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प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को लेकर भ्रम और दुविधा बरकरार

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  September 13, 2018

भारतीय अर्थव्यवस्था के उपभोक्ताओं से जुड़े दो क्षेत्र एक के बाद एक सरकारों के कार्यकाल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के मामले में पिछड़े रहे। इनमें विमानन क्षेत्र और खुदरा शामिल हैं। व्यापक नीतिगत रुख की बात करें तो वह कारोबारी हकीकतों से दूर नजर आती है। विदेशी डॉलरों का स्वागत है लेकिन विदेशी स्वामित्व और प्रबंधन का नहीं। कुछ अपवाद भी हैं जो संभावित निवेशकों को नीतिगत निर्देशों को लेकर भ्रमित रखते हैं। पिछले सप्ताह मंगलवार को कतर एयरवेज के सीईओ अकबर अल बकर ने कहा कि उनकी कंपनी एक साल तक देश में विमान सेवा शुरू करने की अनुमति की प्रतीक्षा करेगी, उसके बाद वह दूसरे बाजार तलाश करेगी। कतर ने इस वर्ष मई में विमानन कंपनी खोलने के लाइसेंस की चाह जताई थी लेकिन कोई प्रगति नहीं हुई है। उन्होंने दिल्ली में संवाददाताओं से बातचीत में देश की विमानन नीति की अतार्किकता की ओर संकेत किया। यह किसी भी सूचीबद्घ विमानन कंपनी के लिए 100 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की बात करती है लेकिन केवल तभी जबकि निवेशक विदेशी विमानन कंपनी न हो। विदेशी विमानन कंपनियां देश के उभरते विमानन बाजार में हिस्सेदारी चाहती हैं लेकिन उनको संयुक्त उद्यम में भारतीय कंपनियों के साथ 49:51 की हिस्सेदारी करनी होती है। 
 
अल बकर को शायद सन 2013 के 'कॉमा विवाद' के बारे में जानकारी नहीं है। उस वर्ष के प्रेस नोट क्रमांक 6 के चलते नई भारतीय विमानन कंपनियां कारोबार में शामिल हो सकती थीं। इससे पुरानी घरेलू विमानन कंपनियां परेशान थीं क्योंकि वे प्रतिस्पर्धियों को दूर रखना चाहती थीं। नोट में कहा गया है, 'भारत सरकार ने यह इजाजत देना तय किया है कि विदेशी विमानन कंपनियां भी भारतीय कंपनियों, में पूंजी लगा सकती हैं, जो अधिसूचित और गैर अधिसूचित विमान परिवहन सेवा चला रही हों, यह चुकता पूंजी के 49 फीसदी के बराबर होगा।'
 
यहां भारतीय कंपनियों के बाद लगा अद्र्घविराम एक ऐसी बात थी जिसकी उम्मीद देसी प्रतिस्पर्धियों ने नहीं की थी। केवल मौजूदा भारतीय विमानन कंपनियों को विदेशी निवेश का हकदार होने के बजाय इस विराम चिह्न ने नीति को किसी नई घरेलू विमानन कंपनी के लिए भी खोल दिया था। पुरानी कंपनियों की चिंता जायज थी क्योंकि इसने हालात को बदल दिया था। इसके बाद ही सिंगापुर एयरलाइंस और टाटा समूह ने साथ मिलकर विस्तारा शुरू की। उस वक्त जब मीडिया ने तत्कालीन विमानन मंत्री अजित सिंह से इस अद्र्घविराम के बारे में सवाल किए तो उन्होंने बस इतना कहा कि उन्हें भी अंग्रेजी आती है। देश की विमानन नीति ऐसी व्याकरणात्मक चतुराई पर निर्भर थी।
 
