बिजनेस स्टैंडर्ड - खपत नहीं घटेगी तो अर्थव्यवस्था रूठेगी
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खपत नहीं घटेगी तो अर्थव्यवस्था रूठेगी

नीलकंठ मिश्रा /  September 07, 2018

भुगतान संतुलन के घाटे को कम करने के लिए व्यय कम करने और ब्याज बढ़ाने जैसी कवायद से जीडीपी वृद्धि दर पर असर पड़ सकता है। कैसे, विस्तार से जानकारी दे रहे हैं नीलकंठ मिश्रा

 
एक ऐसे घर की कल्पना कीजिए जो रोज 100 रुपये खर्च करता हो लेकिन उसकी रोज की कमाई केवल 80 रुपये हो, वह 20 रुपये के अंतर की भरपाई पैसे उधार लेकर या परिसंपत्तियों की बिक्री करके करता हो। अगर किसी वजह से उसकी खपत बढ़कर 110 रुपये हो जाए लेकिन आय में कोई बदलाव न हो तो? जाहिर है, वह 10 रुपये की अतिरिक्त फंडिंग नहीं जुटाएगा तो उसका व्यय अस्थायित्व भरा होगा। देश के मौजूदा भुगतान संतुलन घाटे की समस्या को इस उदाहरण से समझा जा सकता है। हमारी खपत उत्पादन से ज्यादा है। चालू खाते का घाटा अब विदेशी पूंजी की आवक के स्तर से अधिक है।
 
क्रेडिट सुइस ने हाल में अनुमान जताया है कि यह घाटा करीब 2,000 करोड़ डॉलर है। परंतु अगर जून और जुलाई माह के व्यापार घाटे को शामिल किया जाए तो यह आंकड़ा दोगुना होकर 4,000 करोड़ डॉलर तक पहुंच सकता है। व्यय, उत्पादन और पूंजीगत आवक की बात करें तो केवल व्यय ही एक ऐसा क्षेत्र है जहां नीति निर्माता नियंत्रण कायम कर सकते हैं। निर्यात बढ़ाने और पूंजीगत आवक में इजाफा करने के कदम मध्यम से दीर्घावधि के बीच ही कारगर साबित हो सकते हैं।
 
प्रश्न यह है कि खपत में कमी कैसे लाई जाए? इसका कोई सर्वमान्य हल नहीं है। हां, मिलेजुले उपायों की मदद से इससे निपटा जा सकता है। बीते वर्ष के दौरान व्यापार घाटे में हुए दो तिहाई से अधिक के इजाफे के लिए काफी हद तक कच्चे तेल की कीमतों में हुआ इजाफा उत्तरदायी है लेकिन अगर तेल आयात में कटौती करके आयात में 2,000 करोड़ डॉलर की कमी का लक्ष्य हासिल करना हो तो तेल कीमतों में कम से कम 15 फीसदी की गिरावट की जरूरत होगी। इसके ढेरों दूसरे नुकसान भी होंगे।
 
कहना न होगा कि यह सरकार के लिए राजनीतिक दृष्टि से जोखिम भरा होगा। एक अन्य विकल्प है, ऊंची ब्याज दर या सरकारी व्यय की गति धीमी करके समेकित मांग को धीमा करना। इससे व्यापक तौर पर कोई परेशानी नहीं होगी क्योंकि किसी एक क्षेत्र पर इसका बोझ नहीं पड़ता। परंतु इसमें उन क्षेत्रों के कारोबार में भी धीमापन आने की आशंका रहती है जिनका चालू खाते की बढ़ोतरी में कोई योगदान नहीं होता। इन दो अतिवादी धाराओं के बीच का एक और रास्ता है और वह है कमजोर रुपया। रुपये के कमजोर होने से कष्ट आयात के सभी क्षेत्रों में बंट जाता है। अगर ऐसा होता है तो प्रत्येक क्षेत्र में 4 फीसदी तक की गिरावट आएगी। मुद्रा के कमजोर होने पर आयातित वस्तुओं की स्थानीय कीमतें जल्दी बढ़ती हैं। कीमत ज्यादा होने पर मांग में कमी आती है।
 
रुपये की कमजोरी के कारण सोना, रत्न, कोयला, धातु, अधिकांश उर्वरक और कृषि जिंस के क्षेत्र में आयात होने वाली वस्तुओं की कीमत रुपये में बढ़ेगी। जिन श्रेणियों में बहुत अधिक आयात होता है, उनमें यूरिया और पुराने मोबाइल फोन मॉडल की कीमतों में बढ़ोतरी नहीं हुई है। सबसे अहम श्रेणी यानी कच्चे तेल में एक तिहाई मांग प्लास्टिक और औद्योगिक ईंधन क्षेत्र से आती है। इनकी कीमतों में इजाफा लाजिमी है। शेष दो-तिहाई में डीजल, पेट्रोल, एलपीजी और केरोसिन आते हैं। सरकार ने कमजोर रुपये का असर ईंधन की खुदरा कीमतों पर पडऩे देकर सही किया। 
 
