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आर्थिक वृद्धि में आई तेजी परंतु चिंता बरकरार

बाजार संकेतक
देवांग्शु दत्ता /  September 04, 2018

भारतीय निवेशक व्यापार युद्ध में तेजी की आशंका की अनदेखी कर  सूचकांकों को नई ऊंचाइयों पर ले गए। अमेरिका और चीन के बीच बातचीत किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच रही है। अमेरिका चीन से होने वाले निर्यात पर 20,000 करोड़ डॉलर का अतिरिक्त दंडात्मक शुल्क लगा सकता है। चीन इसका विरोध करेगा। अमेरिका नाफ्टा को खत्म करने की धमकी भी दे रहा है क्योंकि वह कनाडा और मैक्सिको के साथ व्यापारिक शर्तों पर नए सिरे से बातचीत कर रहा है। ऐसे में वैश्विक स्तर पर मुद्रास्फीति बढ़ेगी और व्यापारिक गतिविधियों में धीमापन आएगा। कमजोर मांग के चलते धातु बाजार में धीमापन आ सकता है, कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहेंगी क्योंकि ईरान पर प्रतिबंध लगा हुआ है और वेनेजुएला में हालात ठीक नहीं हैं।

 
रुपये में गिरावट का सिलसिला लगातार चल रहा है और इसके और नीचे जाने की पूरी आशंका है। अर्जेंटीना की मुद्रा पेसो और तुर्की की मुद्रा लीरा की कमजोरी अन्य उभरते देशों की मुद्राओं के कमजोर रुझान को जाहिर करते हैं। कच्चे तेल के आयात का भारतीय बास्केट 75 डॉलर प्रति बैरल पर है, यानी चालू खाते के घाटे में इजाफा होना तय है। कारोबारी जीडीपी के आंकड़ों से कुछ प्रोत्साहित होंगे। अप्रैल से जून 2018 तिमाही के दौरान जीडीपी में सालाना आधार पर 8.2 फीसदी की वृद्धि दर देखने को मिली। यह आंकड़ा अनुमान से बेहतर है। वर्ष 2017-18 की पहली तिमाही में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के लागू होने और नोटबंदी के दुष्प्रभावों के चलते वृद्धि पर असर पड़ा था। माना जा रहा है कि जुलाई-सितंबर 2018 यानी दूसरी तिमाही के दौरान भी यह असर देखने को मिलेगा।
 
आर्थिक वृद्धि व्यापक रही। विनिर्माण क्षेत्र सालाना आधार पर 13.5 फीसदी ऊपर था। एक वर्ष पूर्व यानी अप्रैल-जून 2017 में यह मात्र 1.8 फीसदी रह गई थी। कृषि क्षेत्र में 5.3 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। सेवा क्षेत्र में यह दर 7.3 फीसदी रही। निजी खपत व्यय में वृद्धि की दर 8.6 फीसदी रही। कहा जा सकता है कि अर्थव्यवस्था जीएसटी और नोटबंदी के बुरे प्रभाव से निपटने में सफल रही है। अस्थिर आधार प्रभाव को लेकर चिंताएं बरकरार हैं। निजी निवेश चक्र भी अभी पर्याप्त गतिशील नहीं हुआ है। निजी खपत को लेकर कुछ परेशान करने वाले संकेत रहे हैं। अगस्त महीने में वाहन बिक्री में बढ़ोतरी नहीं नजर आई। जीएसटी को देखते हुए हमें शायद कुछ और महीनों के आंकड़ों को एक साथ रखकर ही किसी सार्थक रुझान की आशा करनी चाहिए। 
 
रिजर्व बैंक की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक करीब 99.3 फीसदी नकदी चलन में वापस आ गई। एक बार फिर आम जनता के बीच उतनी ही नकदी चलन में है जितनी नोटबंदी के पहले थी।  आम परिवारों की बचत में इजाफा हुआ है लेकिन उनकी उधारी भी बढ़ी है। बचत के रुख में भी नकारात्मक बदलाव आया है और लोग अधिक मात्रा में नकदी का भंडारण कर रहे हैं। वित्त वर्ष 2018 में आम घरों की बचत का स्तर सकल राष्ट्रीय व्यय योग्य आय के 11.1 फीसदी तक बढ़ गया है लेकिन वित्तीय जवाबदेही भी इसके 4 फीसदी के साथ सात वर्ष के उच्चतम स्तर पर है। वर्ष 2016-17 में यह दर केवल 2.4 फीसदी थी।
 
