बिजनेस स्टैंडर्ड - पाक को अनावश्यक तवज्जो देना सही नहीं
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पाक को अनावश्यक तवज्जो देना सही नहीं

प्रेमवीर दास /  September 13, 2018

हमारा ध्यान उन बातों पर केंद्रित होना चाहिए जो हमें दीर्घावधि में विश्व शक्ति बनाने के लक्ष्य की ओर ले जा सकती हैं। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं प्रेमवीर दास 

 
आजादी के 71 वर्ष बाद भारत पाकिस्तान से ग्रस्त नजर आता है। हमारे टेलीविजन चैनल और समाचार पत्र जितनी सामग्री अन्य देशों को मिलाकर देते होंगे उतनी तो वे अकेले पाकिस्तान पर ही प्रकाशित और प्रसारित कर देते हैं। पाकिस्तान के बारे में छोटी से छोटी नकारात्मक खबर को भी हाथोहाथ लिया जाता है। मिसाल के तौर पर हाल ही में अहमदिया संप्रदाय के आर्थिक सलाहकार को पद से हटाए जाने की खबर को लेकर हमारे मीडिया में दीवानगी नजर आई। शायद इसका उलटा भी उतना ही सही है। 
 
भारत और पाकिस्तान आपस में चार बार लड़ चुके हैं। हर मौके पर हमें जीत मिली है। सन 1971 में तो हमने पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए। ऐसे में अगर उनके अंदर गुस्सा है भी तो हमें इस बात को लेकर आशंकित होने की आवश्यकता नहीं है कि वे हमारी क्षेत्रीय संप्रभुता को नुकसान पहुंचा सकते हैं। पाकिस्तान की आबादी हमारे पांचवें हिस्से के बराबर है। उसकी अर्थव्यवस्था की हालत खस्ता है। हमारी प्रति व्यक्ति आय पाकिस्तान से काफी अधिक है। हमारी सेना उससे काफी मजबूत है और हमारी वैश्विक छवि एक उभरती विश्व शक्ति की है। अजीब बात है कि इसके बावजूद यह आशंका है कि पाकिस्तान हमारी संप्रभुता के लिए खतरा बन जाएगा। 
 
यह सच है कि पाकिस्तान परमाणु क्षमता संपन्न है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान के समर्थन के बारे में चाहे जो भी कहा जाए, सच यही है कि उसे अलग नहीं रखा जा सकता। परमाणु हथियार क्षमता की बात तो छोडि़ए, उसकी सामरिक स्थिति ऐसी है कि उसके एक ओर अफगानिस्तान और मध्य एशिया हैं तो दूसरी ओर तेल समृद्घ दक्षिण पूर्वी एशिया। यह इस्लामिक सहयोग संगठन के देशों में सबसे अधिक शक्तिशाली है। सुन्नी और शिया बहुल दोनों तरह के देशों के साथ उसके करीबी रिश्ते हैं। उसके पास महत्त्वपूर्ण सैन्य शक्ति है। अमेरिका समेत दुनिया का कोई देश उसकी अनदेखी नहीं कर सकता। 
 
हमारे देश में एक नजरिया यह है कि भारत के प्रति पाकिस्तान की नीति उसकी सेना द्वारा तैयार और नियंत्रित होती है। यह सच है। सन 1950 के दशक में जब सेना ने असैन्य सरकार को उखाड़ फेंका तब से अब तक वहां अधिकांश मामले और सुरक्षा के मसले तो खासतौर पर, सेना ही देखती है। सन 1971 तक पाकिस्तान अपनी सेना को भी हमसे बेहतर बताता आया है। वे कहते थे कि एक पाकिस्तानी जवान, तीन भारतीय सैनिकों के बराबर है। वे सन 1965 की जंग को अपनी जीत मानते हैं और 8 सितंबर को रक्षा दिवस के रूप मे ंमानते हैं। उस दिन सेना की परेड होती है और विमान फ्लाई पास्ट कवायद करते हैं। पाकिस्तानी सेना के लिए सन 1971 की जंग एक अत्यंत दुखद और मनोबल गिराने वाली जंग थी। उस जंग ने पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए थे और 90,000 से अधिक जवानों ने उस सेना के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था जिसे वे खुद से कमजोर मानते थे। उन्हें महीनों तक शिविरों में रहना पड़ा था। इन बातों ने उसे बहुत प्रभावित किया था। 
 