रुपये में लगातार कमजोरी व्याप्त है। ऐसे में अब दूसरे स्तर के प्रभाव नजर आने लगे हैं। कंपनियों ने कीमतों में बढ़ोतरी शुरू कर दी है ताकि बढ़ी हुई लागत से निजात पाई जा सके। कार निर्माता, मोटरसाइकिल निर्माता, वातानुकूलक बनाने वाले, टेलीविजन निर्माता, साबुन और डिटर्जेंट बनाने वाले, इन सभी ने कीमतों में इजाफा कर दिया है।
 
बीते डेढ़ दशक के दौरान तमाम व्यय श्रेणियों में आकार और मूल्य वृद्धि का अध्ययन करने पर हमें पता चला कि कीमतों में एक फीसदी की बढ़ोतरी से कारोबार के आकार में एक फीसदी की कमी आती है। गत वर्ष नवंबर में जीएसटी दरों में कटौती के बाद कारोबार आकार में हुई वृद्धि के लिए कुछ हद तक कमजोर कीमतें उत्तरदायी हैं। इस आधार पर कहें तो रुपये की कमजोरी से बढ़ी कीमतें मांग को कमजोर करेंगी।
 
मांग में कमी आने से आयात में कमी आएगी और भुगतान संतुलन की स्थिति ठीक होगी। मुद्रा में कमजोरी आने के बाद भी घरेलू विनिर्माण की प्रतिस्पर्धा की स्थिति में सुधार हुआ है लेकिन बहुत अधिक प्रतिस्थापन देखने को नहीं मिला है। देश के आयात का काफी हिस्सा उपलब्धता, निर्माण क्षमता आदि की कमी के कारण है। इनका कोई स्थानापन्न नहीं हो सकता। कम से कम निकट भविष्य में तो बिल्कुल नहीं।
 
देश का निर्यात मूल्यवर्धन भी कृषि, वस्त्र और चमड़ा आदि श्रेणियों से आता है जहां वैश्विक मांग तेजी से नहीं बढ़ रही है। मुद्रा की कमजोरी केवल बाजार हिस्सेदारी सुधारने में मदद कर सकती है जिसमें आमतौर पर समय लगता है। यहां दो अहम बातें हैं। पहली तो यह कि मांग में कमी के बावजूद भुगतान संतुलन के अंतर में 2,000 करोड़ डॉलर की कमी आने में कुछ तिमाहियों का वक्त लग सकता है। दूसरी बात यह कि इस समायोजन का असर देश की आर्थिक वृद्धि पर भी निश्चित तौर पर पड़ेगा।
 
सैद्धांतिक तौर पर तो खपत में कमी और आयात में कमी की बराबरी की स्थिति में देश का घरेलू उत्पाद समान बना रहना चाहिए। बहरहाल मांग की कमी को केवल आयातित उत्पादों तक सीमित रखना कठिन है। मांग को केवल इन उत्पादों की ओर लक्षित नहीं रखा जा सकता है। एक वजह यह भी है कि अधिकांश अंतिम खपत वाली वस्तुएं आयातित और स्थानीय वस्तुओं का मिश्रण होती हैं। टूथपेस्ट को ही लें तो इसमें प्लास्टिक की जरूरत होती है जो आयातित कच्चा माल है। ऐसे में अगर कीमत अधिक होने से टूथपेस्ट की मांग में कमी आएगी तो स्थानीय उत्पाद की मांग भी घटेगी।
 
जून तिमाही में जीडीपी की सालाना आधार पर वृद्धि 8.2 फीसदी पर रही। थोड़े पुराने आंकड़ों को ध्यान में रखें तो कहा जा सकता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था उसी गति से विकसित हो रही है जिस गति से यह बीते 25 वर्षों में औसतन बढ़ी है। परंतु भुगतान संतुलन घाटे की स्थिति चिंतित करने वाली है। यह बताती है कि अब यह वृद्धि भी स्थायी नहीं रही और अर्थव्यवस्था को धीमेपन की आवश्यकता है। ऐसे में कुछ ढांचागत बदलाव जरूरी हो सकते हैं।
Keyword: economy, CAD, चालू खाते का घाटा,
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