बिजनेस स्टैंडर्ड - बिजली क्षेत्र के एनपीए का आसन्न संकट
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बिजली क्षेत्र के एनपीए का आसन्न संकट

श्याम पोनप्पा /  September 10, 2018

फंसे हुए कर्ज का संकट केवल बैंकिंग क्षेत्र में नहीं है। उसने अर्थव्यवस्था के एक बड़े हिस्से को चपेट में ले रखा है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं श्याम पोनप्पा 

 
देश के बैंकिंग क्षेत्र पर फंसे हुए कर्ज (एनपीए) के प्रभाव ने समूचे वित्तीय क्षेत्र को तगड़ा झटका दिया है और वह हमारी राजनीतिक अर्थव्यवस्था और समाज के लिए एक बड़ी चुनौती पेश कर रहा है। यह सच है कि इस समस्या से निपटने के लिए संसाधनों का प्रबंध किया जा रहा है लेकिन इसे अब तक हल नहीं कर पाना अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका है। इसके लिए अंतर्निहित विरोधाभास, खराब समझ अथवा अक्षमता और सुसंगत निर्णय के स्थान पर बंटे हुए निर्णय उत्तरदायी हैं। ताजा मामला बिजली उत्पादकों की उस याचिका का है जो उन्होंने पुनर्भुगतान की समय सीमा बढ़ाने को लेकर दायर की है।
 
याद कीजिए कैसे 2011 के बाद एनपीए में इजाफा हुआ है। उस वक्त कुल ऋण का 2.5 फीसदी एनपीए था। 2004-05 से 2007-08 तक उच्च वृद्धि के दौर ने इसे सीमित रखने में सहायता की थी। लंबी अवधि की बुनियादी परियोजनाओं में कारोबारी ऋण के निवेश को सरकार ने बढ़ावा दिया। इसमें बिजली और खदान तथा कोयला और स्पेक्ट्रम की नीलामी आदि शामिल हैं। इसके चलते सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के प्रतिशत के रूप में निवेश की हिस्सेदारी 2004-05 के 27 फीसदी से बढ़कर 2007-08 तक 38 फीसदी हो गई।
 
इसके बाद दो बातें घटीं। सन 2010 से 2014 के बीच तेल और अन्य आयात की कीमतों में 2.4 गुना बढ़ोतरी हो गई जबकि डॉलर की तुलना में रुपये का मूल्य तेजी से गिरा। इससे बाह्य ऋण की लागत बढ़ गई। वर्ष 2016 के मध्य तक घरेलू ऋण की लागत भी 8 फीसदी तक बढ़ गई थी। ईंधन आपूर्ति तथा परियोजना क्रियान्वयन मसलन भूमि अधिग्रहण, पर्यावरण तथा अन्य सरकारी मंजूरियों में भी समस्या सामने आई। सन 2013 तक करीब एक तिहाई भारतीय कंपनियों का ब्याज कवर (ईसी 1) 1 से कम था। यानी ब्याज और कर पूर्व सालाना आय ब्याज व्यय से कम। सन 2015 तक यह करीब 40 फीसदी हो गया। सन 2014 के बाद से ऋण की भरपाई के लिए पर्याप्त नकदी नहीं थी और मार्च 2018 तक एनपीए 2.5 फीसदी से बढ़कर 11.6 फीसदी और मार्च 2019 तक 12.2 फीसदी हो गया।
 
सन 2016 में जब आरबीआई ने एनपीए के वर्गीकरण को लेकर कड़ा रुख अपनाया तो ऋण को लेकर बेखबरी रुकी। बहरहाल राज्य बिजली वितरण कंपनियों द्वारा भुगतान में देरी, ईंधन की उपलब्धता की दिक्कत और शुल्क दरों में बदलाव आदि की दिक्कतें बरकरार हैं। अर्थव्यवस्था में आए धीमेपन तथा कई बिजली परियोजनाएं शुरू होने से आपूर्ति भी बढ़ गई है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बिजली उत्पादकों की याचिका पर जो आदेश दिया वह कई विरोधाभास उजागर करता है। ये शायद वित्तीय पहलुओं की अधूरी प्रस्तुति से उपजे हैं। आदेश इस याचिका को नकारता है लेकिन याचियों को यह इजाजत देता है कि वे जरूरत पडऩे पर अंतरिम राहत का आवेदन दे सकते हैं। यह सरकार को निर्देश देता है कि वह आरबीआई अधिनियम की धारा 7 के तहत 15 दिन के भीतर हस्तक्षेप पर विचार करे। बिजली मंत्रालय द्वारा अलग से गठित एक समिति इस विषय पर दो महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी।
 
