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हारी हुई लड़ाई

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  September 14, 2018

विजय माल्या को सुर्खियों में रहना काफी पसंद रहा है और अभी कुछ अरसा पहले तक वह काफी शानदार तरीके से यह काम कर रहे थे। तीन दशक से भी अधिक पहले अपने करियर के शुरुआती दिनों में उन्होंने शराब बनाने वाली कंपनी शॉ वालेस के अधिग्रहण की बोली के साथ शुरुआत की। उन्होंने यह बोली दुबई में रहने वाले (अब स्वर्गीय) मनु छाबडिय़ा के साथ लगाई थी और माल्या को बेंगलूरु (उस वक्त बेंगलूर) हवाई अड्डे पर प्रवर्तन निदेशालय ने विदेशी मुद्रा विनिमय प्रावधानों के उल्लंघन के लिए पकड़ा था। बाद में उन्होंने कंपनियों की खरीद-बिक्री के कई सफल सौदे किए। उन्होंने अपने कारोबार में विविधता लाने के लिए खरीद के सौदे किए तो वहीं अपने मूल कारोबार पर ध्यान केंद्रित करने के लिए बिक्री भी की।

 
देश में शराब और बियर से काफी पैसा आया। माल्या को यह विरासत में मिला। परंतु उन्होंने अपने कारोबार में ढेर सारा मिश्रण भी किया और वह अपने उत्पादों की टैग लाइन 'द किंग ऑफ गुड टाइम्स' के सजीव उदाहरण के रूप में सामने आए। जेट और यॉट, क्रिकेट और फॉर्मूला 1 टीम, विला और विंटेज कार, भूमध्यसागर के एक द्वीप और दक्षिण अफ्रीका में हॉर्स पार्क के अलावा टीपू सुल्तान की तलवार वापस लाने तक इतनी विविधता थी कि यह तय कर पाना मुश्किल था कि कहां कारोबार समाप्त होता है और मौज मस्ती शुरु होती है। परंतु इस तड़क भड़क के पीछे भारत में शराब का कारोबार राजनीतिक रूप से उतना ही संवेदनशील रहा जितना कि चीनी और अचल संपत्ति।
 
तीनों पर सरकार का नियंत्रण है। शराब पर लगने वाला उत्पाद शुल्क राज्य लगाते हैं इसलिए राज्यों के नेताओं की इसमें खास रुचि होती है। अलग-अलग राज्य में उत्पाद शुल्क अलग-अलग होता है। इससे शराब की तस्करी को बढ़ावा मिलता है। खासतौर पर उन राज्यों में जहां कभी न कभी शराबबंदी लागू की गई। आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, हरियाणा, बिहार और गुजरात ऐसे ही राज्य हैं। ऐसे में जाहिर है कि अगर कोई कारोबार पक्षपात के लिए आदर्श है तो वह है शराब कारोबार, खासतौर पर राज्यों के स्तर पर।
 
इस बीच माल्या फलते-फूलते गए। वह चतुर तो हैं लेकिन शायद अपनी चतुराई में उनके भरोसे ने उन्हें तेजी से आगे बढऩे को प्रोत्साहित किया और उन्हें परास्त भी होना पड़ा। एक और बात ने उनको नुकसान पहुंचाया। वह थी अपने फायदे में चल रहे कारोबार की मदद से नुकसान में चल रही विमानन कंपनी का वित्त पोषण करना। जबकि एक समय के बाद इसका कोई तुक नहीं रह गया था। अत्यंत अल्प मार्जिन वाला कारोबार होने के बाद भी वह इसे चलाते रहे। प्रतिद्वंद्वी विमानन कंपनियों के मालिक अकेले में हंसते रहे और किंगफिशर के पतन की प्रतीक्षा करते रहे। 
 
माल्या कर्ज लेकर इसे टालते रहे। एक के बाद एक ऋण बढ़ता गया। उन्होंने व्यक्तिगत गारंटी जारी की, एक के बाद एक फायदे में चलने वाली कंपनी बेचते गए ताकि नुकसान में चल रही विमानन कंपनी को चलाते रह सकें। बिना बैंकरों की सांठगांठ के वह इतना सबकुछ नहीं करते रह सकते थे। हमारे ज्यादातर बैंक जिस तरह चलते रहे हैं, शायद ही कोई यह मानेगा कि बैंकों में राजनेताओं का हस्तक्षेप नहीं होता है। जाहिर है वे डूबेंगे तो कुछ को तो अपने साथ ले जाएंगे। हमारे देश में जिस तरह चीजें घटित होती हैं एक बार यह सिलसिला रुकने के बाद भी शायद राजनेताओं से ज्यादा बैंकर नुकसान में रहेंगे। 
 
जेम्स क्रैबट्री ने अपनी हालिया किताब द बिलियनॉॅयर राज में माल्या का एक दुखद चित्र प्रस्तुत किया है, वह लंदन के अपने सोने से आच्छादित विशाल आवास में अकेले खड़े हैं। यह निर्वासन का अकेलापन है। आज कौन सा राजनेता होगा जो उनका फोन उठाने का साहस करेगा? आज वह किस बैंकर को याद कर सकते हैं? इसके बावजूद वह खुद को मासूम साबित करने में लगे हैं। वह खुद को एक पीडि़त पक्ष बताते हैं जो असंभव को संभव करके बैंकों की राशि चुकता करेगा। उनके बहुत अधिक दुश्मन नहीं हैं। इसलिए उनके दुर्भाग्य से बहुत ज्यादा लोग प्रसन्न भी नहीं होंगे। आखिर में दिक्कत शायद यही रही होगी कि माल्या कभी बड़े हुए ही नहीं। उन्होंने चीजों को हमेशा मनोरंजन और खेल समझा। कारोबार का खत्म होना फिल्मों की तरह होता है जहां खून का एक कतरा भी नहीं बहता और लोग मारे जाते हैं। अब शायद उनके लिए जागने का वक्त आ गया है।
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