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अहम समझौता, बरकरार अनिश्चितता

संपादकीय /  September 09, 2018

भारत और अमेरिका के रक्षा और विदेश मंत्रियों के बीच बातचीत पिछले सप्ताह संपन्न हुई। यह वार्ता पिछले काफी समय से टल रही थी और कुछ लोगों को तो यह आशंका भी हो गयी थी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रशसन भारत-अमेरिका संबंधों को कम प्राथमिकता दे रहा है। इन चर्चाओं के दौरान दोनों देशों को एक साथ लाने वाली सामरिक दृष्टि के साथ-साथ तमाम नए और पुराने मुद्दों पर भी बातचीत हुई। इन वार्ताओं का सबसे बड़ा विषय रहा सुरक्षा सहयोग को लेकर समझौते पर हस्ताक्षर करने को लेकर बनी सहमति। यह समझौता उन आधारभूत समझौतों का ही एक प्रकार है जो अमेरिका ने अपने निकटस्थ सामरिक साझेदारों के साथ किया है।

 
इस समझौते को कयुनिकेशंस कंपैटिबिलिटी ऐंड सेक्युरिटी एग्रीमेंट (कॉमकासा) का नाम दिया गया है। यह समझौता एनक्रिप्टेड सुरक्षा मंचों तक साझा पहुंच बनाने की इजाजत देता है। उदाहरण के लिए इसके तहत भारतीय नौसेना क्षेत्रीय जानकारियां जुटाने के लिए पी-81 निगरानी एवं टोही विमान की पूरी क्षमताओं का इस्तेमाल कर सकेगी। ये विमान भारत ने अमेरिका से खरीदे हैं और अभी ये विमान केवल वाणिज्यिक उपलब्धता वाले उपकरणों के साथ ही काम करता है। इसके नियंत्रित संचार उपकरणों का कोई विकल्प नहीं था जो अब उपलब्ध होगा। दोनों नौसेनाओं के युद्धपोत अब अधिक सुरक्षित और प्रभावी ढंग से एक दूसरे के साथ संचार स्थापित कर सकेंगे। भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग को एक नए स्तर पर ले जाने के लिए इस समझौते पर हस्ताक्षर लंबे समय से लंबित था। इस बात का स्वागत किया जाना चाहिए कि सरकार ने उस पुराने सोच को त्याग दिया है जिसके तहत वह देश के सामरिक साझेदारों के साथ ज्ञी एनक्रिप्टेड संचार को खोलने में भयभीत रहती थी।
 
बहरहाल, इस संवाद के दौरान कुछ असहज करने वाले मुद्दे भी सामने आए। यह सच है कि हाल के दिनों में हमारे सामरिक और सैन्य रिश्ते आर्थिक रिश्तों की तुलना में गर्माहट भरे और कम उतार चढ़ाव वाले रहे हैं परंतु कुछ समस्याओं ने अप्रत्याशित रूप से सर उठाया। इनमें से दो का संबंध अमेरिकी नेतृत्त्व में रूस और ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों से है। ईरान पर लगाए गए प्रतिबंध भारत के लिए भी समस्या हैं क्योंकि भारत तेल आयात पर निर्भर है। उसे यह रास नहीं आया कि आयात होने वाले तेल में ईरान की हिस्सेदारी न हो। कुछ माह पहले विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने दोहराया था कि भारत केवल संयुक्त राष्ट्र द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों को ही मान्यता देता है। ईरान पर प्रतिबंध लगाना इसमें शामिल नहीं है। ये प्रतिबंध अमेरिका के ट्रंप प्रशासन द्वारा ईरान के साथ 2015 के नाभिकीय समझौते को एकपक्षीय ढंग से खत्म करने के बाद प्रभावी हुए हैं। संभव है कि अमेरिका भारत के ईरान से होने वाले आयात में बड़ी कटौती से संतुष्ट हो जाए। 
 
रूस से रक्षा खरीद के सवाल अधिक कठिन हैं। इसका संबंध हमारी सामरिक स्वायत्तता और रूस के साथ पुरानी रक्षा साझेदारी से है। सेना 600 करोड़ डॉलर में पांच रूसी एस-400 मिसाइल खरीदना चाहती है जो सतह से हवा में मार करती है। अगर मौजूदा अमेरिकी कानून को लागू किया जाए तो ऐसा करने पर प्रतिबंध लग सकता है। चूंकि अमेरिका में रूसी सेना और इंटेलीजेंस पर प्रतिबंध को दोनों दलों का समर्थन हासिल है इसलिए आगे की राह अनिश्चित है। फिर भी यह स्पष्ट है कि भारत के लिए अपवाद स्वरूप राह निकाल ली जाएगी। अगर ऐसा नहीं हुआ तो भारत और अमेरिका के सामरिक रिश्तों पर गहरा असर होगा। भारत को अपनी कूटनीतिक क्षमताओं का इस्तेमाल करते हुए इस समस्या से किसी तरह निपटना होगा।
Keyword: india, america, defense, iran, भारत अमेरिका,
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