बिजनेस स्टैंडर्ड - भारी भेदभाव
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भारी भेदभाव

संपादकीय /  September 05, 2018

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) द्वारा देश की पूंजी की राउंड ट्रिपिंग (किसी कंपनी द्वारा अपनी संपत्ति दूसरी कंपनी को बेचना और लगभग उसी दर पर उसे वापस खरीदना) को रोकने के लक्ष्य के खिलाफ शायद ही कोई होगा। परंतु उसके 10 अप्रैल के परिपत्र को लेकर घबराहट का माहौल है। यह परिपत्र लाभकारी स्वामित्व से संबंधित है। दरअसल अत्यंत खराब ढंग से तैयार किया गया यह परिपत्र विदेशों में रहने वाले भारतीय मूल के तमाम लोगों के साथ भेदभाव करने वाला प्रतीत होता है। परिपत्र प्रवासियों, अनिवासी भारतीयों, विदेशी भारतीय नागरिकों और भारतीय मूल के विदेशी नागरिकों के विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) के जरिये भारत में निवेश को पूरी तरह प्रतिबंधित करने की बात करता है। इतना ही नहीं धनशोधन निरोधक अधिनियम के अधीन 'लाभकारी स्वामित्व' की व्यापक परिभाषा को देखते हुए यह भारतीय मूल के लोगों को भारतीय बाजार में संचालित एफपीआई फंड के प्रबंधन से भी रोक सकता है। 

 
निवेशकों का समूह सोमवार को अपनी समस्याओं को लेकर सामने आया। उसके मुताबिक इस परिस्थिति में देश के शेयर बाजार में निवेश की गई 7,500 करोड़ डॉलर मूल्य की प्रबंधन अधीन परिसंपत्ति बाहर चली जाएगी। यह बात स्पष्ट है कि परिपत्र गलत है और इससे जुड़े विषयों पर विस्तार से विचार-विमर्श नहीं किया गया है। प्रवासी भारतीय हमेशा सबसे प्रतिबद्घ विदेशी निवेशकों में रहे हैं और देश के शेयर बाजार में निवेश की गई 42,500 करोड़ रुपये की एफपीआई परिसंपत्तियों में उनकी महत्त्वपूर्ण हिस्सेदारी है। निवेश के अलावा भारतीय मूल के कई वरिष्ठ प्रबंधक भारत में संचालित एफपीआई के लिए काम कर रहे हैं। इसमें चकित करने वाली कोई बात नहीं है। सांस्कृतिक और पारिवारिक संबंधों के चलते प्रवासी समुदाय का भारत से विशेष लगाव है। अन्य उभरते बाजारों में भी प्रवासी निवेशकों का प्रतिबद्घ निवेशक होना आम बात है। चीन के निवेश का बड़ा हिस्सा विदेश में रहने वाले चीनी समुदाय से आता है। वहां भी कई परिसंपत्ति प्रबंधक चीनी मूल के हैं। 
 
एक बार 31 दिसंबर की तय सीमा करीब आने पर अनिवासी भारतीयों, विदेशों में रहने वाले भारतीयों और भारतीय मूल के विदेशियों को अत्यंत जटिल तरीके से अपने काम को पुनर्गठित करना होगा। अन्य देशों के साथ कर को लेकर इसके गंभीर निहितार्थ हो सकते हैं।  यह प्रवासी समुदाय के लोगों के लिए असहज और परेशान करने वाला होगा क्योंकि वे बीते कई वर्षों से देश में निवेश करते आ रहे हैं। एक और संभावना यह है कि ऐसे तमाम लोग देश में अपना निवेश बरकरार रखने के लिए अपना विशेष दर्जा त्याग दें और दूसरे देश के सामान्य नागरिक बन जाएं। दोनों में से कोई बात वांछित नहीं लगती। भारतीय मूल के परिसंपत्ति प्रबंधकों को भारत केंद्रित फंड से हटाया भी जा सकता है। इस आधार पर यह परिपत्र एक हद तक नस्ली प्रतीत हो रहा है। इससे ऐसा लग रहा है मानो पूरा का पूरा प्रवासी समाज धनशोधन और राउंड ट्रिपिंग हवाला कारोबार में लगा हो। हर किसी को अपराधी समझना गलत है। यह परिपत्र केवल प्रवासी समुदाय को निशाना बनाता है। नियामकीय कमियों का फायदा उठाकर ऐसे सफेदपोश अपराध तो कोई भी कर सकता है फिर चाहे उसका मूल कोई भी हो। प्रवासियों के एफपीआई के जरिये निवेश पर पूरी रोक लगाने के बजाय नियामक को सख्ती बढ़ाने का काम करना चाहिए। उसे परिपत्र की समीक्षा करनी चाहिए। नियामक की चिंताओं को लेकर एक चर्चा पत्र अब तक पेश हो जाना चाहिए था। कोई भी परिपत्र जो इतनी बड़ी तादाद में निवेशकों को प्रभावित करता हो उसे सार्वजनिक चर्चा का विषय बनाना चाहिए।
Keyword: fund, sebi, NRI, भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी),
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