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नए पाकिस्तान की कहानी मगर सोच अब भी वही पुरानी

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  September 07, 2018

वर्षों पहले बिज़नेस स्टैंडर्ड के साथ साक्षात्कार में दक्षिण एशिया के सबसे प्रतिष्ठिïत पत्रकारों में से एक मार्क टुली से पूछा गया था कि उनकी दृष्टिï में भारत और पाकिस्तान के बीच सबसे बड़ा अंतर क्या है? यह सवाल इसलिए कि लोग अक्सर भारत और पाकिस्तान की भाषायी, सांस्कृतिक और परंपरा की समानता की बातें करते हैं लेकिन इसके बावजूद दोनों देश एक दूसरे के दुश्मन बने हुए हैं। कई बार तो ऐसा लगता है कि केवल सरकारें ही नहीं दोनों देशों के समाज भी एक दूसरे के खिलाफ जंग में हैं।

 
टुली ने एक पल के लिए सोचा और फिर कहा, 'पाकिस्तान में केवल एक धर्म है।' उस वक्त तो यह एक छोटा सा निराश करने वाला उत्तर लगा था परंतु इसके बारे में सोचिए। सभी धर्मों को लेकर भारत का आदर इस व्यावहारिक आवश्यकता से जन्मा है कि सहज जीवन के लिए सबको साथ लेकर चलना होगा। इसमें महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के लोकतांत्रिक और सहिष्णु विचार भी शामिल हैं। पाकिस्तान को इसकी आवश्यकता नहीं क्योंकि उसकी 98 फीसदी आबादी मुस्लिम है। बहरहाल, हर किसी को किसी न किसी 'अन्य' की आवश्यकता होती है। हमें पता है कैसे जुल्फिकार अली भुट्टïो पाकिस्तान को इस्लाम की राह पर ले गए। जनरल जिया उल हक ने पाकिस्तानी सेना का इस्लामीकरण किया। बेनजीर भुट्टो के गृहमंत्री नसीरुल्ला खां बाबर ने तालिबान की अवधारणा तैयार की। उनके शब्दों में यह सुन्नी धार्मिक योद्धाओं की सेना थी जिसे क्वेटा से मलेशिया तक अपना आधिपत्य जमाना था। ईशनिंदा कानून तो गजब ही था। पाकिस्तान ने अपने दुश्मन खुद तैयार किए। ये थे अहमदिया और शिया अल्पसंख्यक मुस्लिम जिनके बारे में सुन्नियों का का कहना है कि वे पैगंबर को सर्वोच्च नहीं मानते। 
 
पाकिस्तानी समाज में अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर पाकिस्तान तहरीक ऐ इंसाफ (पीटीआई) का सोच साफ नहीं है। अपनी चुनावी रैली में इमरान खान कह चुके हैं कि वे पूरे यकीन से बोल सकते हैं कि अहमदिया खुद को मुस्लिम नहीं कह सकते। यह भी कहा कि वह पाकिस्तान के कानून 295-सी को पूरा संरक्षण देंगे। यही वह ईशनिंदा कानून है जिसे तोडऩे पर मौत की सजा तक हो सकती है। उनके इस बयान को पश्चिमी दुनिया और खुद पाकिस्तान में उनके प्रतिद्वंद्वियों ने खूब तवज्जो दी। उन्हें तालिबान खान के नाम से भी पुकारा गया लेकिन उनके समर्थक, जिनमे मौजूदा मानवाधिकार मंत्री शिरीन मजारी भी हैं, का कहना है कि उन्हें गलत समझा गया। हालिया घटनाओं ने इमरान खान की योजना की समझ को और जटिल बना दिया है।
 
