बिजनेस स?टैंडर?ड - दो नावों के बीच संतुलन बिठाने की कोशिश में भाजपा
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दो नावों के बीच संतुलन बिठाने की कोशिश में भाजपा

अर्चिस मोहन /  09 10, 2018

राजनीति

एससी-एसटी अत्याचार निवारण कानून पर सवर्ण तथा अन्य पिछड़ी जातियों में रोष

बिजनेस स?टैंडर?ड दो नावों के बीच संतुलन बिठाने की कोशिश में भाजपाउत्तर भारत की राजनीति में इस समय उथलपुथल का दौर चल रहा है। 1990 के मॉनसून के बाद शायद ही कभी ऐसी स्थिति रही है। उस साल देश में जाति आधारित राजनीति का दौर शुरू हुआ जिसे 1990 के दशक की शुरुआत में संघ परिवार के रथ को रोका था। वी पी सिंह की सरकार ने भीमराव आंबेडकर को भारत रत्न देकर उनकी विचारधारा को पुनर्जीवित कर दिया। इसी सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा की और अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के लोगों पर अत्याचार रोकने के लिए कड़ा कानून बनाया। 

इसके बाद दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के नेताओं ने भाजपा के पक्ष में हिंदू वोटों को एकजुट करने की संघ परिवार की योजना को धराशायी कर दिया। 28 मॉनसून बाद एक बार फिर वही स्थिति उभरती दिख रही है। ऐसा लग रहा था कि भाजपा दलितों और ओबीसी को साधकर लगातार दूसरे लोकसभा चुनावों के लिए हिंदू वोटों को एकजुट करने में जुटी है, लेकिन जातिगत उभार हिंदू राष्ट्र बनाने की संघ परिवार के प्रयासों को झटका लग सकता है।

गुरुवार को उत्तर भारत के सभी राज्यों में सवर्ण संगठनों ने भारत बंद का आह्वान किया। कुछ इलाकों से हिंसा की खबरें आई और चुनावी राज्य मध्य प्रदेश में भाजपा नेताओं के साथ मारपीट भी हुई। लेकिन प्रदर्शनों की अगुआई कर रहे संगठनों ब्राह्मण समाज, परशुराम सेना, सवर्ण जन कल्याण संगठन और क्षत्रिय सेना का दावा है कि उनके 'भारत बंद' का मिलाजुला असर रहा। बंद का सर्वाधिक असर मध्य प्रदेश और बिहार के कुछ जिलों में देखने को मिला। खासकर मध्य प्रदेश के ग्वालियर और बिहार के मुजफ्फरपुर में बंद का खासा असर रहा। मुजफ्फरपुर में आंदोलनकारियों ने लोकसभा सांसद पप्पू यादव के साथ मारपीट की। 

ये संगठन नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा संसद के मॉनसून सत्र में पारित कराए गए उस विधेयक का विरोध कर रहे हैं जिसमें अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लोगों के खिलाफ अत्याचार रोकने के कानून के कड़े प्रावधानों को बहाल किया गया है। इन संशोधनों ने उच्चतम न्यायालय के 20 मार्च के उस आदेश को पलट दिया है जिसमें इस कानून के प्रावधानों को कमजोर किया गया था।

दलितों के दो अप्रैल के व्यापक प्रदर्शन और विपक्षी तथा सहयोगी दलों के दबाव में मोदी सरकार ये संशोधन लाई थी जिसने उत्तरी भारती में सवर्णों को नाराज कर दिया। सवर्ण संगठनों की उम्मीद के मुताबिक बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश में ओबीसी जातियों ने बड़ी संख्या में बंद में हिस्सा नहीं लिया। लोकसभा चुनावों में अब केवल नौ महीने बाकी हैं और संघ परिवार तथा भाजपा के भीतर इस स्थिति को लेकर बेचैनी है। पार्टी को आशंका है कि एक बार फिर 1993 की पुनरावृत्ति हो सकती है जब मुलायम सिंह के नेतृत्व में ओबीसी और कांशीराम की अगुआई में दलितों ने साथ मिलकर बाबरी मस्जिद विध्वंस की पृष्ठभूमि में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में भाजपा के चुनावी रथ को रोक दिया था। 

