बिजनेस स्टैंडर्ड - आईबीसी परिसंपत्तियों पर विदेशी पीई की नजर
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आईबीसी परिसंपत्तियों पर विदेशी पीई की नजर

सुरजीत दास गुप्ता / नई दिल्ली 09 11, 2018

कंपनियों के लिए 1.1 लाख करोड़ रुपये के निवेश की जरूरत होगी

प्रमुख वैश्विक निजी इक्विबिजनेस स्टैंडर्ड आईबीसी परिसंपत्तियों पर विदेशी पीई की नजरटी (पीई) फंड एवं उनके संयुक्त उद्यम ऋण शोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) के तहत अगले दौर की परिसंपत्तियों के लिए तैयार दिख रहे हैं। इसके तहत 28 दबावग्रस्त परिसंपत्तियों के लिए बोलियां आमंत्रित की जा सकती हैं।

हालांकि पहले दौर के तहत 12 दबावग्रस्त परिसंपत्तियों की बिक्री प्रक्रिया में प्रमुख वैश्विक कंपनियों को अधिक सफलता नहीं मिली और केवल एऑन ही जेएसडब्ल्यू कंसोर्टियम के साथ मोनेट इस्पात में हिस्सेदारी हासिल करने में सफल रही। एऑन अपोलो ग्लोबल मैनेजमेंट और आईसीआईसीआई वेंचर का संयुक्त उद्यम है। 

पहले दौर की बिक्री प्रक्रिया के तहत परिसंपत्तियों में दिलचस्पी होने (केकेआर की नजर मोनेट पर थी) के बावजूद अन्य प्रमुख वैश्विक खिलाडिय़ों ने मैदान मुख्य तौर पर रणनीतिक खिलाडिय़ों के लिए छोड़ दिया था। उदाहरण के लिए, बेन-पीरामल ने शुरू में एक साझेदार के साथ भूषण पावर और भूषण स्टील दोनों में दिलचस्पी दिखाई थी।

जबकि बेन-पीरामल के समर्थन के साथ डालमिया भारत का बिनानी सीमेंट के लिए दिवालिया अदालतों में अल्ट्राटेक से मुकाबला था। पीई फंडों ने बताया कि अगले दौर की आईबीसी प्रक्रिया में शामिल 28 कंपनियों में प्रत्येक कंपनी का राजस्व 200 अरब रुपये से 400 अरब रुपये के बीच है जबकि उसका ऋण बोझ 200 अरब रुपये से 500 अरब रुपये के दायरे में है।

कुल मिलाकर इन कंपनियों के लिए 15 अरब डॉलर यानी करीब 1.1 लाख करोड़ रुपये के ऋण-इक्विटी निवेश की जरूरत होगी। इस प्रकार प्रत्येक कंपनी के लिए औसतन 10 करोड़ डॉलर के से अधिक के इक्विटी निवेश की जरूरत होगी। करीब 3 अरब डॉलर प्रत्यक्ष इक्विटी निवेश से और शेष रकम ऋण से आने की उम्मीद है।  

बेन कैपिटल क्रेडिट और पीरामल एंटरप्राइजेस के बीच संयुक्त उद्यम इंडिया रीसर्जेंस ऐसेट मैनेजमेंट बिजनेस के प्रबंध निदेशक शांतनु नालावाड़ी ने कहा, 'आईबीसी के तहत परिसंपत्तियों की बोली प्रक्रिया में हम सक्रिय रहे हैं और हम 28 कंपनियों की अगली सूची में भी भाग लेंगे।

हम उन परिसंपत्तियों पर लगातार ध्यान केंद्रित करेंगे जहां पुनरुद्धार की संभावना दिखे। साथ ही हमारी नजर उन क्षेत्रों पर रहेगी जिनका विकास दमदार तरीके हुआ हो और आगे जबरदस्त मांग आने की उम्मीद हो।' केकेआर के सूत्रों के अनुसार, कंपनी अगले दौर के तहत संभावित परिसंपत्तियों में नियंत्रणयोग्य इक्विटी हासिल करना चाहती है ताकि वह दबावग्रस्त कंपनियों के पुनरुद्धार में अपनी विशेषज्ञता का फायदा उठा सके।

वह प्रवर्तकों को अल्पांश शेयरधारक के तौर पर कंपनी में बरकरार रखना चाहती है। उदाहरण के लिए, एऑन जैसे पीई फंड की नजर वाहनों के कलपुर्जे, औषधि एवं धातु जैसे क्षेत्रों पर रही है। पहले दौर में मोनेट के साथ धातु क्षेत्र में उसे सफलता भी मिली है। इसलिए उम्मीद की जा रही है कि एऑन अगले दौर में भी उन्हीं क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करेगी। एऑन ने एमटेक ऑटो जैसी वाहनों के कलपुर्जा बनाने वाली कंपनी में दिलचस्पी दिखाई थी लेकिन बोली लगाने से परहेज किया था।

वैश्विक पीई फंडों का कहना है कि उन्हें रणनीतिक खिलाडिय़ों के साथ-साथ अन्य चुनौतियों से भी जूझना पड़ रहा है जो काफी ऊंची बोली लगाने की उनकी क्षमता को सीमित करता है। इसलिए पीई फंड विभिन्न मॉडलों पर विचार कर रहे हैं। पहला, उस क्षेत्र में विशेषज्ञता प्राप्त किसी स्थानीय साझेदार के साथ करार करने के बाद कंसोर्टियम के तौर (जैसा एऑन ने जेएसडब्ल्यू के साथ किया था) पर बोली लगाना।

दूसरा, समान क्षेत्र में विभिन्न विशेषज्ञता प्राप्त साझेदारों के साथ करार करना। तीसरा, खुद अपने दम पर बोली लगाना ताकि बेहतर मूल्य हासिल हो सके। चौथा, प्रवर्तकों को अल्पांश हिस्सेदार के तौर पर कंपनी में बराकर रखने के लिए तैयार करना ताकि परिचालन में कोई समस्या न आने पाए।

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