ध्यान रहे कि इस निर्णय के छोटे से हिस्से को छोड़कर 124 पृष्ठïों के निर्णय में नकदी प्रवाह और उसके असर को लेकर कुछ खास नहीं कहा गया है। धारा में कहा गया है, 'आशा तो यही है कि बैंकों के पास अतिरिक्त पूंजी जुटाने की पर्याप्त व्यवस्था होगी इसलिए उन्हें पूंजीगत संकट का सामना नहीं करना पड़ेगा।' काश यह सच होता। इलाहाबाद उच्च न्यायालय हमारी वित्तीय हकीकत से अनभिज्ञ दिखता है। उसे शायद अंदाजा नहीं है कि बिजली क्षेत्र, बैकिंग तंत्र को कितना नुकसान पहुंच चुका है और समूची अर्थव्यवस्था को तत्काल राहत की कितनी आवश्यकता है। यह समस्या कई वर्ष की खामियों से उपजी है। 
 
दिक्कत तब शुरू हुई जब आरबीआई ने एनपीए के वर्गीकरण को लेकर प्रशासनिक और नियामकीय कड़ाई की। इस बीच सरकार चाहती है कि अदालत बिजली उत्पादकों के पुनर्भुगतान की अवधि को बढ़ाया जाए जबकि शेष इस बात पर अड़े हुए हैं कि बिना किसी भेदभाव के दिवालिया प्रक्रिया को अपनाया जाए। एक बात विरोधाभासी परिस्थितियों को भी स्पष्ट करता है: 'एनपीए तो हमेशा से था, बस हम अब उसकी पहचान कर रहे हैं।' अदालत का निर्णय एनपीए को लेकर आरबीआई के निर्देशों को चिह्निïत करता है। उदाहरण के लिए स्कोप की रिपोर्ट और बिजली मंत्रालय का साक्ष्य। इसके अलावा नियमों का गलत क्रियान्वयन, ईंधन आपूर्ति का संकट, अपर्याप्त बिजली रिक्तीकरण तंत्र और बकाया भुगतान ने बिजली क्षेत्र की वित्तीय स्थिरता को समाप्त कर दिया। 
 
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने याचियों के पुनर्भुगतान के लिए 180 दिन का समय और मांगा। भारतीय स्टेट बैंक के चेयरमैन और ग्रामीण विद्युतीकरण निगम के प्रमुख ने भी कहा कि आरबीआई की 180 दिन की अवधि अपर्याप्त है। निर्णय में याचिका को नकारने की तीन अहम वजह दी गईं:
 
(अ) सरकार का रुख विरोधाभासी है क्योंकि एक ओर वह याचियों के लिए अतिरिक्त  समय की मांग कर रही है जबकि वह एनपीए पर आरबीआई के रुख के साथ है। ध्यान रहे कि सरकार अब अस्पष्ट रुख नहीं अपना सकती।
 
(ब) इलाहाबाद उच्च न्यायालय का कहना है कि आरबीआई का निर्देश धारा 5 (बी) (1) कहता है कि सभी ऋणदाता एक पुनर्गठन प्रक्रिया को स्वीकार करें जहां भारतीय ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता के अधीन 66 फीसदी ऋणदाताओं की मंजूरी आवश्यक हो। आरबीआई इसे गलत ठहरा कर बता सकता है कि क्यों सभी ऋणदाताओं की मंजूरी आवश्यक है।
 
(स) आरबीआई की क्रेडिट रेटिंग एजेंसी अधिसूचना में देरी हुई और यह 21 मई, 2018 को आई जबकि 180 दिन की समय सीमा 1 मार्च 2018 को शुरू हो गई।
 
अदालती आदेश में कहा गया है कि ऋणदाताओं की अदालतों में गैरमौजूदगी इस निष्कर्ष पर पहुंचने की वजह बनी है। उनकी राय सामने नहीं है और देश के वित्तीय बाजारों की हालत का मुद्दा गंभीर है। ऐसे में समस्याओं से निजात पाने के तरीके तलाशने का काम विशेषज्ञों पर छोड़ दिया जाना चाहिए। देश में कई क्षेत्र बिजली की कमी के शिकार हैं लेकिन कुल मिलाकर क्षमता अधिक है। इस बीच राज्य वायदा बाजार में सस्ती बिजली के लिए बिजली खरीद समझौतों से इनकार कर रहे हैं। सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाओं के लिए आक्रामक बोली लग रही है। वितरण कंपनियों की भुगतान कर पाने में अक्षमता के चलते कई परियोजनाएं क्षमता से नीचे काम कर रही हैं और कम बोली के चलते उत्पादन बाजार प्रभावित हो रहा है। बैंकों के अलावा कई बड़ी परियोजनाएं भी खतरे में हैं। समग्र, संपूर्ण नीति आधारित और आंतरिक विरोधाभास के निस्तारण का कोई विकल्प नहीं है।
Keyword: bank, loan, debt, RBI, NPA,,
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