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मकसद के लिए बगावत

एम जे एंटनी /  September 14, 2018

देश के शीर्ष न्यायालय में पिछले आठ महीने के दौरान जो खलबली वाली स्थिति बनी थी अब वह पूरी तरह निष्फल दिखती है। इस साल जनवरी में तीन अन्य न्यायाधीशों के साथ न्यायमूर्ति रंजन गोगोई भी उस मशहूर संवाददाता सम्मेलन का हिस्सा बने जो अदालत की कार्यप्रणाली को लेकर विद्रोह के सुर का प्रतीक बना। इसमें मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ विद्रोह की आवाज बुलंद की गई थी लेकिन उन्होंने परंपरागत आधार पर ही उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश रंजन गोगोई को देश के सर्वोच्च न्यायिक पद पर बिठाने की सिफारिश कर दी। इसके बाद कानून मंत्रालय ने गुरुवार को एक अधिसूचना में जानकारी दी कि न्यायमूर्ति रंजन गोगोई को देश का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया है। न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा के मुख्य न्यायाधीश के पद से सेवानिवृत होने के बाद गोगोई 3 अक्टूबर को अपना पदभार ग्रहण करेंगे। न्यायमूर्ति गोगोई का कार्यकाल 13 महीने से थोड़ी अधिक अवधि का होगा और वह 17 नवंबर, 2019 को सेवानिवृत होंगे। 

 
न्यायमूर्ति गोगोई उन चार वरिष्ठ न्यायाधीशों में शामिल थे जिन्होंने मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ अप्रत्याशित विद्रोह व्यक्त करते हुए यह चेतावनी दी थी कि लोकतंत्र खतरे में है। तीन बागी न्यायाधीशों के साथ मिलकर उन्होंने आरोप लगाया कि बिना किसी स्पष्ट मापदंड के कई संवेदनशील मामले मुख्य न्यायाधीश की पसंद वाले खंडपीठों को सौंपे जा रहे हैं। 12 जनवरी के बवाल के बाद न्यायमूर्ति गोगोई ने जनता को आश्वासन दिया कि सभी मतभेदों को संस्थान के भीतर ही सुलझा लिया जाएगा। उन्होंने जो अनुमान लगाया अब वह सच हो गया है। न्यायमूर्ति गोगोई ने न्यायपालिका की तरफ से लोकतंत्र पर खतरे की चेतावनी का मुद्दा उठाया लेकिन दिलचस्प बात यह भी है कि उन्होंने यह ब्योरा नहीं दिया कि लोकतंत्र कैसे खतरे में है। ऐसे में आने वाले महीने में वह जो भी कदम उठाएंगे शायद उससे ही उनके आरोपों के पक्ष से जुड़ी बातों का अंदाजा मिल पाए। पिछले महीने उच्चतम न्यायालय ने लिखा कि अधीनस्थ न्यायालय जीवन रक्षक प्रणाली पर हैं और उनके पास बुनियादी जरूरतों के लिए भी पैसे की कमी है। अपीलीय अदालतों में भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। हाल के वर्षों में शीर्ष अदालत के दो मुख्य न्यायाधीशों ने उच्चतम न्यायालय के माहौल की तुलना मछली बाजार से की थी। हालांकि मामलों की दशा बदलाव लाना और लंबित मामलों पर सुनवाई करना दुरूह काम होगा। न्यायाधीश गोगोई के सहयोग के लिए एक नया कोलेजियम (वरिष्ठ न्यायाधीशों का एक समूह) होगा जो खासतौर पर न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच की दूरी में एक सामंजस्य बिठाने की कोशिश करेगा। 
 