घरेलू बाजार में अगर एक पूर्ण विदेशी स्वामित्व वाली विमानन कंपनी भी हो तो इससे क्या समस्या है? सरकार ने कभी इस बारे में साफ तौर पर कोई बात नहीं की। आखिर, 49 फीसदी हिस्सेदारी भी विदेशी प्रबंधन भागीदारी को शायद ही कम करेगी। कतर ने इंडिगो के साथ गठजोड़ करने में रुचि दिखाई थी लेकिन देश की सबसे बड़ी घरेलू विमानन कंपनी ने कोई उत्साह नहीं दिखाया। अल बकर का कहना है कि उनकी कंपनी अल्पांश हिस्सेदारी में रुचि नहीं रखती। उन्होंने संकेत दिया कि कतर भारत में विमान परिचालन में प्रमुख भूमिका निभाना चाहता है। 
 
अमेरिका और कुछ यूरोपीय बाजारों में विदेशी विमानन कंपनियों को घरेलू मार्गों पर सीमित पहुंच उपलब्ध कराना सुरक्षा से जुड़ा मसला है जबकि भारत में यह भारतीय प्रबंधन से जुड़ी अस्पष्ट चिंताओं का मसला है। हालांकि इंडिगो समेत अधिकांश घरेलू विमानन कंपनियां विदेशी सीईओ द्वारा ही संचालित की जा रही हैं और वे कई विदेशी विमान चालकों की सेवाएं भी लेती हैं।  एफडीआई को लेकर दुविधा की बात करें तो खुदरा कारोबार को छोड़कर शायद ही कोई क्षेत्र नीति निर्माताओं की दुविधा को इस कदर प्रकट करता होगा। यहां नीतियां चार स्तरों पर काम करती हैं। 
 
पहला, थोक खुदरा जो अन्य खुदरा कारोबारियों को आपूर्ति करता है। सरकार ने इस क्षेत्र में 100 फीसदी एफडीआई की इजाजत दी है। दूसरा, बहुब्रांड खुदरा में एफडीआई की सीमा 51 फीसदी है लेकिन इसके साथ ढेर सारी शर्तें भी हैं। तीसरा, है एकल ब्रांड। इसमें 100 फीसदी एफडीआई की इजाजत दी गई है लेकिन स्वचालित मार्ग से। यह भी कुछ शर्तों के अधीन है। जनवरी तक एकल ब्रांड में एफडीआई खुदरा पर 49 फीसदी की सीमा थी (शेष 51 फीसदी हिस्सेदारी हासिल करने के लिए इजाजत की आवश्यकता थी)। इसे एक बड़ा सुधार माना गया। 
 
चौथा है, ई-कॉमर्स बाजार के लिए पूरी तरह अलग नीतिगत ढांचा। इसमें बी2बी (बाजार आधारित मॉडल) और बी2सी (इन्वेंटरी मॉडल) शामिल हैं। इनमें से पहले में 100 फीसदी एफडीआई की इजाजत है। एमेजॉन और वॉलमार्ट इसी आधार पर काम कर रही हैं। परंतु दूसरे के लिए एफडीआई पर पूरी तरह रोक है। ये कई शर्तों के अधीन हैं। खुदरा क्षेत्र में वैश्विक रुझान अभिसरण का है लेकिन हमारे यहां ऐसी नहीं प्रतीत होता।  बात चाहे विदेशी विमानन कंपनियों की हो या खुदरा क्षेत्र की, चिंता का विषय यही है कि घरेलू कारोबार को कैसे बचाया जाए। खासतौर पर छोटे कारोबारियों और किराना स्टोर को। कोई सरकार यह बताने में सफल नहीं रही है कि आखिर क्यों बड़ी घरेलू खुदरा शृंखलाएं वह प्रभाव नहीं छोड़ पाई हैं जो विदेशी खुदरा शृंखलाएं। अगर उपभोक्ता राष्ट्रवाद से प्रभावित होते तो ओनिडा और वीडियोकॉन के टीवी आज भी सबसे अधिक बिक रहे होते। कारों के बाजार में हिंदुस्तान मोटर्स का दबदबा होता और विमानन में एयर इंडिया का। इतना ही नहीं मैकडॉनल्ड्स और डोमिनोज पिज्जा बहुत पहले भारत छोड़ गए होते। क्या लोकतांत्रिक सरकारें इसकी चिंता भी करती हैं कि लोग क्या सोचते हैं? 
 
Keyword: india, economy, FDI, invest,,
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