बिजनेस स्टैंडर्ड - भविष्य के जोखिमों के आकलन की चुनौती
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भविष्य के जोखिमों के आकलन की चुनौती

श्याम सरन /  September 12, 2018

यह बात स्पष्ट है कि हमारी धरती की पर्यावास पूंजी निहायत संगठित तरीके से और लगातार नष्टï हो रही है। इसमें हमारी भूमि, वन, नदियां, समुद्र और हवा सभी शामिल हैं। इससे आने वाली पीढिय़ों का अस्तित्व खतरे में पड़ता नजर आ रहा है। जिस तेजी से हमारे प्राकृतिक संसाधन नष्ट हो रहे हैं, उसकी भरपाई होना बहुत मुश्किल नजर आ रहा है। इसकी वजह तो एकदम स्पष्टï है लेकिन ऐसी नीतियों का क्रियान्वयन करना खासा मुश्किल है जो पर्यावास को हो रहे इस नुकसान को कम कर सके या पर्यावरण सुधार में स्थायित्व ला सके। 

दरअसल हमारी आकलन व्यवस्था में ऐसे पूर्वग्रह निहित हैं जिनके आधार पर आर्थिक गतिविधियों और लागत लाभ अनुपात का आकलन किया जाता है। उदाहरण के लिए वनों की कटाई तब तक जारी रहेगी जब तक लकड़ी बाजार में अच्छे दाम पर बिकती रहेगी। लकड़ी कीमत जंगल में उगे वृक्ष की तुलना में तो अधिक ही होती है। 

लकड़ी जब वृक्ष की अवस्था में होती है तो वह वातावरण में फैले कार्बन का अवशोषण करती है और हवा में नमी पैदा करती है। उसकी जड़ें मिट्टी को बांधकर रखती हैं। इन तमाम पर्यावास संबंधी सेवाओं का मूल्यांकन नहीं हो सकता है क्योंकि उनकी कीमत का आकलन करना खासा मुश्किल काम है। 

अर्थशास्त्री बाह्यता की अवधारणा से वाकिफ हैं। इसे ऐसी लागत या ऐसे लाभ के रूप में व्याख्यायित किया जाता है जो किसी ऐसे पक्ष को प्रभावित करे जो लागत या लाभ के लिए खुद काम न कर रहा हो। स्थायित्व से जुड़ी अधिकांश चुनौतियों में बाह्यïता बतौर कारक मौजूद रहती है। 

मिसाल के तौर पर जो कारक हमारी नदियों में प्रदूषक तत्त्व डाल रहे हैं वे हमारे समाज पर एक किस्म का बोझ डाल रहे हैं। यह बोझ उनके बहीखातों में नजर नहीं आएगा। जलवायु परिवर्तन इसलिए घटित हो रहा है क्योंकि पृथ्वी के वातावरण में ग्रीनहाउस गैस एकत्रित हो गई हैं। 

इसके लिए औद्योगिक राष्ट्रों द्वारा दशकों तक जीवाश्म ईंधन जलाया जाना उत्तरदायी है। परंतु इस चुनौती की कीमत तो समूची पृथ्वी चुका रही है। मौजूदा लेखा व्यवस्था इतनी तैयार नहीं है कि वह बाह्यता का आकलन कर सके, क्योंकि लागत और लाभ को कुछ देशों पर लागू नहीं किया जा सकता है। 

ऐसे में वैश्विक चुनौतियों से निपटने की प्रभावी प्रक्रिया तय कर पाना मुश्किल होता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन जैसी समस्या से निपटने के लिए समग्र प्रतिक्रिया की आवश्यकता है। इसके बोझ को भी साझा तरीके से बांटना होगा। जोखिम के आकलन और उसे कम करने की बात करें तो ये हमारी अर्थव्यवस्था के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। हम निरंतर लाभ के अनुमान को जोखिम के समक्ष तोलते हैं। परंतु हम जिन लेखा उपकरणों का प्रयोग करते हैं वे प्राय: तत्काल प्रभाव और प्रमाण को लेकर पूर्वग्रह से ग्रस्त होते हैं। 

यानी कम परिमाण वाली बातों की कई बार अनदेखी कर दी जाती है। परंतु परिमाणात्मक प्रमाण की अनुपस्थिति का यह अर्थ नहीं होता है कि उनका प्रभाव नहीं होगा। परंतु दिक्कत यह है कि हमारा जोखिम का आकलन अक्सर ऐसी ही बातों पर आधारित होता है। 

