बिजनेस स्टैंडर्ड - राहुल का नरम हिंदुत्व और कांग्रेस की स्थिति
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राहुल का नरम हिंदुत्व और कांग्रेस की स्थिति

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  September 09, 2018

राहुल गांधी को भगवान शिव के निवास मानसरोवर की शरण लेनी पड़ी लेकिन वह भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को परेशानी में डालने में सफल रहे हैं। भाजपा चाहती तो राहुल गांधी की मानसरोवर तीर्थ यात्रा पर समझदारी भरी प्रतिक्रिया दे सकती थी। वह कह सकती थी कि वाह सर जी क्या खूब सोची आपने? भोले बाबा आपको कुछ समझदारी दें। आशा है आप अपने प्रतिद्वंद्वियों के लिए भी प्रार्थना करेंगे! इतने भर से यह मुद्दा समाप्त हो जाता। शायद भगवान शिव भी इससे प्रसन्न ही होते। परंतु लोकसभा में भारी बहुमत रखने वाली भाजपा न केवल राहुल गांधी की मानसरोवर यात्रा की तस्वीरों की हकीकत को लेकर तथ्यों की जांच करने लगी बल्कि उनके वहां होने या न होने पर भी सवाल उठाए गए। केंद्र सरकार के एक मंत्री महोदय तो जासूस ही बन गए। उन्होंने दावा किया राहुल द्वारा पोस्ट की गई तस्वीरें फोटोशॉप की गई हैं क्योंकि उनकी छड़ी की परछाई नहीं नजर आ रही।

 
भाजपा ने जितनी बेवकूफी की, राहुल ने उतनी ही चतुराई भरी राजनीति का परिचय दिया है। भाजपा जवाहरलाल नेहरू को लेकर इतनी आसक्त है कि शायद उसे लगता है कि नेहरू की आने वाली पीढिय़ां भी उनका अज्ञेयवाद अपनाएंगी। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी दोनों ने इसे झुठलाया था। धर्मनिरपेक्षता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का यह अर्थ नहीं था कि वे भी नेहरू की तरह अनीश्वरवादी थे। इंदिरा रुद्राक्ष धारण करती थीं और उन्हें अक्सर मंदिरों के दर्शन करते या बाबाओं और तांत्रिकों के पास जाते देखा जाता था। राजीव गांधी ने अयोध्या में राम जन्मभूमि स्थल का ताला खुलवाया और प्रस्तावित मंदिर का शिलान्यास करवाया। उन्होंने सन 1989 में अपने चुनाव अभियान की शुरुआत अयोध्या से की और राम राज्य लाने का वादा किया। संभव है मोदी-शाह की जोड़ी और भाजपा के मन में यह भ्रम संप्रग के 10 वर्ष के कार्यकाल से उपजा हो जब गठबंधन के वाम झुकाव के चलते किसी तरह की धार्मिकता नजर नहीं आई। फिर भी मनमोहन सिंह ने परमाणु समझौते के बचाव में संसद में दिए अपने भाषण में चंडी दी वार का सगर्व स्मरण किया था। गुरु गोविंद सिंह द्वारा लिखी गई यह रचना देवी चंडी की भगवान शिव से प्रार्थना है। इंदिरा के कार्यकाल के दौरान ही कांग्रेस ने धुर धर्मनिरपेक्षता की नेहरूवादी परिभाषा त्याग दी थी और कहीं अधिक नरम धार्मिकता और आक्रामक अल्पसंख्यकवाद अपना लिया था। भाजपा इसे ही तुष्टीकरण कहती है। राहुल और आगे बढ़कर जनेऊधारी हिंदू बन गए हैं। वे श्वेत वस्त्र धारण किए हुए मंदिरों में जाते हैं और अब चुनावी मौसम के आगाज के साथ ही वे मानसरोवर की यात्रा पर निकल गए हैं।
 
इससे धुर धर्मनिरपेक्ष और वाम रुझान वाले उनके नए समर्थक निराश हैं लेकिन राहुल राजनीतिक रूप से चतुर हैं और यह बात समझते हैं कि देश जेएनयू से बाहर भी है और देवताओं को किनारे कर के इस देश में कोई चुनाव नहीं जीत सकता। इस बीच भाजपा राहुल की धार्मिकता को लेकर जो प्रतिक्रिया दे रही है, उससे साफ है कि वह हड़बड़ा गई है। उसने कभी नहीं सोचा होगा कि गांधी परिवार का कोई व्यक्ति हिंदुत्व के उसके एकाधिकार को चुनौती देगा। जिस प्रकार राहुल गांधी ने माओवादी संपर्क के चलते पकड़े गए लोगों के प्रति तत्काल समर्थन जाहिर किया, उससे उनकी पार्टी भी चकित हुई। क्या वे भाजपा के कट्टर हिंदुत्व का मुकाबला नरम हिंदुत्व से कर रहे हैं? साथ ही क्या वे उसके कट्टर राष्ट्रवाद के मुकाबले नरम राष्ट्रवाद ला रहे हैं? यदि ऐसा है तो यह कांग्रेस की राजनीति में एक बड़ा बदलाव है और पहले से अधिक जोखिम भरा भी।
 