आवास और व्यक्तिगत ऋण में बढ़ोतरी की वजह से ऋण के स्तर में सुधार दिख रहा है। इसमें क्रेडिट कार्ड की भी हिस्सेदारी है जो अब गैर खाद्य ऋण के बकाये में से 25 फीसदी के लिए जवाबदेह है। मार्च 2018 तक औद्योगिक ऋण घटकर गैर खाद्य ऋण का 35.1 फीसदी रह गया था जबकि मार्च 2015 में यह 44 फीसदी के उच्च स्तर पर था। यह बताता है कि निजी निवेश भी कुछ खास नहीं रहा। क्रेडिट कार्ड ऋण मार्च 2018 तक दोगुना से ज्यादा बढ़कर 69,000 करोड़ रुपये हो गया था। इससे यह भी पता चलता है कि निजी खपत मजबूत है। जीडीपी के मजबूत आंकड़े इसका समर्थन करते हैं।
 
बिजली क्षेत्र की दिक्कतें कहीं अधिक हो सकती हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उन 60 के करीब कंपनियों को राहत देने से मना कर दिया है जिन पर करीब 1.2 लाख करोड़ रुपये बकाया हैं। अगर वे कोई हल निकालने में नाकाम रहीं तो आरबीआई 15 दिन के भीतर ऋणशोधन प्रक्रिया शुरू कर सकता है। बिजली क्षेत्र की बात करें तो अनिल अंबानी समूह की आरइन्फ्रा को अदाणी ट्रांसमिशन ने उबाारा। उसने आर इन्फ्रा की मुंबई बिजली वितरण की परिसंपत्तियों को 18,800 करोड़ रुपये में खरीदा। इससे आरइन्फ्रा का कर्ज 22,000 करोड़ रुपये से कम होकर 7,500 करोड़ रुपये रह गया। अनिल अंबानी ने आशा जताई है कि उनकी कंपनी बिना कर्ज वाली कंपनी बन सकती है।
 
इंडियन पोस्ट पेमेंट बैंक (आईपीपीबी) ने सेवाएं शुरू की हैं। 155,000 डाकघरों और 17 करोड़ बचत खातों के साथ यह ग्रामीण क्षेत्रों में गहरी पकड़ रखता है। इसके चलते वहां बैंकिंग सुविधाओं में सुधार हो सकता है। कॉर्पोरेट आय को देखें तो पहली तिमाही अच्छी थी और दूसरी तिमाही भी बेहतर रह सकती है। तीसरी तिमाही में सालाना आधार पर गिरावट आएगी क्योंकि आधार प्रभाव समाप्त हो जाएगा। जीएसटी जैसे व्यापक बदलाव से समायोजन करना मुश्किल है लेकिन जीएसटी संग्रह खुद सुधार के संकेत दे रहे हैं। व्यापक तौर पर देखें तो वृद्धि अच्छी रहेगी और अगर वैश्विक घटनाएं प्रतिकूल नहीं हुईं तो वह बहुत अच्छी होगी। हमें कच्चे तेल के महंगे दाम, नकदी आपूर्ति में तंगी और कारोबारी माहौल में गिरावट पर ध्यान देने की जरूरत है। मूल्य आय अनुपात की बात करें तो बाजार में मूल्यांकन ऐतिहासिक ऊंचाई पर है। भले ही तमाम क्षेत्रों में अप्रत्याशित तेजी हो तो भी इसे उचित ठहराना मुश्किल होगा। फिलहाल एफपीआई सकारात्मक हैं। घरेलू संस्थान तब तक खरीद जारी रखेंगे जब तक म्युचुअल फंड एसआइपी की आवक जारी है। तकनीकी तौर पर देखें तो निफ्टी/सेंसेक्स नए क्षेत्र में हैं। इसलिए लक्ष्य तय करना असंभव है। फिलहाल माहौल तेजडिय़ों के पक्ष में है।
Keyword: india, america, china, trade,,
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