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स्थापित खिलाड़ी बनाम नए पथ के राही

मनीष सभरवाल और संदीप अग्रवाल /  September 14, 2018

नियामकीय अड़चनों से प्रतिस्पद्र्धा कम होती है, असमानता बढ़ती है और रोजगार सृजन की संभावनाएं भी घटती हैं। बता रहे हैं मनीष सभरवाल और संदीप अग्रवाल

 
अर्थशास्त्री जोसेफ शूम्पीटर ने तीव्र एवं कड़ी प्रतिस्पद्र्धा को पूंजीवाद की सबसे अहम खासियत बताते हुए कहा था कि यह अर्थव्यवस्था को एक ऐसे होटल के रूप में तब्दील कर देता है जो हमेशा भरा रहता है लेकिन वहां रहने वाले लोग बदलते रहते हैं। लेकिन नियामकीय जटिलता, बड़े आकार और महत्त्वाकांक्षा से उपजी नाकामी ने शूम्पीटर के इस परिवर्तनशील होटल को धराशायी कर दिया और उसके स्थान पर ईगल्स के गाने 'होटल कैलिफोर्निया' की तर्ज पर इसे एक ऐसी जगह बना दी जहां 'आप अपनी पसंद से किसी भी समय जा सकते हैं लेकिन कभी भी निकल नहीं सकते हैं'।
 
नियामकीय गतिरोध प्रतिस्पद्र्धा को हतोत्साहित करता है और विद्रोही तेवर वाले स्टार्टअप, छोटी कंपनियों और पहली पीढ़ी के उद्यमियों के बजाय पहले से स्थापित, बड़ी कंपनियों और संपर्कवान उद्यमियों का पक्षपोषण करता है। हम बड़े पैमाने पर कारोबारी सुगमता की वकालत करते हुए सुधारों को अमलीजामा पहनाने के पक्षधर हैं ताकि भारत को उद्यमशीलता, अधिक रोजगार अवसरों के सृजन और प्रतिस्पद्र्धा के लिए अधिक मुफीद जगह बनाया जा सके। भारत नई राह पर चलने वाले उद्यमियों के लिए 1955 में लाए गए अवाडी प्रस्ताव के बाद एक प्रतिकूल जगह बन गया था। अवाडी प्रस्ताव ने भारत में लाइसेंस राज की स्थापना का आधार तैयार किया था। उसके बाद कामयाब उद्यमियों ने अपना अधिकांश समय दिल्ली में बिताना शुरू कर दिया था क्योंकि बेरहम नियमों वाले लाइसेंस राज में आपके ऊंचे संपर्क कारोबारी रणनीति पर भारी पड़ सकते थे। उस समय आपको विपणन पर नहीं बल्कि वितरण पर ध्यान देने की जरूरत थी। मानव संसाधन के बजाय प्रशासन पर ध्यान देना जरूरी था, कंपनी वित्त के बजाय लेखा-जोखा को तवज्जो देना था। वह एक ऐसी कारोबारी व्यवस्था थी जिसमें ग्राहक नहीं बल्कि बंधक हुआ करते थे। ऐसे में 1991 में शुरू हुए आर्थिक उदारीकरण ने भारत के कॉर्पोरेट जगत के बंधन ढीले करने में अहम भूमिका निभाई। फिर भी अर्थव्यवस्था को औपचारिक दर्जा देने, भ्रष्टाचार के खात्मे और नियामकीय गतिरोधों के मोर्चे पर कार्रवाई को नजरअंदाज किया गया। कायदे-कानूनों के लिखित स्वरूप और उनके जमीनी क्रियान्वयन में भेद होने जैसी अनौपचारिकता के चलते विधि के शासन को लेकर एक तरह का हास्य पैदा होता रहा। हमारी कानूनी व्यवस्था ऐसी रही है कि वह अनौपचारिकता को जन्म देती है और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। 
 
हालांकि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी), मुखौटा कंपनियों पर नकेल कसने, नोटबंदी और रियल एस्टेट नियमन एवं विकास (रेरा) अधिनियम जैसे हालिया सुधार अर्थव्यवस्था को व्यापक स्तर पर औपचारिक बना रहे हैं। लेकिन नियामकीय अड़चनों की तरफ कभी भी उतना ध्यान नहीं दिया गया जितना दिया जाना चाहिए था। इसकी वजह संभवत: हमारे स्थायी सामान्यज्ञ लोक सेवक हैं जो भूमिकाएं बदलने के मामले में तो बेहतरीन हैं लेकिन कई बार बदतर होते हैं। इसकी वजह यह है कि लोक सेवक छोटे कामों के लिए काफी बड़े होते हैं और बड़ी बातों के लिए काफी छोटे साबित होते हैं। आज भी तमाम नियम, अनुमति, पंजीकरण, लाइसेंस और फाइलिंग संबंधी प्रावधान विनिर्माण क्षेत्र में सक्रिय किसी भी कर्मचारी के जीवन का अनिवार्य हिस्सा है।
 
