बिजनेस स्टैंडर्ड - बंपर फसल के बावजूद क्यों परेशान है किसान
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Friday, September 21, 2018 10:03 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम अर्थव्यवस्था खबर

बंपर फसल के बावजूद क्यों परेशान है किसान

संजीव मुखर्जी /  09 12, 2018

क्या है मामला

सरकार अगले कुछ महीनों में तिलहन और दाल की खरीद शुरू करने की तैयारी में
खरीद प्रक्रिया के लिए कैबिनेट नोट तैयार किया जा रहा है
दाल, मोटे अनाज और तिलहन के लिए भंडारण क्षमता पर्याप्त नहीं
सरकार के पास है 55 लाख टन पुराना भंडार
भंडार कम करने के लिए राशन की दुकानों पर छूट में दाल बेचने की योजना

बिजनेस स्टैंडर्ड बंपर फसल के बावजूद क्यों परेशान है किसानमध्य प्रदेश में मंदसौर जिले के अनिल पुरी गोस्वामी औसत जोत के किसान हैं। किसान आंदोलन के कारण मध्य प्रदेश सरकार ने दो साल पहले भावांतर योजना शुरू की थी और तबसे गोस्वामी अनिवार्य न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के तहत अपनी दाल की फसल राज्य की एजेंसियों को बेचने की कोशिश में लगे हैं। यह एमएसपी बाजार कीमत से ज्यादा है। लंबी कतारों में खड़े रहने और घंटों तक इंतजार करने के बाद वह शायद ही कभी अपनी पूरी फसल इस व्यवस्था के तहत बेच पाए हैं। 

फिर भी कुछ भी नहीं से कुछ बेहतर के तर्क पर वह इस साल भी अपनी फसल सरकार को बेचने को योजना बना रहे हैं। सरकार ने फसलों के लिए नया एमएसपी तय किया है। गोस्वामी कहते हैं, ‘फसल के पंजीकरण, बिक्री और उसके बाद भुगतान की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि कभी-कभी हमारे लिए इसे झेलना मुश्किल हो जाता है। कौन किसान कितनी फसल बेच सकता है, इसके लिए सरकार ने सीमा तय कर रखी है।’

गोस्वामी की तरह मध्य प्रदेश, राजस्थान और कई अन्य राज्यों के हजारों किसानों ने दाल और तिलहन की फसलों का सरकार की पंजीकरण योजना के तहत पंजीकरण कराया है। अगर बाजार कीमतें अनिवार्य एमएसपी से नीचे रहती हैं तो अगले कुछ महीनों में बाकी किसान भी ऐसा कर सकते हैं। किसानों के कल्याण के लिए लाई गई इस योजना की विडंबना यह है कि इससे सरकार की समस्याएं और बढ़ सकती है क्योंकि दाल, मोटे अनाज तथा तिलहन जैसी फसलों की खरीद और भंडारण की व्यवस्था शायद ही मौजूद है। 

2017-18 में केंद्र सरकार ने मूल्य समर्थन योजना के तहत किसानों से 290 अरब रुपये की दालें और तिलहनों की खरीद की थी। लेकिन खरीद तो समस्या का केवल एक पहलू है, इसमें सबसे बड़ी चुनौती फसलों का उचित भंडारण और आवागमन सुनिश्चित करना है। भारतीय कृषि सहकारी विपणन संघ (नेफेड) दालों और तिलहनों की खरीद, भंडारण और बिक्री करने वाली देश की सबसे बड़ी संस्था है। हालांकि लघु कृषक कृषि व्यापार संघ और भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) भी इसमें नेफेड की मदद करते हैं। लेकिन उनके पास बहुत कम भंडारण क्षमता है। मगर एफसीआई के अधिकांश गोदाम गेहूं और धान के लिए आरक्षित हैं। 

पूर्व कृषि सचिव शिराज हुसैन कहते हैं, ‘दालों के साथ समस्या यह है कि जिन राज्यों में इसकी पैदावार होती है वहां इनकी ज्यादा खपत नहीं होती है। इसलिए इस फसल को बाजारों में ले जाने की जरूरत होती है। अगर उनके पास भंडारण की क्षमता है भी तो यह वैज्ञानिक नहीं है। इससे भंडारण में नुकसान का खतरा रहता है।’ उनका कहना है कि दालों की उपज और खपत वाले हर जिले में वैज्ञानिक भंडारण क्षमता विकसित करने की योजना आगे नहीं बढ़ पाई है। अधिकारियों का कहना है कि नेफेड के पास 55 लाख टन दाल और तिलहन का भंडार है जो उसने पिछले कुछ वर्षों के दौरान खरीदा है। इसमें से करीब 45 लाख टन केवल दाल है। 

दालों का भंडारण महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश में केंद्र और राज्य सरकारों के गोदामों में किया गया है जबकि तिलहन राजस्थान, हरियाणा और गुजरात में रखे गए हैं। तिलहनों में अधिकांश सरसों है जबकि गुजरात में थोड़ी मात्रा में मूंगफली का भी भंडारण किया गया है।

