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उभरते बाजारों पर लीमन प्रकरण की छाया मंडराई

अनूप रॉय और समी मोडक /  September 12, 2018

लीमन ब्रदर्स के पतन के बाद पूंजी तरलता के प्रवाह ने वैश्विक वित्तीय व्यवस्था को समर्थन दिया था लेकिन उस घटना के 10 साल पूरा होने पर यह उभरते बाजारों के लिए दर्दनाक सबक के रूप में तब्दील हो चुका है।

विकसित बाजारों में तरलता की स्थिति तंग होने से उभरते बाजारों को होने वाले पूंजी प्रवाह का परिदृश्य धुंधला नजर आने लगा है। इसकी वजह से पिछले कुछ हफ्तों में उभरते बाजारों की कई मुद्राओं की हालत खस्ता हो गई है। तुर्की की मुद्रा लीरा और अर्जेंटीना की मुद्रा पेसो में 40 फीसदी से अधिक गिरावट देखी जा चुकी है जबकि भारतीय मुद्रा रुपये में डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड गिरावट आई है। हाल यह है कि भारतीय मुद्रा 72 रुपये प्रति डॉलर के स्तर से भी नीचे लुढक़ चुकी है।

मॉर्गन स्टैनली ने गत रविवार को जारी अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि उदीयमान बाजारों में मुद्राओं की खराब हालत के पीछे अमेरिका की अनिश्चित मौद्रिक नीति और उसकी व्यापार एवं विदेश नीतियां भी जिम्मेदार हैं। मॉर्गन स्टैनली के मुताबिक, ‘चुनौतीपूर्ण वाह्य परिवेश के चलते निवेशकों का ध्यान उभरते बाजारों के मूल्यांकनकारी अवयवों के बजाय उनकी क्षणभंगुरता पर टिका हुआ है।’

नोमुरा ग्रुप ने भी उभरते बाजारों पर जारी अपनी सितंबर 2018 रिपोर्ट में कहा है कि इस साल निवेशक इन देशों में पैदा हो रहे नए जोखिमों को लेकर अधिक फिक्रमंद हो रहे हैं। नोमुरा के मुताबिक, ‘विकसित बाजारों की मौद्रिक नीति से तनाव पैदा हो रहा है और प्रतिफल की तलाश में वर्षों तक नजरअंदाज किए जाने के बाद निवेशक 2018 में उदीयमान बाजारों के जोखिमों के प्रति अधिक जागरूक हो रहे हैं। व्यापार संरक्षण की बढ़ती प्रवृत्ति और चीन की आर्थिक सुस्ती परिदृश्य को और बिगाड़ रही है।’

एक दशक पहले वैश्विक आर्थिक संकट के विभिन्न परिसंपत्ति समूहों तक विस्तारित होने के बाद दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों ने मुद्रा तरलता बढ़ाने पर जोर देना शुरू कर दिया था। उस समय दुनिया भर के शेयर बाजारों में 37 लाख करोड़ डॉलर के बराबर की गिरावट आई थी जो भारत के मौजूदा बाजार पूंजीकरण का 18 गुना था। 

उस आर्थिक संकट की सबसे ज्यादा मार उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ी थी। भारतीय शेयर बाजार के बेंचमार्क सेंसेक्स में संकट के दौरान 60 फीसदी से अधिक गिरावट आई थी। हालत यह थी कि 8 जनवरी 2008 को 20,873 के उच्च स्तर पर रहा सेंसेक्स 9 मार्च 2009 को 8,160 अंक तक लुढक़ चुका था।

वैश्विक आर्थिक संकट के समय उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं का भी अवमूल्यन हुआ था क्योंकि पूंजी का बाहरी प्रवाह रुक गया था। निश्चित आय वाले बाजार तो तरलता की कमी के कारण थम चुके थे। 