बड़े कारखाने इन नियामकीय अड़चनों को अपने सलाहकारों या अपने संपर्क अधिकारियों के जरिये दूर करते हैं। उनके सलाहकार अक्सर नियामकीय संस्थाओं के ही सेवानिवृत्त अधिकारी होते हैं। लेकिन छोटी कंपनियों और पहली बार कारोबार की दुनिया में कदम रखने वाले नए उद्यमियों को फंड जुटाने, कर्मचारियों की नियुक्ति और ग्राहकों को अपने साथ जोडऩे में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में छोटी कंपनियों और नए उद्यमियों के लिए नियामकीय बाध्यताओं पर खरा उतरना काफी भारी पड़ता है और उनके अस्तित्व के लिए भी खतरा पैदा हो जाता है। हमारी कुल श्रमशक्ति में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी के महज 11 फीसदी होने की तमाम व्याख्याओं में ढांचागत, दक्षता और पूंजी की कमी जैसे कारण गिनाए जा सकते हैं। लेकिन एक कारण नियामकीय अड़चन भी है। चीन से आने वाले निर्यात में बड़ा हिस्सा पिछले 25 वर्षों में गठित बहुराष्ट्रीय कंपनियों या उनकी सहयोगी इकाइयों का है। सच तो यह है कि भारत शायद कभी भी कुल श्रमशक्ति में विनिर्माण क्षेत्र के अंशदान के मामले में ब्रिटेन, अमेरिका और चीन (क्रमश: 45, 33 और 28 फीसदी) की बराबरी नहीं कर पाएगा लेकिन भारत का 11 फीसदी का आंकड़ा तो बहुत ही खराब है। वैश्विक व्यापार में वृद्धि की दर समृद्ध देशों की आपसी राजनीति के चलते सुस्त पड़ रही है लेकिन आने वाले समय में यह फिर से रफ्तार पकड़ेगी। हमें दो स्तरों पर खुद को पुनर्गठित कर भारत को रोजगार सृजन के लिए एक मुफीद जगह बनाने की तैयारी करनी चाहिए। रणनीतिक स्तर पर तर्कसंगत आधार, संस्थानीकरण और विशेषज्ञता पर ध्यान देना होगा जबकि मात्रात्मक एवं गुणात्मक संपर्क से अवरोधों का उन्मूलन करना होगा।
 
हमें नियमन एवं कानून निर्माण में अपने स्तर को ऊंचा उठाने की जरूरत है। उपभोक्ता हितों के संरक्षण, सूचनात्मक असमता, वाह्यता और बाजार विफलता जैसे पहलुओं को ध्यान में रखते हुए ही दखल की इजाजत दी जानी चाहिए। हमारे बहुतेरे कानूनों का जन्म किसी सवाल का जवाब तलाशने के दौरान हुआ है (इससे कानून का स्पष्ट एवं सुनिश्चित उद्देश्य नहीं रह जाता है) या किसी अतिक्रमण को रोकने के लिए उन्हें बनाया गया है। डिजिटलीकरण एक स्वागत-योग्य कदम है लेकिन सरकारी व्यवस्था में सूचना प्रौद्योगिकी का अत्यधिक इस्तेमाल करना कुछ वैसा ही है कि एटीएम मशीन को संचालित करने के लिए उसके पीछे पैसे निकालने के लिए एक कर्मचारी बिठाकर रखा गया हो। डिजिटलीकरण के लिए चलाई जा रही सरकारी परियोजनाओं के स्वरूप में बदलाव की जरूरत है। फिलहाल किसी सरकारी वेबसाइट पर पासवर्ड की मदद से लॉगिंग करने के बाद ही उस पर फॉर्म अपलोड किए जा सकते हैं। लेकिन हमें अपनी सोच को आर्किटेक्चर-समर्थित इंटरफेस (एपीआई) की तरफ मोडऩे की जरूरत है जिसके माध्यम से तमाम आवेदन, रिटर्न, चालान और फाइलिंग के काम सीधे-सीधे किए जा सकें।
 
इस दिशा में पहला कदम श्रम कानूनों के मामले में उठाया जा सकता है। 44 केंद्रीय कानूनों की जगह एक अकेला श्रम कानून लाना, दुकान एवं प्रतिष्ठान अधिनियम और कारखाना अधिनियम को मिलाकर एक नया कानून बनाना, बड़ी कंपनियों के लिए सरकार की तरफ से जारी होने वाले 25 से अधिक नंबरों के स्थान पर एक सार्वभौम उद्यम नंबर जारी करना, सभी श्रम नियमों के अनुपालन के लिए डिजिटल फाइलिंग को अनिवार्य कर देना और सामाजिक सुरक्षा प्रदाताओं के बीच प्रतिस्पद्र्धा का माहौल पैदा करना कुछ अहम तरीके हो सकते हैं।
 
अर्थशास्त्री ई एफ शूमाकर की बहुचर्चित किताब 'स्मॉल इज ब्यूटीफुल' है। छोटे नियोक्ता और पहली पीढ़ी के उद्यमियों की नीतिगत संकल्पना और विमर्श में हमेशा एक खास जगह रही है। लेकिन बड़े नियोक्ताओं के लिए बुरी, बड़ी और वजनी श्रम नीति जहां मुश्किलें पैदा करती है वहीं छोटे नियोक्ताओं के लिए तो यह जानलेवा हो सकती है। श्रम कानूनों में प्राय: युवाओं के बजाय उम्रदराज लोगों और रोजगार तलाशने वाले के बजाय कर्मचारियों को तवज्जो दी जाती रही है। अब वह नीति लागू करने का समय आ गया है जिसमें स्थापित कंपनियों के बजाय नई राह अपनाने वाली फर्मों को प्राथमिकता दी गई हो। 
 
(लेखक क्रमश: टीमलीज सर्विसेज और एवेंटिस रेगटेक के सह-संस्थापक हैं)
Keyword: india, economy, emplyement,,
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