अपनी सीमाओं को स्वीकार करते हुए खान ने एक 18 सदस्यीय आर्थिक सलाहकार परिषद बनाई है जो मौजूदा आर्थिक चुनातियों से निपटने के लिए नीतियां बनाएगी और भविष्य की चुनौतियां दूर करने में मदद करेगी। इस परिषद में कई काबिल अर्थशास्त्रियों और प्रबंधन पेशेवरों को जगह दी गई है लेकिन सबसे उल्लेखनीय नाम है डॉ. आतिफ आर मियां का। मियां एक पाकिस्तानी अमेरिकी हैं और फिलहाल प्रिंसटन विश्वविद्यालय में हैं। उन्हें अर्थशास्त्र के नोबल पुरस्कार का दावेदार माना जाता है। वह थॉमस पिकेटी, नॉरिएल रुबीनी और रघुराम राजन की श्रेणी के हैं। वर्ष 2014 में आई उनकी पुस्तक हाउस ऑफ डेट बताती है कि कैसे कर्ज ने 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट को बढ़ावा दिया और कैसे वह आज भी वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बना हुआ है। किताब को चौतरफा सराहना मिली। वह गणित और कंप्यूटर विज्ञान में स्नातक हैं। उन्होंने एमआईटी से अर्थशास्त्र में पीएचडी की है। मगर वह अहमदिया हैं।
 
यह सूची जारी होते ही पाकिस्तान का एक धड़ा उबल पड़ा। इस्लामिक राजनीतिक दल तहरीक ए लबाइक पाकिस्तान ने उनकी नियुक्ति की आलोचना की। पाकिस्तानी संसद के उच्च सदन में आतिफ मियां को परिषद में शामिल करने के खिलाफ ध्यानाकर्षण प्रस्ताव पेश किया गया। नवाज शरीफ की पार्टी पीएमएल-एन, मुत्ताहिदा मजलिस ए अमल और पख्तूनवा मिली अवामी पार्टी (इस्लामिक कट्टरपंथी दल) ने इस पर हस्ताक्षर किए। अदालत में याचिका दायर की गई जिसमें इमरान खान तथा सरकार के अन्य लोगों को पक्ष बनाया गया है। पहले पीटीआई की प्रतिक्रिया अप्रत्याशित रही। सूचना मंत्री फवाद चौधरी ने कहा कि क्या पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर प्रतिबंध लगाए जाने चाहिए? क्या उन्हें बाहर फेंक देना चाहिए? उन्होंने कहा कि ऐसी बाते कहने वाले लोग आखिर हैं कौन? उन्होंने कहा कि मियां वह व्यक्ति हैं जो नोबेल पा सकते हैं। उन्हें आर्थिक परामर्श परिषद में रखा गया है, किसी इस्लामिक विचारधारा की परिषद में नहीं। 
 
उन्होंने जोर देकर कहा कि उन्हें नहीं लगता कि किसी को इस पर आपत्ति होनी चाहिए और जिन्हें आपत्ति है, वे चरमपंथी हैं, हम उनके आगे नहीं झुकेंगे। चौधरी ने कहा कि अल्पसंख्यकों की रक्षा करना हमारी जवाबदेही है। यह केवल सरकार नहीं बल्कि हर मुस्लिम का धार्मिक कर्तव्य है कि वह अल्पसंख्यकों की रक्षा और उनका सम्मान करे। सेना ने कुछ नहीं कहा। लेकिन कुछ ही घंटे के भीतर सरकार ने आतिफ मियां से परिषद में अपना पद छोडऩे को कहा। मियां का दर्द उस ब्लॉग में दर्ज है जो उन्होंने 2014 में पेशावर में स्कूल पर हुए तालिबानी हमले के बाद लिखा था। उस हमले में 140 बच्चे मारे गए थे। उन्होंने लिखा था कि तालिबान शरिया लागू करना चाहता है। हम कभी नहीं जान सकते कि उसका अर्थ क्या है। उसका वही अर्थ होगा जो तालिबान चाहे। बच्चों की जान लेेना विधि मान्य हो सकता है, अगर ईश्वर और तालिबान ऐसा तय करें। हमें समर्पण करना होगा वरना अगली गरदन हमारी होगी। पश्चिमी दुनिया में मनुष्य और ईश्वर के बीच की रेखा लांघने के लिए फासीवाद शब्द है। ऐसा करने वालों को फासीवादी कहा जाता है। परंतु पाकिस्तान में हम उन्हें मौलाना, अल्लामा और यहां तक कि जनरल और प्रधानमंत्री के नाम से भी जानते हैं। मियां सही हैं। नये पाकिस्तान में शायद ही कुछ नया है।
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