उन्होंने पकड़े गए लोगों का समर्थन तो किया लेकिन लगता नहीं कि उस पर किसी पार्टी मंच में कोई बहस हुई। उन्होंने यह बिना सोचे विचारे किया। इनमें से चार लोगों को तो खुद उनकी संप्रग सरकार ने पकड़ा या प्रतिबंधित किया था। उनमें से एक को छह साल विचाराधीन कैदी के रूप में रहना पड़ा तो दूसरे को गंभीर आतंकी आरोपों में सात साल जेल में बिताने पड़े। कोबड़ गांधी और जी एन साईबाबा, दोनों को उनकी संप्रग सरकार द्वारा पकड़ा गया था और दोनों अब तक जेल में हैं। दो प्रमुख नक्सल आजाद और किशनजी खुद उनकी सरकार की एजेंसियों के हाथों मारे गए। 
 
क्या वे अब इसे बदल रहे हैं? 2006 में डॉ मनमोहन सिंह ने जिसे आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया था, क्या उसे लेकर रुख नरम हो रहा है? ध्यान रहे कि संप्रग के पहले कार्यकाल में जब सरकार को वाम का समर्थन हासिल था, तब डॉ मनमोहन सिंह राजनीतिक वाम और नक्सलों में फर्क करने में कामयाब रहे थे। क्या राहुल में यह बदलाव देखना मुश्किल है? हालांकि कई व्यक्तियों और समूहों ने सोनिया गांधी से नजदीकी के चलते तत्कालीन गृहमंत्री पी चिदंबरम के कड़े नक्सल विरोधी रुख को रोकने का अभियान चलाया था। चिदंबरम ने यह अभियान सुरक्षा बलों पर हुए कुछ बड़े हमलों के बाद शुरू करने की बात कही थी। उनमें से एक हमला छत्तीसगढ़ के चिंतलनार में हुआ था। सन 1971 के युद्ध और ऑपरेशन ब्लूस्टार के बाद एक दिन में इतनी जनहानि कभी नहीं हुई थी। जब सुरक्षा बल नक्सल पर भारी पडऩे लगे तभी मणिशंकर अय्यर ने इस नीति को एकतरफा करार दिया था। एक प्रमुख नक्सल की पत्नी को ओडिशा में अपह्त आईएएस अधिकारी के बदले रिहा किया गया और वह राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य रहे हर्ष मंदर के स्वयंसेवी संगठन की प्रमुख निकलीं। देशद्रोह के आरोप में अभियुक्त विनायक सेन को योजना आयोग की स्वास्थ्य समिति में शामिल किया गया।
 
क्या भ्रम की वह स्थिति लौट रही है? गुजरात चुनाव में करीबी मुकाबले के बाद हमने कहा था कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की भाजपा 2019 का चुनाव आर्थिक मसलों पर नहीं लड़ेगी। वे मतदाताओं के सामने हिंदुत्व, भ्रष्टाचार विरोधी कदमों और कट्टर राष्ट्रवाद का मिश्रण रखेंगे। भ्रष्टाचार के मामले में कांग्रेस लडऩे की स्थिति में ही नहीं है। भारत उन चुनिंदा लोकतांत्रिक देशों में शामिल है जिन्होंने अपना हर संभव बचाव किया है। हर उपद्रव को शांत किया गया। उनके नेता या तो दूर हो गए या मुख्यधारा की राजनीति में शामिल हो गए। यह बात कई मायनों में धुर वाम आंदोलनों के लिए भी सही है। भारत अपनी एकता और अखंडता को लेकर स्पष्ट रहा है। अपनी संप्रभुता गंवाना तो दूर, उसने इसमें कुछ जोड़ा ही है। सिक्किम विलय की घटना याद कीजिए। एक या डेढ़ मौकों को छोड़ दें तो देश की किसी सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा या राष्ट्रवाद पर नरम रुख नहीं अपनाया है। यहां तक कि कम अवधि के लिए गैर-कांग्रेस सरकारों ने भी नहीं।
 
भारतीय मतदाताओं ने आंतरिक या बाह्य राष्ट्रीय सुरक्षा पर ढीलाढाला रुख कभी स्वीकार नहीं किया। हथियारबंद नक्सल आंदोलन को दूरदराज के चंद जिलों और कुछ रूमानी वैचारिक साझेदारों के अलावा कभी समर्थन नहीं मिला। उनके प्रति नरम दिखने से आपको वोट नहीं मिलेंगे। भारत में इतना धैर्य नहीं कि वह ऐसी भ्रामक अवधारणा को स्वीकार करे जबकि जेएनयू में आपको क्रांतिकारी न होने के लिए नकारा जा सकता है। नरम हिंदुत्व-नरम राष्ट्रवाद आत्मघाती राजनीति है। अगर इसमें सुधार नहीं होता और राहुल केवल मोदी की नाकामी गिनाने के बजाय राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर खरे नहीं उतरते तब तक उनकी पार्टी 2019 का चुनाव भाजपा की शर्तों पर लड़ेगी और उसे आसानी से दूसरा कार्यकाल मिल जाएगा।
Keyword: congress, rahul gandhi, BJP, narendra modi, mansarovar,,
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