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कंपनी अधिनियम में सुधार के लिए रहें एकदम तैयार

बाअदब
सोमशेखर सुंदरेशन /  September 11, 2018

कंपनी अधिनियम, 2013 के प्रावधानों की समीक्षा के लिए बनी एक समिति एक प्रभावशाली सुधार को अंजाम देते-देते रह गई। बहरहाल, समिति की अनुशंसाएं सुधार की जमीन अवश्य तैयार करती हैं। इन्हें जल्द से जल्द अमल में लाया जाना चाहिए। समिति का सबसे बड़ा योगदान है उन तमाम अपराधों का विस्तृत विश्लेषण करना जिनका निपटान मौद्रिक जुर्माना चुकाकर किया जा सकता है। यह अनुशंसा की गई है कि इन अपराधों को आपराधिक अभियोजन की श्रेणी से हटाकर आर्थिक जुर्माने की श्रेणी में डाल दिया जाए।

 
समिति कई अन्य उल्लंघनों को वित्तीय जुर्माने वाली श्रेणी में डाल सकती थी लेकिन वह ऐसा करने से बची है। आलोचना से यह भय उचित प्रतीत होता है क्योंकि ऐसी चर्चा शुरू हो चुकी है कि कानून को शिथिल किया गया है। यद्यपि यह आलोचना सही नहीं है। समिति ने उपरोक्त अपराधों को आठ श्रेणियों में बांटा है लेकिन केवल तीन श्रेणियों को मौद्रिक जुर्माने वाले वर्ग में स्थानांतरित करने की अनुशंसा की है। वह भी कुछ अपवादों के साथ। सुधार को लेकर ऐसे रूढि़वादी और बचाव भरे रुख को स्वीकार किया जाना चाहिए लेकिन ध्यान रहे कि इससे अधिक कुछ किया जा सकता था और करने की जरूरत है। इस संदर्भ में तीन बातें निकलकर आती हैं।
 
पहली बात, यह सोच ही गलत है कि आपराधिक अभियोजन से कानून का डर पैदा होगा और मौद्रिक जुर्माना कानून को कमजोर करने जैसा है। आपराधिक अभियोजन में दोष सिद्ध करने के लिए प्रमाण आवश्यक हैं जबकि मौद्रिक जुर्माना आशंका के आधार पर और तर्क के आधार पर लगाया जा सकता है। बाजार नियामक से पूछिए, आप पाएंगे कि मानकों में अंतर को कितनी गहनता से कानून का भय लागू करने में प्रयोग किया जा सकता है। इसके अलावा कानून उल्लंघन के लिए जो भय उत्पन्न किया जा सकता है वह लगाए गए जुर्माने के समक्ष मामूली हो सकता है। इससे समाज के अन्य वर्ग भी हालात की गंभीरता का संकेत ग्रहण कर सकते हैं।
 
दूसरी बात, एक दलील यह है कि मौद्रिक जुर्माना उल्लंघन के लिए लाइसेंस का काम करता है। इस समस्या को हल करना मुश्किल नहीं है। कानून में भारी जुर्माने और बार-बार उल्लंघन करने पर दूसरे कदम उठाने की व्यवस्था हो सकती है। ऐसी व्यवस्था कुछ महीनों में एक बार आपराधिक न्यायालय में पेश होने की तुलना में कहीं अधिक दिक्कतदेह हो सकती है। इतना ही नहीं देश की न्यायिक व्यवस्था को भी अतिरिक्त बोझ से बचाया जा सकता है। सच तो यह है कि न्याय व्यवस्था को इस बोझ से बचाने और आर्थिक दंड की व्यवस्था करने से हमारे तंत्र को बेहतर काम करने का अवसर मिलेगा। 
 