हमारी लेखा व्यवस्था की यह अंतनिर्हित कमी अक्सर पर्यावास से संबंधित चुनौतियों के कमतर मूल्यांकन की वजह बनती है। इस तरह धीरे-धीरे इसका आकार काफी बढ़ जाता है। उदाहरण के लिए हिमालय में बर्फ का पिघलना। अंटार्कटिका और आर्कटिक में बर्फ की चादर भले ही धीरे-धीरे पिघल रही हो लेकिन एक सीमा के बाद इसमें काफी तेजी आ सकती है। हमारे आकलन के उपाय ऐसे नहीं हैं कि वे दीर्घावधि के इन जोखिमों का सही आकलन कर सकें। जैसा कि हमने पहले भी देखा है ये कारक भी बाह्यता का हैं। इनका वास्तविक प्रभाव सामने आने में समय लगेगा। 

यही वजह है कि केरल में आई बाढ़ जैसी अप्रत्याशित घटनाएं हमारे सामने अचानक आती हैं। पश्चिमी घाट में घने जंगलों के कटने से संभव है कि खनन उद्योग और छोटे मोटे औद्योगिक केंद्र विकसित हुए हों। 

इससे पारंपरिक संदर्भ में रोजगार और समृद्धि भी आए होंगे लेकिन इस क्रम में पर्यावरण को जो बेतहाशा नुकसान पहुंचाया गया उसकी कीमत केरल के लोगों को इस भयावह बाढ़ रूपी आपदा के रूप में चुकानी पड़ी। जाहिर सी बात है हमारे पास इस नुकसान के आकलन का कोई उपाय नहीं था। यह मानना सही नहीं है कि हम जिस चीज का आकलन नहीं कर सकते, उसका अस्तित्व ही नहीं है। ऐसा सोच आपदा को न्योता देता है। 

 

 

पर्यावरण के स्थायित्व का एक और पहलू है जो पारंपरिक आकलन व्यवस्था के लिए चुनौती बना हुआ है। अगर हम संयुक्त राष्ट्र के स्थायी विकास लक्ष्यों पर विचार करें तो अलग-अलग क्षेत्रों के बीच जानकारी का आंतरिक संबंध चौंकाने वाला है। 

खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कृषि उत्पादन बढ़ाने के क्रम में हम बीज, उर्वरक, कीटनाशक और पानी आदि का आकलन करते हैं लेकिन यह भी ध्यान देने की आवश्यकता है कि रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक किसानों और उनके परिजनों के स्वास्थ्य के लिए खासे नुकसानदेह साबित हो सकते हैं। 

 

यह स्वास्थ्य सुरक्षा को खतरा है लेकिन स्वास्थ्य की लागत को कृषि उत्पादन की लागत में शामिल ही नहीं किया जाता। खेती में पानी का प्रचुर उपयोग होता है इससे भूजल स्तर में कमी आ रही है। इससे जल सुरक्षा को खतरा उत्पन्न हो रहा है लेकिन यह लागत भी कृषि उत्पादन लागत में शामिल नहीं की जाती है। स्थायित्व की एक जटिल अवधारणा है जो विभिन्न  आर्थिक गतिविधियों से संचालित होती है। हमारी आकलन व्यवस्था इनको समेट पाने में नाकाम है, खासकर जब विविध स्रोत इसमें शामिल हों तब।

दुनिया इस समय पर्यावरण को लेकर आपात स्थिति से दो-चार है। हो सकता है हमें तब तक संकेत न मिले जब तक हालात बहुत खराब न हो जाएं। जरूरत इस बात की है कि हम तत्काल ऐसे शोध और डिजाइन व्यवस्था को अपनाएं जो पर्यावास के संबंध में स्थायित्व हासिल करने में हमारी सहायता करें, बजाय कि मौजूदा खपत के आधार पर अपने भविष्य को जोखिम में डालने के।

भारत को अपनी पहल इस दिशा में ले जानी चाहिए क्योंकि पर्यावास की चुनौतियां दिन पर दिन कठिन रूप ग्रहण करती जा रही हैं। मानव जाति के लिए बेहतर और स्थायित्व भरा भविष्य तैयार करने के लिए यह आवश्यक है कि हम वैश्विक प्रयासों में अपना योगदान दें।

Keyword: Environment, Capital, Earth, Generation, Natural resources, Economic Activity,
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