बिजनेस स?टैंडर?ड दो नावों के बीच संतुलन बिठाने की कोशिश में भाजपाहालांकि यह गठबंधन ज्यादा दिन नहीं चला लेकिन वह भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के मकसद में कामयाब रहा। अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी और मायावती की बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनावों में भाजपा के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।  हालांकि संघ परिवार इस बात से भी चिंतित है कि दलितों के बीच पैठ बनाने की उसकी कोशिशों से सवर्ण इतने नाराज हो गए हैं कि वे विरोध स्वरूप मतदान न करने या नोटा दबाने की बात कर रहे हैं। संघ परिवार का आकलन यह है कि फूलपुर और गोरखपुर लोकसभा उपचुनावों में उसकी कारण का मुख्य कारण यह रहा कि अगड़ी जातियों के मतदाता वोट देने नहीं आए।

गुरुवार से भाजपा के कई नेताओं ने अगड़ी जातियों के साथ-साथ दलितों को मनाने की कोशिश की है। लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने सवर्णों से संयम रखने की सलाह दी है जबकि भाजपा ने दलितों को शांत करने के लिए आंबेडकर इंटरनैशनल सेंटर को प्रतीकात्मक रूप से राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक के वास्ते चुना।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा प्रमुख अमित शाह ने अपने भाषणों में इस बात का उल्लेख किया कि केंद्र की भाजपा सरकार ने पिछले चार सालों में अंबेडकर के संबंध में क्या-क्या काम किए हैं। इस बीच कांग्रेस ने 1980 के दशक के अपने ब्राह्मण वोट बैंक पर फिर से दावे जताने की कोशिश की। हरियाणा में पार्टी के नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने ब्राह्मणों का सम्मेलन आयोजित किया जबकि मध्य प्रदेश में कमलनाथ ने गोरक्षा सहित ऐसे मुद्दों पर बात की जो ब्राह्मणों के दिल के करीब है।

मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और मुख्यधारा के राजनीतिक दलों के राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इससे कांग्रेस को ज्यादा फायदा नहीं होगा लेकिन भाजपा कांग्रेस के बिछाए राजनीतिक जाल में फंस गई है और 2019 के चुनावों में इससे बचने के लिए पार्टी को किसी बड़े चमत्कार की जरूरत होगी। लखनऊ के राजनीतिक विश्लेषक आनंद वद्र्घन सिंह कहते हैं, 'निश्चित रूप से इसका दलित अधिकारों से ज्यादा लेनादेना नहीं है बल्कि यह मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में होने वाले विधानसभा चुनावों और फिर अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों के लिए राजनीतिक मुद्दा है। देश के उत्तरी राज्यों में अनुसूचित जातियों की अच्छी खासी संख्या है। भाजपा को मुख्य रूप से अगड़ी जातियों की पार्टी माना जाता है और यह बात उसके लिए नुकसानदेह हो सकती है। लेकिन इसमें सवर्णों के नाराज होने का भी खतरा है। अब देखना है कि पार्टी इस विरोधाभास से कैसे निपटती है।'

भाजपा कर्पूरी ठाकुर फॉर्मूला लागू करने की तैयारी में जुटी है। इसका मतलब ओबीसी के लिए 27 फीसदी आरक्षण में अति पिछड़ी जातियों को आरक्षण देना है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ओबीसी जातियों पर लालू प्रसाद यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के प्रभाव को कम करने के लिए यह फॉर्मूला लागू किया था। ऑल इंडिया अंबेडकर महासभा के प्रमुख अशोक भारती ने कहा, 'इस तरह की रणनीति के लिए अब देर हो चुकी है। भाजपा सवर्णों की पार्टी है और न केवल दलितों बल्कि ओबीसी के बीच भी उसकी पोल खुल चुकी है। अन्यथा इस बंद में बड़ी संख्या में ओबीसी जातियों ने क्यों हिस्सा नहीं लिया।'

उत्तरी राज्यों और महाराष्ट्र में जातिगत विरोधाभासों ने भाजपा का सिरदर्द बढ़ा दिया है। पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों, छोटे कारोबारियों पर नोटबंदी और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के असर तथा कृषि संकट से पार्टी पहले ही परेशान है।  यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या मोदी और शाह के नेतृत्व में भाजपा कथित साझा दुश्मन (तथाकथित शहरी नक्सलियों के कथित भारत तोड़ो बिग्रेड) के खिलाफ दलितों और ओबीसी को सवर्णों के साथ एकजुट करने में सफल रहती है या नहीं। 
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