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मेरी नजर में महंगे हैं भारतीय शेयर

पुनीत वाधवा /  September 14, 2018

तेल कीमतों में तेजी, व्यापार जंग की चिंता और रुपये में गिरावट ने पिछले कुछ सप्ताह के दौरान भारतीय शेयर बाजार में आई तेजी को हवा दी है। 'द ग्लूम, बूम ऐंड डूम रिपोर्ट' के संपादक एवं प्रकाशक मार्क फेबर ने पुनीत वाधवा से बातचीत में कहा कि वैश्विक शेयर एवं बॉन्ड बाजार में एक बार फिर तेजी का बुलबुला दिख रहा है और लगता है कि बाजारों और केंद्रीय बैंकों ने 2008 के वित्तीय संकट से कोई सबक नहीं सीखा। पेश हैं मुख्य अंश:

 
भारतीय रुपया एशिया में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा बन गई है जबकि एसऐंडपी बीएसई सेंसेक्स और निफ्टी50 अपनी सर्वकालिक ऊंचाई पर है। इस पर आप क्या कहेंगे?
 
मैं समझता हूं कि रुपये में गिरावट की प्रवृत्ति अभी जारी रहेगी। हालांकि निकट भविष्य में जरूरत से अधिक बिकवाली दिख रही है और इस साल अमेरिकी डॉलर के मुकाबले इसमें 10 फीसदी से अधिक की गिरावट आई है। इसलिए मैं कहता हूं कि अमेरिकी डॉलर को लेकर भी मैं बहुत अधिक आशान्वित नहीं हूं जैसा अन्य लोग हैं। इसके चपेट में आकर रुपया भी अपना आधार खो रहा है। कुछ सप्ताह पहले हमने तुर्की की मुद्रा लिरा को धाराशायी होते देखा था। अर्जेंटीना की मुद्रा पेसो, ब्राजील की मुद्रा रियाल को भी समस्याओं का सामना करना पड़ा है। दक्षिण अफ्रीकी मुद्रा का भी यही हाल है। इन सब कारणों से भारतीय रुपया सहित अन्य एशियाई मुद्राओं में भी गिरावट दिख रही है। मैं हमेशा से भारत में सख्त मौद्रिक नीति का पक्षधर रहा हूं। शेयर बाजार से जुड़े कई भारतीय भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन की सख्त मौद्रिक नीति को लेकर उनकी आलोचना करते हैं। लेकिन मैं उनकी प्रशंसा करता हूं क्योंकि उन्होंने रुपये को स्थिर किया था। उनके कार्यकाल के दौरान रुपये में स्थिरता थी। लेकिन अब यह पहले जैसा स्थिर नहीं है। ऐसा लगता है कि निकट भविष्य में रुपये की जरूरत से अधिक बिक्री होगी लेकिन दीर्घावधि में उसमें गिरावट जारी रहेगी।
 
रुपया कितना नीचे जा सकता है?
 
साल 1990 में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया करीब 12 के स्तर पर था। जबकि 2008-09 में यह 39 के स्तर तक पहुंच गया और उसके बाद से ही गिरावट का दौर शुरू हो गया। मैं बिल्कुल आश्वस्त हूं कि रुपया 100 के स्तर को पार करेगा। लेकिन वहां तक लुढ़कने में उसे छह महीने लगेंगे या दस महीने जिस पर चर्चा हो सकती है। मुझे नहीं लगता कि यह अगले छह महीने 100 रुपये प्रति डॉलर तक लुढ़केगा। लेकिन अगले 10 साल में रुपया उस स्तर तक जरूर लुढ़केगा।
 
उभरते बाजारों के लिए आपका क्या नजरिया है? उभरते बाजारों में भारत का प्रदर्शन कब तक बेहतर रहेगा?
 
विकसित बाजारों के मुकाबले उभरते बाजार अपेक्षाकृत कम महंगे हैं। यदि आप उभरते बाजार के शेयरों के मूल्यांकन की तुलना अमेरिका से करेंगे तो वे सस्ते नहीं दिखेंगे। हालांकि इसके लिए हरेक मामले पर अलग से विचार करने की जरूरत होगी। भारत में ऐसे शेयर भी हैं जो करीब 50 गुना आय पर कारोबार कर रहे हैं लेकिन अन्य बाजारों में मुद्रा संबंधी समस्याएं और शेयर मूल्य में कमजोरी दिख रही है। उदाहरण के लिए तुर्की, ब्राजील, अर्जेंटीना, मेक्सिको, दक्षिण अफ्रीका और कुछ एशियाई बाजारों में कुछ ऐसे शेयर भी हैं जो अधिक महंगे नहीं हैं। लेकिन वे 2009 की तुलना में अधिक सस्ते भी नहीं हैं। मुझे लगता है कि भारतीय शेयर महंगे हैं। यदि मुझे दांव लगाना होगा तो मेरा मानना है कि अगले छह से 12 महीने के दौरान इसमें बढ़त के बजाय गिरावट ही दिखेगी। भारत का जबरदस्त प्रदर्शन शुद्ध रूप से रुपये के संदर्भ में है। 
 
हाल में भारत ने वित्त वर्ष 2018-19 की पहली तिमाही के लिए 8.2 फीसदी जीडीपी का आंकड़ा जारी किया है। क्या आप इसे मानते हैं?
 
देश की समृद्धि को मापने के लिए जीडीपी वृद्धि को पैमाना मानने पर कई सवाल पैदा होते हैं। अमेरिका में जीडीपी बढ़ रहा है लेकिन उससे कहीं अधिक रफ्तार के साथ उधारी का स्तर भी बढ़ रहा है। अमेरिकी सरकार के घाटे को छोड़ दिया जाए तो वहां कोई वृद्धि नहीं दिखेगी। जीडीपी मापने का यह एक दोष है। दूसरा, यदि हम अमेरिकी डॉलर में भारत में जीडीपी को मापते हैं तो कोई वृद्धि नहीं दिखेगी। हां, आप कह सकते हैं कि अमेरिकी डॉलर में भारतीय जीडीपी को मापना उचित नहीं है। लेकिन मेरा कहना यह है कि अर्जेंटीना की अर्थव्यवस्था को भी स्थानीय मुद्रा में ही आंकना चाहिए।
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