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अन्य बाजार की कमजोरी में भारत के लिए अवसर

आकाश प्रकाश /  September 06, 2018

उभरते बाजारों के शेयरों में लगातार गिरावट के कारण पूंजी का रुख भारत की ओर होगा क्योंकि वैश्विक निवेशकों के लिए जगह चाहिए। विस्तार से बता रहे हैं आकाश प्रकाश 

 
अमेरिकी शेयर बाजार इस समय रिकॉर्ड तेजी के दौर से गुजर रहे हैं। हाल ही में उन्होंने सन 1990 से 2000 के बीच के 3,452 दिन की तेजी के रिकॉर्ड को तोड़ा है। यानी वहां शेयर कीमतें इससे अधिक दिनों से लगातार बढ़ रही हैं। किसी क्षेत्र में 20 फीसदी तक की गिरावट भी देखने को नहीं मिली है। बाजार में आगे भी गिरावट आने का भी कोई खतरा नहीं है। अमेरिकी शेयर बाजारों में सुधार का यह सिलसिला वित्तीय संकट के बाद से ही चालू है। वर्ष 2013 से ही उनका प्रदर्शन अन्य क्षेत्रों से एकदम परे है। थोड़े से संदर्भों की बात करें तो अगर सभी शेयर बाजारों को 100 पर पुनर्निर्धारित किया जाए तो आज अमेरिकी बाजार करीब 450 पर हैं जबकि अन्य क्षेत्र मसलन उभरते बाजार, यूरोपीय संघ, जापान और ब्रिटेन 200 से 225 के बीच अंक पाएंगे। लार्ज कैप सूचकांक पर नजर डाली जाए या मिड कैप अथवा स्मॉल कैप सूचकांकों पर, आंकड़े कमोबेश ऐसे ही हैं। अमेरिका का यह प्रदर्शन केवल फेसबुक, एमेजॉन, ऐपल, नेटफ्लिक्स और गूगल की मातृ कंपनी अल्फाबेट के शेयरों की बदौलत या तकनीकी कंपनियों की बदौलत नहीं है। यह कहीं अधिक व्यापक है। 
 
बाजार काफी मजबूत भी रहे हैं। व्यापारिक युद्घ और शुल्क दरों को लेकर विवाद के बीच भी उन पर कोई असर नहीं हुआ है। वे ट्रंप प्रशासन की राजनीतिक कठिनाई से अप्रभावित रहे हैं और अमेरिका में सख्त वित्तीय हालात ने भी उन्हें परेशानी में नहीं डाला।  अमेरिका बाजारों में इतनी स्थिरता कैसे है? इसके अलावा वर्ष 2018 में प्रदर्शन के स्तर पर अंतर को देखें तो क्या अब वक्त आ गया है कि अमेरिकी शेयरों से परे जाकर उभरते बाजारों की ओर रुख किया जाए? अमेरिकी बाजारों की मजबूती की सबसे अच्छी व्याख्या यह है कि अमेरिकी बाजार मजबूत आधार पर काम कर रहे हैं। राजनीतिक जोखिम पर 25 फीसदी से अधिक की आय वृद्घि भारी है। राजस्व में तेजी आ रही है और भविष्य को लेकर लगातार मजबूत निर्देश मिल रहे हैं। 
 
अमेरिकी बाजारों को पुनर्खरीद से भी गति मिल रही है। वित्त वर्ष 2018 की दूसरी तिमाही में अमेरिकी कंपनियों ने 43,300 करोड़ डॉलर के शेयरों की पुनर्खरीद की। यह इससे पिछली तिमाही के 242,000 करोड़ डॉलर के शेयरों से करीब दोगुना था। यहां आप देख सकते हैं कि कर कटौती का पूरा लाभ कहां जा रहा है।  निजी इक्विटी और विलय और अधिग्रहण की गतिविधियों का बढ़ा हुआ स्तर भी अमेरिका में सूचीबद्घ कंपनियों की तादाद कम कर रहा है। सन 1996 में अमेरिका में 8,090 सूचीबद्घ कंपनियां थीं। अब उनकी तादाद घटकर 4,300 रह गई है। संभावित क्षेत्र कम होने से पूंजी बचे हुए शेयरों में निवेश की जा रही है। निवेशक फिलहाल बताई गई आय और कॉर्पोरेट मुनाफे को लेकर राष्ट्रीय आय के आंकड़ों के अंतर की अनदेखी कर रहे हैं। अभी यह आय का अपेक्षाकृत खामोश दायरा दिखा रही है।
 
