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विपक्ष की उम्मीदवारी में राहुल नहीं तो कौन?

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  September 03, 2018

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) वर्ष 2019 का आम चुनाव जीतेगी या कांग्रेस/विपक्ष इसे हारेगा? राहुल गांधी को ध्यान में रखें तो इसमें कोई अस्पष्टता नजर नहीं आती। भले ही भाजपा घटे हुए बहुमत के साथ दोबारा सत्ता में आए लेकिन उसकी इस वापसी की सबसे बड़ी  वजह स्वयं राहुल गांधी होंगे। एक भी दिन ऐसा नहीं जाता है जब वह कोई न कोई मूर्खतापूर्ण बात नहीं कहते हों। कम से कम इस मामले में वह भाजपा नेता और त्रिपुरा के मुख्यमंत्री विप्लव देव की बराबरी करते नजर आते हैं।

 
अगर भाजपा ने वर्ष 2019 के आम चुनाव को मोदी बनाम राहुल का मुकाबला नहीं बनाया होता तो इन बातों से कोई खास फर्क भी नहीं पडऩे वाला था। परंतु पता नहीं क्यों कांग्रेस पार्टी को इस बात का गहरा विश्वास है कि वह सत्ता के लिए ही बनी है और गांधी परिवार के सदस्यों को प्रधानमंत्री बनने का दैवीय अधिकार प्राप्त है। मतदाताओं के लिए इतना ही पर्याप्त है। वे केवल इस आधार पर ही भाजपा के खिलाफ मतदान नहीं करेंगे। परंतु अभी भी बहुत अधिक देर नहीं हुई है। कांग्रेस किसी और को आगे बढ़ा सकती है। मैं यहां दो विकल्पों की बात करूंगा। उनमें से एक कांग्रेस से है तो दूसरा कांग्रेस से ही निकली पार्टी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) से। सन 1999 में राकांपा का गठन इसलिए हुआ क्योंकि उसके नेता शरद पवार ने कांग्रेस का नेतृत्व एक विदेशी के हाथों में देने का विरोध करते हुए पार्टी छोड़ दी थी।
 
पी चिदंबरम
 
कांग्रेस के भीतर पी चिदंबरम विकल्प हो सकते हैं। अगर कांग्रेस दूसरे सबसे बड़े दल के रूप में उभरती है तो चिदंबरम का नाम आगे बढ़ाया जा सकता है। यह सच है कि उन्हें बहुत अधिक पसंद नहीं किया जाता है। यह भी सच है कि प्रर्वतन निदेशालय तथा अन्य एजेंसियां उनके पुत्र के खिलाफ जांच कर रही हैं लेकिन ध्यान रहे कि अब तक कोई मामला दर्ज नहीं किया गया है। बहरहाल, केवल इन दो वजहों से उनका नाम खारिज नहीं किया जा सकता है। सच यही है कि कांग्रेस के भीतर मौजूद विभिन्न विकल्पों में चिदंबरम ही सबसे अधिक उपयुक्त हैं। वह सर्वाधिक शिक्षित, अत्यधिक अनुभवी, सादगी से रहने वाले, अत्यंत सौम्य, अत्यंत किफायती लेकिन विस्तृत ब्योरों पर पकड़ रखने वाले और व्यापक विश्वदृष्टिï रखने वाले व्यक्ति हैं। उनमें वह काबिलियत है जो इस महान देश के प्रधानमंत्री में होनी चाहिए। 
 
