम परिचित हैं क्योंकि वे 2008 और 2013 में घोषित तरीकों से मिलते-जुलते हैं। विनिर्माण कंपनियों को अब तीन साल की परिपक्वता अवधि के बजाय एक साल के लिए भी विदेश से उधार की इजाजत दे दी गई है। 
 
ढांचागत क्षेत्र में विदेशी वाणिज्यिक उधारी के लिए जरूरी सुरक्षा कवच की जरूरत को खत्म कर दिया गया है। वहीं कॉर्पोरेट बॉन्ड में विदेशी निवेश की अविवेकपूर्ण सीमा भी हटा दी गई है। इन बदलावों के जरिये जिस व्यापक पहलू पर जोर दिया गया है वह काफी चौंकाने वाला है। ये उपाय उसी धारणा की पुष्टि करते हैं कि केवल सीमित अवधि का पूंजी प्रवाह ही भारत की समस्याओं का समाधान कर सकता है। लेकिन पुराने पैकेजों से हमें यह सबक मिला है कि भारत को असल में टिकाऊ पूंजी प्रवाह के प्रोत्साहन की दरकार है क्योंकि त्वरित रकम आम तौर पर अस्थिर होती है और अर्थव्यवस्था को मौजूदा दौर की परिस्थितियों में असुरक्षित बना देती है। सबसे अधिक चिंताजनक तो गैर-जरूरी आयात में कटौती करने की सरकारी मंशा है। बाजार-संचालित अर्थव्यवस्था में आयात की जरूरत के बारे में तय करना सरकार का काम नहीं है। निस्संदेह व्यापार उदारीकरण में किसी भी तरह के बदलाव को वैश्विक निवेशक नीतिगत अस्थिरता की निशानी के तौर पर ही देखेंगे। यह कदम भारत को अधिक आकर्षक बाजार बनाने के बजाय टिकाऊ पूंजीगत प्रवाह बाधित करने का ही काम करेगा। लिहाजा इस कदम के बारे में दोबारा सोचने की जरूरत है। आयात संबंधी पाबंदियां लगाने के बजाय निर्यात प्रोत्साहन की जरूरत है लेकिन सरकार ने इस दिशा में कुछ नहीं किया है।
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