आम चुनाव अगले साल होने हैं और अदालत में अयोध्या मामले से जुड़ी सुनवाई भी होनी है। न्यायमूर्ति गोगोई उस पीठ का भी हिस्सा रहे हैं जिसने राष्ट्रीय नागरिक पंजी पर कदम बढ़ाने के लिए कहा था। उन्होंने लोकपाल की नियुक्ति में देरी के मुद्दे को भी उठाया है। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा द्वारा दी गई कार्यसूची के मुताबिक वह सार्वजनिक हितों वाले मामले को देखेंगे ऐसे में आने वाले महीनों में उन्हें ऐसी ज्यादातर याचिकाओं पर सुनवाई करनी होगी जिन्हें राजनीतिक रंग दिया जा सकता है। निश्चित तौर पर इसका अर्थ यह है कि अब उन्हें अशांत जलप्रवाह में अपनी नौका खेने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। हालांकि न्यायमूर्ति गोगोई ने खुद को कठोर रुख वाला व्यक्ति साबित किया है। वह उस पीठ का हिस्सा थे जब कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सी एस कर्णनन को न्यायाधीशों को धमकी देने के लिए दोषी साबित किया गया था। गोगोई के पीठ ने ही कहा था कि इन विज्ञापनों में केवल राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और देश के मुख्य न्यायाधीश की फोटो ही लगाई जा सकती है। 
 
उन्होंने हिंदू महिला संपत्ति अधिकार कानून के तहत फैसला सुनाया कि एक हिंदू पुरुष के निधन के बाद उसकी विधवा पत्नी संयुक्त परिवार की संपत्ति में हिस्सेदार होगी। उन्होंने हाल ही में सामान्य वकीलों को वरिष्ठ वकील के स्तर पर लाने के लिए कुछ नियम निर्धारित किए और इस मुद्दे पर वकील समुदाय की राय ही बंटी हुई थी। उन्होंने ट्रेडमार्क, आयकर और संकटग्रस्त उद्योगों से जुड़े अहम मुद्दों पर भी फैसला सुनाया। न्यायमूर्ति गोगोई के पीठ ने बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता अमिताभ बच्चन और करोड़पति टीवी शो से जुड़ी उनकी आमदनी से संबंधित मामले में बंबई उच्च न्यायालय के उस आदेश का खंडन कर दिया जिसमें राजस्व अधिकारियों द्वारा उनकी आमदनी के पुनर्मूल्यांकन के अधिकार को ही खारिज किया गया था। 
 
हाल में आई एक किताब के मुताबिक उनके पिता केशव चंद्र गोगोई चाहते थे कि उनका बेटा मुख्यमंत्री बनने के बजाय देश का मुख्य न्यायाधीश बने। उनका यह सपना अब सच हो रहा है। ऐसा कहा जाता है कि उनके पास कोई कार या बड़ा मकान नहीं है। उनकी मां एक सामाजिक कार्यकर्ता थीं जिन्होंने अपना घर उनको दिया है। वह उन चुनिंदा न्यायाधीशों में से एक हैं जिन्होंने शीर्ष अदालत की वेबसाइट पर अपनी संपत्ति का खुलासा किया है। 1954 में जन्में गोगोई ने दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज और लॉ फैकल्टी से स्नातक करने के बाद गौहाटी उच्च न्यायालय में वकालत शुरू की। 2001 में उच्च न्यायालय में उनकी पदोन्नति एक न्यायाधीश के तौर पर हुई। बाद में वह पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बने। 2012 में वह उच्चतम न्यायालय से जुड़े। पूर्वोत्तर से वह पहले मुख्य न्यायाधीश होंगे। 
 
न्यायमूर्ति गोगोई मितभाषी हैं और उन्हें सार्वजनिक मंचों पर कम ही देखा गया है। हाल में उन्होंने जो कहा है उससे उनकी सोच का अंदाजा मिलता है मसलन उन्होंने कहा, 'स्वतंत्र पत्रकार और कभी-कभार कोलाहल करने वाले न्यायाधीश भी लोकतंत्र की सुरक्षा की पहली पंक्ति हैं।' दिल्ली में भी उन्होंने जो कुछ कहा उससे यह अंदाजा हुआ कि वह न्यायपालिका की सक्रियता का समर्थन करते हुए संघर्ष कर रहे हैं। जब देश भर में इस बात को लेकर चिंता है कि अन्य संस्थाएं कमजोर हो रही हैं ऐसे ही वक्त में न्यायमूर्ति गोगोई ने आश्वस्त कराने वाले ये शब्द कहे।
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