वर्ष 2007 की शुरुआत में 160 के स्तर पर रहा ब्लूमबर्ग कमोडिटी सूचकांक 2 जुलाई 237.95 के उच्च स्तर तक जा उछला था। इसकी वजह यह थी कि निवेशक शेयर बाजार के बजाय कमोडिटी क्षेत्र को ही अधिक सुरक्षित समझ रहे थे। 

लेकिन उसके बाद की अस्थिरता ने कमोडिटी सूचकांक को छह महीने से भी कम समय में 106.09 के निम्न स्तर पर लाकर पटक दिया। ऐसे समय में केंद्रीय बैंकों ने तरलता बढ़ाते हुए अपनी मुद्राओं को थामने की कोशिश की थी।

इस आर्थिक भूकंप के अधिकेंद्र अमेरिका में मात्रात्मक सुधार आने का असर यह हुआ कि लाखों करोड़ डॉलर मूल्य के बॉन्ड खरीदे गए। अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने फंड दर की ऊपरी सीमा को अगस्त 2007 में 5.25 फीसदी से घटाकर महज 0.25 फीसदी पर ला दिया था। 

फेड रिजर्व की नीतिगत ब्याज दर दिसंबर 2015 तक इसी स्तर पर बनी रही। अब भी यह महज 2 फीसदी के स्तर पर ही है। यूरोपीय केंद्रीय बैंक और जापान ने भी मुद्रा प्रवाह बढ़ाने के लिए अपने स्तर पर प्रयास किए। इन कोशिशों का नतीजा यह हुआ कि धीरे-धीरे बाजारों में तरलता की स्थिति सुधरती चली गई।

फस्र्ट ग्लोबल के संयुक्त प्रबंध निदेशक शंकर शर्मा ने वर्ष 2008 के वैश्विक आर्थिक संकट को जिंदगी भर में एक बार होने वाली घटना बताते हुए गत दिनों कहा था कि कई परिसंपत्ति संवर्ग और प्रतिभूति डॉलर के बरअक्स 2008 के अपने स्तर को एक दशक बाद भी पार नहीं कर पाए हैं। 

इस बीच विकसित बाजारों ने अब उलटा रास्ते पर चलना शुरू कर दिया है और उभरती अर्थव्यवस्थाओं को इसका खामियाजा उठाना पड़ रहा है। एमएससीआई एमर्जिंग मार्केट करेंसी सूचकांक सितंबर में 52 हफ्तों के निचले स्तर पर लुढक़ चुका है। 

इस महीने रुपया डॉलर के मुकाबले 72 रुपये की रिकॉर्ड गिरावट पर आ चुका है। इसका परिणाम यह हुआ है कि भारत जैसे बाजारों में डॉलर में मिलने वाले रिटर्न पर भी असर पड़ा है। रुपये के संदर्भ में देखें तो शेयर बाजार ने जनवरी 2008 के स्तर को नवंबर 2010 में ही दोबारा हासिल कर लिया था। वैश्विक केंद्रीय बैंकों की तरफ से मुद्रा झोंके जाने से भारतीय शेयर बाजार में रौनक लौट आई थी। 

लेकिन डॉलर के संदर्भ में देखें तो भारतीय शेयर बाजार 2008 के स्तर को जनवरी 2018 में जाकर हासिल कर पाए हैं। डॉलर के मुकाबले रुपये की रिकॉर्ड गिरावट का नतीजा यह हुआ है कि भारतीय शेयर बाजार एक बार फिर 2008 के स्तर से नीचे लुढक़ चुके हैं।

इन आर्थिक घटनाओं को देखने पर यही लगता है कि 10 साल की अवधि बहुत लंबी नहीं होती है। लीमन पतन से उपजे वैश्विक आर्थिक संकट का एक और दौर दिखना कहीं बाकी तो नहीं रह गया है। 
Keyword: Lehman Brothers, US, World Economy, Finance, developed market, Turkey, Currency, Lira,
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