बिजनेस स्टैंडर्ड - चीनी की न्यूनतम बिक्री कीमत बढ़े
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चीनी की न्यूनतम बिक्री कीमत बढ़े

संजीव मुखर्जी और एजेंसियां / नई दिल्ली September 05, 2018

देश के चीनी उद्योग ने सरकार से चीनी की न्यूनतम बिक्री कीमत वर्तमान 29 रुपये से बढ़ाकर 36 रुपये प्रति किलोग्राम करने और अक्टूबर से शुरू होने वाले सीजन 2018-19 के लिए 70 लाख टन के अनिवार्य निर्यात का कोटा तय करने की मांग की है। यह उद्योग सरप्लस उत्पादन के अप्रत्याशित संकट से जूझ रहा है। चीनी की न्यूनतम बिक्री कीमत में 7 रुपये प्रति किलोग्राम की बढ़ोतरी किए जाने से इसके खुदरा दाम तत्काल 4 से 5 रुपये प्रति किलोग्राम बढ़ जाएंगे। लेकिन इस उद्योग से जुड़े उद्यमियों का कहना है कि यह कीमत फिर भी पिछले साल इस समय खुले बाजार में बिक रही चीनी से कम होगी। 
 
भारतीय चीनी मिल संघ (इस्मा) के महानिदेशक अविनाश वर्मा ने कहा, 'किसी को तो कीमत चुकानी होगी। भले ही यह उपभोक्ता चुकाए या सरकार। अन्यथा मिलों पर किसानों का बकाया 31 मार्च, 2019 तक खतरनाक स्तर पर पहुंच जाएगा।' वह आज अंतरराष्ट्रीय चीनी सम्मेलन से इतर संवाददाताओं से बातचीत कर रहे थे।  केंद्र सरकार ने कुछ महीने पहले चीनी की न्यूनतम बिक्री कीमत तय की थी। इस कीमत से कम पर मिलें बिक्री नहीं कर सकती हैं। हालांकि वैश्विक बाजार में चीनी के कमजोर दामों से निर्यात करना लाभप्रद नहीं है, इसलिए उद्योग न्यूनतम बिक्री कीमत में और बढ़ोतरी की मांग कर रहा है। वर्मा ने कहा कि सरकार को न्यूनतम बिक्री कीमत बढ़ाने के साथ ही तुरंत मासिक कोटा व्यवस्था बंद करनी चाहिए। ऐसा न किए जाने पर बहुत कम मिलें निर्यात की निश्चित अवधि का फायदा उठा पाएंगी। देश में चीनी का सरप्लस लगातार बढ़ रहा है। अगर निर्यात नहीं किया गया तो सरप्लस 2018-19 के अंत तक बढ़कर 190 लाख टन तक पहुंच जाएगा। इस दो दिवसीय सम्मेलन के पहले दिन देश में सरप्लस चीनी की स्थिति और इससे निपटने के उपायों का मुद्दा छाया रहा। 
 
हालांकि सरकार ने नई एथनॉल मिश्रण नीति की घोषणा की है, जिसमें पहली बार गन्ने के रस और बी-हैवी शीरे से सीधे उत्पादित एथनॉल की खरीद कीमत तय की गई है। हालांकि इस क्षेत्र के उद्यमियों ने कहा कि यह अच्छा कदम है और भारतीय चीनी क्षेत्र का भविष्य है। लेकिन जब तक कीमतों में बढ़ोतरी नहीं की जाती, तब तक बहुत सुधार नहीं आएगा।  वर्मा ने कहा कि सरकार को अनिवार्य निर्यात लागू करना चाहिए। इसमें यह प्रावधान होना चाहिए कि जो मिलें अपने आवंटित कोटे का निर्यात नहीं करेंगी, उन पर जुर्माना लगाया जाएगा।  मिल मालिकों का कहना है कि अगर भारत ने दिसंबर, 2018 तक 70 से 80 लाख टन चीनी का निर्यात नहीं किया तो मिलों पर किसानों के गन्ना बकाया की राशि अप्रैल तक बढ़कर 400 से 500 अरब रुपये पर पहुंच जाएगी, जो इस समय 120 अरब रुपये है। 
 
इस्मा के अध्यक्ष गौरव गोयल ने कहा कि सरकार को विपणन वर्ष 2018-19 के लिए निर्यात नीति बनानी चाहिए क्योंकि चीनी मिलों का वजूद बचाने के लिए सरप्लस स्टॉक को विदेशी बाजारों में बेचना जरूरी है। उन्होंने कहा, 'सरकार को 2018-19  के लिए 70 लाख टन चीनी के अनिवार्य निर्यात कोटेे की घोषणा करनी चाहिए। निर्यात न करने वाली मिलों पर जुर्माना लगाया जाना चाहिए।' गोयल ने कहा कि अगर मिलों ने निर्यात नहीं किया तो चीनी का स्टॉक 190 लाख टन के स्तर पर पहुंच जाएगा। उन्होंने कहा, 'हमें एक निर्यात नीति की दरकार है क्योंकि ज्यादातर निर्यात कच्ची चीनी के रूप में होगा, जिसका मिलें अगले महीने से उत्पादन करेंगी।' 
 
गोयल ने कहा कि भारत के पास मार्च तक निर्यात का मौका है। उसके बाद वैश्विक बाजारों में ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया और अन्य देशों से चीनी आने लगेगी। वर्मा ने कहा कि निर्यात में होने वाले नुकसान की कुछ हद तक भरपाई के लिए न्यूनतम बिक्री कीमत में बढ़ोतरी की जानी चाहिए। इस्मा के महानिदेशक ने कहा कि मिलों को घरेलू और निर्यात बाजारों में बिक्री से औसत कीमत 32 रुपये प्रति किलोग्राम मिलेगी। सरकार ने मिलों को 2017-18 में 20 लाख टन निर्यात के लिए कहा था, लेकिन अभी तक केवल 4.5 लाख टन का निर्यात हुआ है। खाद्य मंत्रालय ने निर्यात की अवधि तीन महीने बढ़ाकर दिसंबर तक कर दी है। जाने-माने खाद्य नीति विशेषज्ञ और कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) के पूर्व चेयरमैन अ्शोक गुलाटी ने कहा कि सरकार द्वारा तय कीमतों के जरिये एथनॉल की ऊंची कीमत हासिल करना लंबी अवधि में नुकसानदेह हो सकता है क्योंकि इससे एथनॉल के उत्पादन में भारी इजाफा हो सकता है। 
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