बाजार की स्थिरता की वैकल्पिक व्याख्या यह है कि अमेरिकी राजनीतिक अस्थिरता राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप का ध्यान हटेगा और वे व्यापार और आव्रजन को लेकर अधिक कड़े उपाय अपनाने से परहेज करेंगे। उन्होंने विनियमन और कर कटौती के मोर्चे पर अच्छा प्रदर्शन किया है। अमेरिकी व्यापार घाटे को लेकर भी उनका प्रदर्शन ठीकठाक है। संरक्षणवादी रुझान में आ रही कमी को भी इसका उदाहरण माना जा सकता है। इस बीच विनियमन पर उनका ध्यान लगातार केंद्रित है। राजनीतिक जोखिम बढऩे के साथ ट्रंप इस दिशा में और आगे बढ़ सकते हैं। 
 
जहां तक रुझान के उभरते बाजार की ओर होने की बात है तो इस बारे में दलील एकदम स्पष्ट है। उभरते बाजार की परिसंपत्तियां मंदी के बाजार में हैं और मूल्यांकन अमेरिका की तुलना में नाटकीय रूप से कम है। उभरते बाजार के शेयरों पर डॉलर की मूल्य वृद्घि ने असर डाला है। नकदी की कमी, व्यापारिक तनाव आदि ने भी उन पर असर डाला है। तेजडिय़ों की दलील है कि आर्थिक इतिहास बताता है कि संरक्षणवाद सीमाओं को प्रतिबंधित करके देश को नुकसान पहुंचाता है। अमेरिका में रोजगार की कोई कमी नहीं है, वह मुद्रास्फीति का लक्ष्य हासिल कर चुका है, वहां काफी प्रोत्साहन है। उसके लिए चीन के आयात का स्थानापन्न तलाशना भी आसान नहीं होगा। अगर चीनी वस्तुओं से दूरी बनानी पड़ी तो भी अधिकांश वस्तुओं का वैकल्पिक स्रोत अन्य उभरते देश होंगे। अमेरिका इन वस्तुओं का आयात करना नहीं रोक सकता। अमेरिका में इनके निर्माण की क्षमता ही नहीं है। व्यापारिक युद्घ उभरते बाजारों को उतना नुकसान नहीं पहुंचाएंगे जितनी की आशंका जताई जा रही है। 
 
संक्रामक जोखिम की बात करें तो उभरते बाजारों के शेयर बाजार भी अभी बहुत मजबूत स्थिति में हैं। चार सबसे बड़े उभरते बाजार हैं चीन, दक्षिण कोरिया, ताइवान और भारत। ये बाजार सन 1990 के दशक से काफी अलग हैं। उस वक्त ब्राजील, मैक्सिको, दक्षिण कोरिया और दक्षिण अफ्रीका सबसे बड़े बाजार थे। उन सभी में भारी भरकम बाहरी असंतुलन था। आज एमससीआई के ईएम सूचकांक में 75 फीसदी एशिया है जबकि 1990 के दशक में केवल 37 फीसदी हिस्ेसदारी एशिया की थी। एशिया में वृद्घि की स्थिरता और आर्थिक प्रबंधन भी उन देशों से कहीं अधिक बेहतर है।
 
अगर आपको यकीन हो कि अमेरिका में मौजूदा तेजी अभी बरकरार रहेगी तो उभरते बाजार के शेयरों के जरिए पलटाव की बात समझ में आती है। बहरहाल, अगर आपको लगता है कि यह अमेरिकी तेजी का अंतिम दौर है तो सतर्कता जरूरी है। उस स्थिति में नकदी पर दाव लगाना सबसे बेहतर होगा।  भारत को इस समय उभरते बाजारों में सुरक्षित ठिकाना माना जा रहा है। हम बड़े निर्यातक नहीं हैं न ही हमारे ऋण बाजार में बड़ा विदेशी स्वामित्व है। हमें घटती जिंस कीमतों का लाभ मिलता है और रुपये का अधिमूल्यन काफी हद तक सुधर चुका है। उभरते बाजारों में शेयरों की कमजोरी बरकरार रही तो पूंजी भारत में आएगी क्योंकि वैश्विक निवेशकों को वैश्विक उथलपुथल से बचाव चाहिए। अगर कुछ और महीने तक भारत का असाधारण प्रदर्शन जारी रहा तो करीब दो वर्ष बाद विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक खरीदार बन जाएंगे और 1,000 करोड़ डॉलर तक की बिकवाली देखने को मिल सकती है। मुझे कहने में हिचकिचाहट हो रही है लेकिन भारत का अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन अभी कुछ वक्त जारी रहेगा। तब तक अन्य उभरते बाजार दबाव में रहेंगे। 
 
(लेखक अमांसा कैपिटल के साथ काम करते हैं। लेख में प्रस्तुत विचार उनके निजी हैं।) 
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