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वाल स्ट्रीट का राज

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  September 07, 2018

वर्ष 2008 के वित्तीय संकट की शुरुआत कब हुई? अधिकतर का जवाब होगा - 15 सितंबर 2008 को लीमन ब्रदर्स के पतन के साथ। परंतु यूरोप के लोग इसकी शुरुआत अगस्त 2007 से मानते हैं, जब बीएनपी पारिबा ने अपने तीन निवेश फंड फ्रीज कर दिए थे यानी निवेशक उसमें से राशि नहीं निकाल सकते थे। इसके कारण महीने भर बाद ही ब्रिटेन के चौथे बड़े बैंक नॉर्दर्न रॉक का पतन हो गया। यूरोप इस संकट के लिए अमेरिका को जिम्मेदार ठहराता है। इटली के तत्कालीन वित्त मंत्री ने कहा था कि उनका देश बचा हुआ है क्योंकि 'वहां अंग्रेजी नहीं बोली जाती।' 

 
अब एडम तूज (ब्रिटिश इतिहासकार और कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर) का कहना है कि 2008 में अमेरिका में जारी वित्तीय प्रतिभूतियों में दो तिहाई के लिए यूरोपीय संस्थान उत्तरदायी थे। वह कहते हैं कि कई यूरोपीय देशों के अचल संपत्ति बाजारों में अमेरिका से भी ज्यादा दिक्कत थी। मामला खुला तो यूरोपीय बैंकों को डॉलर की जरूरत पड़ी। तब अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने उन्हें उबारा। संकट को लेकर जो आम धारणा है वह माइकल लेविस की दो पुस्तकों द बिग शॉर्ट और बूमरैंग से निकलती है। वह वॉल स्ट्रीट की आत्मघाती भेड़चाल प्रवृत्ति तथा अन्य खामियों को रेखांकित करते हैं। वह कहते हैं कि गोल्डमैन सैक्स ने बहीखातों में हेरफेर में ग्रीस सरकार की मदद की और 30 करोड़ डॉलर का शुल्क लिया। 
 
क्या बैंकर नियामकों से अधिक जवाबदेह थे? संकट के करीब दो दशक पहले अर्थशास्त्री हाइमन मिंस्की ने स्टैबलाइजिंग एन अनस्टेबल इकनॉमी  में कहा था कि वित्तीय तंत्र अनियमित बाजारों में परिसंपत्ति मूल्य में अप्रत्याशित वृद्धि कर देता है। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन और उनके वित्त मंत्री लैरी समर्स ने इस पर ध्यान नहीं दिया और सन 1999 में ग्लास-स्टेगल एक्ट के अहम प्रावधान हटा दिए। इससे वाणिज्यिक और निवेश बैंकिंग के बीच की दीवार हट गई और बैंक जोखिम उठाने को प्रोत्साहित हुए। यह जोखिम 2008 के संकट की तरफ ले आया। नीति निर्माण और आर्थिक विचार प्रक्रिया पर वॉल स्ट्रीट का प्रभाव पड़ चुका था। सन 2010 में फॉल्ट लाइंस लिखने वाले रघुराम राजन ने व्यापक राजनीतिक आर्थिक नजरिया अपनाया और उस कारक को रेखांकित किया जिसे कई लोग ट्रंप के उदय की वजह मानते हैं: अमेरिका में बढ़ती असमानता। राजनीतिक तंत्र ने जवाब में ऋण सस्ता कर दिया ताकि खपत और परिंसंपत्ति स्वामित्व को बढ़ावा मिले। इससे सबप्राइम हाउसिंग संकट पैदा हुआ। 2001 में विश्व व्यापार संगठन का सदस्य बनते ही चीन ने पश्चिमी बाजारों को सस्ते माल से पाट दिया। इससे मुद्रास्फीति कम हुई। नीति निर्माताओं ने इसके लिए अपनी पीठ थपथपाई। ब्याज दरें कई दशक के निचले स्तर पर आ गईं। वित्तीय कारोबारी बढ़ी नकदी के साथ बेहतर प्रतिफल तलाशने लगे और जोखिम बढऩे लगा। वे ऐसे दांव खेलने लगे जिनकी उनको समझ ही नहीं थी। संकट से एक वर्ष पहले सालमन ब्रदर्स के पूर्व जोखिम प्रमुख ने एक किताब लिखी कि कैसे फर्म में किसी को नई वित्तीय योजनाओं के जोखिम के बारे मे कुछ पता ही नहीं। वाईवी रेड्डी भी आसन्न संकट को भांप गए थे। बतौर आरबीआई गवर्नर उन्होंने लगातार जोखिम के गलत आकलन को लेकर चेतावनी दी थी। वॉल स्ट्रीट अनसुनी करता रहा।
 
क्या संकट से बचा जा सकता था? लीमन ब्रदर्स के पूर्व प्रशासनिक प्रमुख स्कॉट फ्रायम ने इस सप्ताह फाइनैंशियल टाइम्स में बताया कि जून 2008 से ही उनकी फर्म खुद को बैंक होल्डिंग कंपनी में तब्दील करने की इजाजत मांग कर रही थी। न्यूयॉर्क फेडरल रिजर्व के तत्कालीन प्रमुख टिम गाइटनर ने इजाजत नहीं दी क्योंकि उनके मुताबिक इससे गलत संदेश जाता। लीमन के दिवालिया आवेदन के एक सप्ताह बाद गोल्डमैन सैक्स और मोर्गन स्टेनली को बैंक होल्डिंग कंपनी बनने की इजाजत दे दी गई। अगर लीमन को भी इजाजत मिल जाती तो शायद संकट टल सकता था। षड्यंत्र के सिद्घांत को मानने वाले कह सकते हैं कि वॉल स्ट्रीट की बड़ी कंपनियां छोटी कंपनियों को खत्म करना चाहती थीं ताकि ताकि वे राज कर सकें। 
 
सवाल यह भी है कि 2008 के लिए किसी बैंकर पर मुकदमा क्यों नहीं चला जबकि 1980 के दशक में अमेरिकी बचत और ऋण घोटाले के बाद सैकड़ों बैंकरों को जेल भेजा गया था। जवाब आसान है: दिसंबर 2008 में अमेरिकी न्याय विभाग ने नए दिशानिर्देश जारी किए थे, जो 1999 के पिछले दिशानिर्देश पर आधारित थे। इसके तहत कारोबारी अपराधों को लेकर नरमी बरतने की बात कही गई थी।
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