बिजनेस स्टैंडर्ड - वस्तु एवं सेवा शुल्क उपकर उपहार से कम नहीं
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वस्तु एवं सेवा शुल्क उपकर उपहार से कम नहीं

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  September 05, 2018

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 23 अगस्त को फिर से वित्त मंत्रालय का कामकाज संभाल लिया। बड़े ऑपरेशन के कारण वह तीन महीने तक नॉर्थ ब्लॉक के कामकाज से दूर रहे। किसी सरकार के कार्यकाल में तीन महीने का समय भले ही मामूली अवधि हो लेकिन जेटली के लिए यह लंबा समय लगता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था के व्यापक आर्थिक सिद्घांतों में उल्लेखनीय बदलाव आए हैं। इनसे नई चुनौतियां और कुछ नए अवसर भी उभरे हैं। अप्रैल के अंत में तेल की कीमतें (भारतीय बास्केट) प्रति बैरल 70 डॉलर के आसपास थीं। आज इसमें छह फीसदी उछाल आ चुकी है और यह 74 डॉलर प्रति बैरल के आसपास है। पिछले तीन महीने में भारतीय रुपये की विनिमय दर में चार फीसदी से अधिक की कमी आई है। मई में रुपया डॉलर के मुकाबले 68 के स्तर पर था और अब 71 पर पहुंच चुका है। 

 
मई तक निर्यात में तेजी आनी शुरू हो गई थी। निर्यात लगातार बढ़ रहा है लेकिन अब आयात भी तेजी से बढऩे लगा है जिसके कारण जुलाई में व्यापार घाटा पांच साल के रिकॉर्ड स्तर 18 अरब डॉलर तक पहुंच गया था। कुछ आकलनों के मुताबिक इस साल चालू खाते का घाटा तीन फीसदी के स्तर तक पहुंच सकता है। वर्ष 2017-18 में यह सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 1.9 फीसदी रहा था। ये सभी क्षेत्र जेटली के समक्ष नीतिगत मुश्किलें पैदा करेंगे। उन पर डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरावट को थामने और आयात शुल्क बढ़ाने का दबाव होगा। अगर वह इस तरह के दबाव के आगे झुकते हैं तो इसके प्रतिकूल परिणाम होंगे जो अर्थव्यवस्था के लिए और बड़ी मुश्किलें पैदा करेंगे। न तो मजबूत रुपया और न ही संरक्षणवादी उपाय भारतीय निर्यात को पटरी पर ला सकते हैं अथवा भुगतान संतुलन को दुरुस्त कर सकते हैं। बाद में निर्यात की जाने वाली आयातित वस्तुओं के मूल्य संवद्र्धन से घरेलू विनिर्माण को होने वाले संभावित नुकसान को ध्यान में रखते हुए सरकार को आयात शुल्क बढ़ाने के प्रलोभन से बचना चाहिए। रुपये की गिरावट से निर्यात में मदद मिलेगी लेकिन जेटली को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि बाजार में अस्थिरता की स्थिति पैदा किए बिना इसका इंतजान किया जाना चाहिए और साथ ही देश में निर्यात के बुनियादी ढांचे को सुधारने के लिए पर्याप्त उपाय किए जाने चाहिए। 
 
तेल के मोर्चे पर जेटली के पास और भी सीमित विकल्प होंगे क्योंकि ईरान से आपूर्ति बाधित होने से अनिश्चितता और गहरा रही है। यह चुनावी वर्ष है। कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से सरकार पर उर्वरकों और पेट्रोलियम पदार्थों की सब्सिडी का बोझ बढ़ सकता है। अगर चुनावी मजबूरी के कारण इन उत्पादों की खुदरा कीमत नहीं बढऩे दी गई तो सरकार का राजकोषीय घाटा बढ़ सकता है। इस साल के अंत में चार अहम राज्यों में चुनाव होने हैं और फिर अगले साल आम चुनाव होंगे। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के प्रभाव को कम करने के लिए वित्त मंत्री पर पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में कटौती करने का भी दबाव होगा। प्रति लीटर पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में एक रुपये की कमी से सरकार के राजस्व में कम से कम 260 अरब रुपये की कमी आएगी। जेटली ने राजकोषीय घाटे को जीडीपी का 3.3 फीसदी रखने का लक्ष्य रखा है लेकिन उत्पाद शुल्क में कटौती से इन लक्ष्य को हासिल करना मुश्किल हो जाएगा। 
 
विनिवेश से होने वाली कमाई तथा लाभांश और मुनाफे से आने वाला गैर कर राजस्व भी इसी तरह की चुनौतियां पेश करेंगे। जुलाई के अंत तक सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में अपनी हिस्सेदारी के विनिवेश से केवल 92 अरब रुपये ही जुटा सकी जबकि इसके लिए सालाना लक्ष्य 800 अरब रुपये निर्धारित किया गया है। एयर इंडिया के निजीकरण की योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है, इसलिए सरकार के लिए यह लक्ष्य हासिल करना मुश्किल है। सार्वजनिक क्षेत्र के कई उपक्रमों का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा है और यहां तक कि भारतीय इस्पात प्राधिकरण लिमिटेड (सेल) ने भी इस वर्ष कोई लाभांश नहीं देने की घोषणा की है। ऐसी स्थिति में लाभांश और मुनाफे से 1.07 लाख करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य हासिल करना भी मुश्किल लग रहा है।
 
राजकोषीय समेकन के मोर्चे पर सरकार को अच्छी खबर केवल वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) व्यवस्था से ही मिली है। इसका कारण जीएसटी संग्रह नहीं है जिसकी विकास दर अब भी कमजोर है। जेटली को राजस्व लक्ष्य हासिल करने में जीएसटी क्यों मददगार होगा, इसका कारण जीएसटी मुआवजा उपकर से संबंधित कानून में किया गया एक संशोधन है। पिछले महीने की शुरुआत में सरकार ने जीएसटी मुआवजा उपकर से संबंधित विशेष कानून में संशोधन किया था। इससे सरकार को अधिशेष संग्रह को भारत की समेकित निधि में रखने और राज्यों के साथ 50:50 के अनुपात में साझा करने के बाद मौजूदा वर्ष में ही इसके इस्तेमाल की अनुमति मिल गई। पहले यह प्रावधान था कि मुआवजा उपकर अधिशेष को सरकारी खाते में रखा जाना चाहिए और 2022 से पहले इसका इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। दूसरे शब्दों में कहें तो सरकार और राज्य 2022 तक इंतजार करने के बजाय अब उपकर अधिशेष का इस्तेमाल 2018-19 में ही कर सकते हैं। 
 
यह जेटली के लिए किसी तोहफे से कम नहीं है। जीएसटी के जुलाई 2017 से मई 2018 तक के आंकड़ों के मुताबिक करीब 40 फीसदी उपकर अधिशेष है। जुलाई 2017 से मार्च 2019 तक कुल 1.51 लाख करोड़ जीएसटी मुआवजा उपकर संग्रहीत होने का अनुमान है। इस तरह केंद्र और राज्य इस वित्त वर्ष के दौरान करीब 600 अरब रुपये अधिशेष साझा कर सकेंगे। दूसरे शब्दों में कहें तो जेटली के पास जीएसटी संग्रह में कमी की चिंता करने के बजाय 300 अरब रुपये की गुंजाइश होगी।
Keyword: arun jaitley, GST, GDP, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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