पाकिस्तान को पता है कि भारत के साथ जंग में उसके हाथ कामयाबी नहीं लगनी है। यही वजह है कि वह आतंकवाद को प्रोत्साहित कर रहा है। एक भावना यह है कि भारत को जंग में परास्त नहीं किया जा सकता है लेकिन आतंकियों की मदद से उसे लगातार नुकसान पहुंचाया जा सकता है। यह मानने की कोई वजह नहीं है कि निकट भविष्य में पाकिस्तान के रुख में कोई बदलाव आएगा। भले ही उसे हमारे साथ बेहतर राजनीतिक और आर्थिक रिश्तों से कितना भी लाभ क्यों न हो रहा हो। संक्षेप में कहें तो पाकिस्तान की भारत संबंधी नीतियों पर सेना का नियंत्रण जारी रहेगा। परंतु पाकिस्तान जाने वाले भारतीय मित्रता और मेजबानी की खुशनुमा स्मृतियों के साथ वापस आएंगे। इस रिश्ते की यही विडंबना है।
 
भारत के नीतिगत हलकों में और सैन्य बलों के बीच एक नजरिया चर्चा में रहता है कि अगर कोई सैन्य पेशकदमी हुई तो चीन और पाकिस्तान हमारे खिलाफ एकजुट हो जाएंगे। इसे उनके करीबी रक्षा रिश्तों से भी महसूस किया जा सकता है लेकिन इस दौरान यह हकीकत नकार दी जाती है कि ऐसा नहीं होगा कि ये दो देश मिलकर हमसे लड़ाई लड़ें और शेष विश्व खड़ा होकर तमाशा देखे। उनके मूल हितों के अलावा भारत और चीन एक दूसरे की खूबियों और खामियों से बखूबी अवगत हैं। उन्हें पता है कि परमाणु हथियारों की जद में दिल्ली आता है तो शांघाई भी इस जद से बाहर नहीं है। अगर चीन सन 1965 और सन 1971 में जंग का हिस्सा नहीं बना तो वह आगे भी इससे दूर ही रहेगा। भारत के साथ तनाव दूर करने की उसकी हालिया कोशिशें इसी का संकेत देती हैं। इसके अलावा अमेरिका और रूस की बात करें तो उनके रक्षा निर्माताओं के लिए भारत का बाजार हर हाल में पाकिस्तान के बाजार से बड़ा है। ऐसे में आसानी से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि किसी भी अप्रिय स्थिति में ये दोनों देश दूरी बनाए रखेंगे। 
 
लब्बोलुआब यह है कि पाकिस्तान को अच्छी तरह पता है कि युद्घ उसके लिए हमेशा घाटे का सौदा रहेगा। इसलिए वह आतंकवाद को बढ़ावा देना जारी रखेगा। कश्मीर घाटी में आतंकवाद को उसका समर्थन जारी रहेगा। हमारे साथ राजनीतिक समझौता अगर हुआ भी तो वह एक सीमा तक ही रहेगा। हमें यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि मौजूदा हालात को लेकर कोई बहुत अधिक सुधार देखने को मिलेगा। हम दशकों से इसी माहौल में जीते आए हैं और आगे भी यह सिलसिला जारी रह सकता है। परिणामस्वरूप भारत के लिए पाकिस्तान का भय मन में पाले रहने की कोई आवश्यकता नहीं है। भारतीय मीडिया और हमारे लोगों को पाकिस्तान को एक और पड़ोसी के रूप में देखना चाहिए जिस पर यदाकदा ध्यान देने की आवश्यकता है। उसे किसी सैन्य चुनौती या प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखने की आवश्यकता नहीं है। हम उसके बारे में जितनी बात करेंगे वह खुद को उतना ही महत्त्वपूर्ण समझेगा। हमें अपना ध्यान कहीं अधिक बड़े लक्ष्यों पर केंद्रित करना चाहिए। हमें उन बातों पर ध्यान देना चाहिए जो हमें आगे ले जा सकें। पाकिस्तान इन सब मे कहीं नहीं नजर आता। 
 
(लेखक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के सदस्य रहे हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।) 
Keyword: pakistan, Imran Khan, media, news, terror,,
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