तीसरा, कंपनी कानून के अधीन प्रवर्तन के लिए गंभीर सुधारों की जरूरत है। हमारे कंपनी कानून के जमानत संबंधी प्रावधान नारकोटिक्स कानूनों के जमानत प्रावधानों का ही अनुकरण हैं। जब भी धोखाधड़ी का इल्जाम लगता है और आरोपित जमानत चाहता है तो पहले अदालत को संतुष्टï करना पड़ता है कि वह वास्तव में दोषी है नहीं और बाहर निकलकर वह अपराध नहीं करेगा। धनशोधन निरोधक अधिनियम, 2002 (पीएमएलए) के ऐसे ही एक प्रावधान को गत वर्ष सर्वोच्च न्यायालय ने इस आधार पर ठुकरा दिया था कि यह असंवैधानिक है। सर्वोच्च न्यायालय ने उस मामले में कहा था, 'हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि धारा 45 एक ऐसा प्रावधान है जो निर्दोष होने की अवधारणा को सर के बल उलट देती है जबकि वह किसी भी अपराध के आरोपित का मूल अधिकार है। संविधान के अनुच्छेद 21 में उल्लिखित व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मूलभूत अधिकार में हस्तक्षेप करने वाली किसी भी धारा को लागू करने के पहले हमें दोहरी जांच कर लेनी चाहिए कि यह प्रावधान गंभीर अपराध के विरुद्घ राज्य के हित में है। अगर इसमें राज्य का हित शामिल न हो तो धारा 45 का इस्तेमाल यकीनन संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन होगा। धारा 45 संबंधी प्रावधान केवल तभी बरकरार रहे हैं जब अत्यंत घृणित अपराध से निपटने में राज्य का हित दांव पर हो।'
 
समिति ने इस निर्णय पर ध्यान दिया होगा और यह विचार किया होगा कि अगर इसे इसी प्रकार लागू किया जाए तो कंपनी कानून में सुधार हो सकता है और वह अधिक सार्थक हो सकता है। इसके बजाय समिति ने रक्षात्मक रुख अपनाते हुए कहा, 'स्पष्टïता के लिए यह जोर दिया जाना चाहिए कि धोखाधड़ी समेत गंभीर कॉर्पोरेट अपराधों के लिए प्रवर्तन संबंधी प्रावधानों को शिथिल करने की कोई मंशा नहीं है।' पीएमएलए में तीन वर्ष की संभावित कैद का प्रावधान है। कंपनी कानून के लिए भी उसका संदर्भ देना उचित होगा। कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 447 एक और ऐसा प्रावधान सामने रखती है जो संवैधानिक रूप से जटिल है। इसमें धोखाधड़ी के लिए न्यूनतम छह माह और अधिकतम 10 वर्ष कैद की सजा की बात है। दूसरे शब्दों में कहें तो अगर किसी कंपनी पर मात्र 100 रुपये की धोखाधड़ी साबित होती है तो छह माह तक की सजा हो सकती है। वहीं लाखों रुपये के गबन में भी इतनी ही सजा हो सकती है। कानून के मुताबिक अगर धोखाधड़ी का मामला जनहित से जुड़ा हुआ तो तीन वर्ष तक की जेल हो सकती है।
 
यह दलील दी जा सकती है कि धोखाधड़ी का हर मामला जनहित का होगा। सरकारी कंपनी या किसी सूचीबद्घ कंपनी का मामूली से मामूली धोखाधड़ी का मामला जनहित से जुड़ा माना जाएगा। या फिर धोखाधड़ी का आकार उसका जनहित में होना या न होना तय करेगा? अगर धोखाधड़ी के सारे मामले जनहित से जुड़े हों तो छह माह की न्यूनतम और तीन वर्ष की अधिकतम सजा में कोई अंतर नहीं होगा। प्रावधान पूरी तरह स्वैच्छिक है। इससे निपटना जरूरी है। संभव है भविष्य में कोई समिति इससे निपटे। 
 
(लेखक अधिवक्ता हैं और लेख में प्रस्तुत विचार उनके निजी हैं।)
Keyword: company, law, policy, कंपनी अधिनियम,
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