परंतु दो ऐसी बाते हैं जिन पर वह खरे नहीं उतरते। एक तो यह कि वह उत्तर भारत से ताल्लुक नहीं रखते और हिंदी में प्रचार नहीं कर सकते। दूसरा कांग्रेस में उनके अधिकांश साथी जो खुद उत्तर भारत से आते हैं, वे उन्हें इसलिए नापसंद करते हैं क्योंकि वह थोड़ा दंभी प्रतीत होते हैं। दूसरी दिक्कत यह है कि वह गांधी परिवार का वर्तमान नहीं हैं। अगर गांधी परिवार उनका नाम आगे बढ़ाता है तो पहली समस्या तो आड़े नहीं आएगी। दूसरी बात समस्या बन सकती है क्योंकि यह काफी हद तक संभव है कि सोनिया गांधी अपने पुत्र को देश का प्रधानमंत्री बनवाना चाहें।
 
अगर ऐसा होता है तो भाजपा को जीतने से कोई रोक नहीं सकता। भाजपा प्रसन्न हो सकती है क्योंकि कांग्रेस राहुल गांधी के नेतृत्व में तो भाजपा से चुनावी जीत हासिल करने की स्थिति में नहीं नजर आती। उसे उन मतदाताओं का फायदा मिलेगा जो इधर-उधर होते हैं। वे या तो वोट ही नहीं देंगे या किसी भी ऐसे उम्मीदवार को अपना वोट दे देंगे जिसकी कोई प्रासंगिकता न हो। परंतु ऐसी कोई जल्दबाजी भी नहीं है। चिदंबरम का चयन तो चुनाव के बाद भी किया जा सकता है। सोनिया गांधी सन 2004 में इसकी नजीर तैयार कर चुकी हैं। 
 
शरद पवार 
 
मैं जिस दूसरी संभावना के बारे में बात कर रहा हूं वह हैं शरद पवार। जिन वजहों से सन 1991 में चंद्रशेखर की आवश्यकता थी लगभग उन्हीं कारणों से आज पवार की जरूरत है। यानी देश को मौजूदा अफरातफरी से उबारने के लिए। हमारे उम्रदराज पाठकों को याद होगा कि दिसंबर 1989 से नवंबर 1990 तक विश्वनाथ प्रताप सिंह की 11 महीनों की सरकार ने पिछड़े वर्गों के आरंक्षण से संबंधित मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू करके देश को दो धड़ों में बांट दिया था। इसके बाद लालकृष्ण आडवाणी ने राम मंदिर निर्माण की मांग के साथ रथयात्रा कर डाली। वीपी सिंह की सरकार को भाजपा ने बाहर से समर्थन दिया था। 
 
वीपी सिंह की सरकार गिरने के बाद चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने तो देश विभिन्न तरह की समस्याओं से जूझ रहा था। परंतु एक महीने के भीतर उन्होंने पूरे देश का मिजाज सुधार दिया। मुझे लगता है कि पवार में भी वैसा करने की काबिलियत है। वह उसी शैली के राजनेता हैं।  निश्चित तौर पर उनके पास चिदंबरम से कहीं अधिक अनुभव है। उनका काफी सम्मान भी है। वह सबको साथ लेकर चलते हैं। वह बाजार और कारोबारी जगत के भी अनुकूल हैं। ममता बनर्जी जैसे उम्मीदवारों की तो कहीं कोई संभावना नहीं नजर आती। 
 
एक बार फिर लोग कहेंगे कि अभी इस बारे में बात करना जल्दबाजी होगी क्योंकि किसी को नहीं पता कि आंकड़े किसके पक्ष में आएंगे। परंतु इस दलील में दम नहीं है क्योंकि आंकड़ों की तस्वीर एकदम स्पष्टï है। राज्य स्तर के किसी भी नेता को अपने राज्य से इतर लोकसभा सीट जीतने में सफलता नहीं मिलेगी। अंतत: बात इस पर आकर टिकेगी कि पवार गैर कांग्रेसी दलों को किस प्रकार एकसाथ लाने में कामयाब होते हैं और कांग्रेस को ऐसी पेशकश दे सकते हैं या नहीं जिसे वह नकार न सके। अगर वह ऐसा कर सके तो सन 1999 का बदला ले सकेंगे। 
Keyword: BJP, congress, NCP, election,,
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