हुसैन के मुताबिक समस्या यह है कि दोबारा बिक्री की आशंका के कारण इस भंडार को खरीद सत्र के दौरान नहीं निपटाया जा सकता है। अगर दाल और तिलहन का भंडार जल्दी नहीं निपटाया गया तो केंद्र और राज्यों की एजेंसियों के लिए नई फसल की खरीद करना मुश्किल हो जाएगा जिसकी आवक अगले कुछ महीनों में शुरू हो जाएगी।

पुराने भंडार को निपटाने की प्रक्रिया तेज करने के लिए केंद्र सरकार ने अपने गोदामों से 15 रुपये प्रति किलो की छूट पर दाल की बिक्री शुरू करने की महत्त्वाकांक्षी योजना बनाई है। राज्य सरकारों राशन की दुकानों के जरिये इसकी बिक्री करेगी। कृषि मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा, ‘इस योजना से दो उद्देश्यों की पूर्ति होगी। पहला यह है कि इससे हमारे गोदामों से माल उठ जाएगा और हम नए सिरे से खरीद कर सकेंगे। दूसरी बात यह कि गरीबों में कुपोषण की समस्या का समाधान होगा क्योंकि दालों की खपत देश में हर जगह होती है।’ आधिकारिक बयान के मुताबिक अब तक केवल पांच राज्यों तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, बिहार और जम्मू-कश्मीर ने इस योजना में दिलचस्पी दिखाई है। इससे अगले एक साल के दौरान दाल के भंडारण में 20 लाख टन की कमी आने की संभावना है। अधिकारी ने कहा, ‘साथ ही हम भंडार कम करने के लिए नियमित नीलामी कर रहे हैं और इसके जरिये तिलहन के भंडार में छह से सात लाख टन की कमी आएगी जो अभी 10 लाख टन है।’

इसमें नेफेड की खस्ताहाल वित्तीय स्थिति भी इस समस्या को और बदतर बनाती है। खरीद के लिए प्रत्यक्ष सब्सिडी समर्थन के बजाय नेफेड किसानों का भुगतान करने के लिए ऋण जुटाने के वास्ते सरकार की बैंक गारंटी पर निर्भर रहती है। गारंटी मिलने में देरी के कारण बहुत बकाया जमा हो जाता है। 2017-18 में नेफेड ने सरकार की 290 अरब रुपये की पूरी बैंक गारंटी का इस्तेमाल कर लिया। इसका मतलब है कि आगे खरीद के लिए उसे फिर से गारंटी की जरूरत है। हालांकि इस साल उसे कम गारंटी की जरूरत पड़ेगी क्योंकि दाल और तिलहन के भंडार को कम करने के लिए शुरू की गई विभिनन योजनाओं से उसे 60 से 70 अरब रुपये की कमाई होगी। बड़ा सवाल यह है कि इससे किसानों की आय पर कितना फर्क पड़ेगा? अनुमानों के मुताबिक ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा। हर साल केवल 40 फीसदी उपज की ही खरीद होती है। 2016-17 और 2017-18 में व्यापक खरीद के कारण 50 लाख से अधिक किसान परिवारों को आंशिक लाभ हुआ। 

देश में 12 करोड़ से अधिक किसान परिवार हैं। हालांकि इनमें से सभी दाल और तिलहन नहीं उगाते हैं लेकिन इन फसलों को उगाने वाले किसानों की संख्या अच्छी खासी है। एफसीआई के पूर्व अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक आलोक सिन्हा ने कहा, ‘अगर सरकार एमएसपी की घोषणा करती है तो सरकारी एजेंसियां विपणन योग्य अधिशेष की खरीद में सक्षम रहेंगी। पिछले दो सालों के दौरान सरकार ने बीच में खरीद प्रक्रिया को रोक दिया था जो किसानों के पीठ पर छुरा भोंकने के समान है। खरीद में कोई सीमा नहीं होनी चाहिए।’

खाद्य तेलों पर आयात शुल्क में भारी बढ़ोतरी और दालों के आयात को हतोत्साहित करने के लिए किए गए उपायों से नई फसल के बाजार में आने से खुले बाजार में कीमतों में बढ़ोतरी संभव नहीं है। इससे केंद्र सरकार के हस्तक्षेप की जरूरत कम हो जाएगी। 

लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि शायद ऐसी स्थिति पैदा नहीं होगी। इंटरनैशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईएफपीआरआई)  के दक्षिण एशिया निदेशक पी के जोशी ने कहा, ‘मुझे नहीं लगता है कि नवंबर से खुले बाजार में दाल और तिलहन की कीमतों में बदलाव होगा क्योंकि अच्छे मॉनसून के कारण खरीफ की बंपर फसल होने की संभावना है।’

Keyword: Farmer, MSP, Crop, Sales, Registration, महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 लघु बचत की दरें बढ़ाने के बाद बैंकों पर भी ब्याज बढ़ाने का होगा दबाव?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.