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वैश्विक कारोबारी जंग में सब होंगे तंग

अरविंद मायाराम /  September 03, 2018

मौजूदा कारोबारी जंग, अमेरिका को सबसे अधिक प्रभावित करेगी लेकिन अपने बाजार के विशाल आकार के मद्देनजर एशिया आज यूरोपीय संघ अथवा अमेरिका से अधिक महत्त्वपूर्ण है। बता रहे हैं अरविंद मायाराम 

 
बढ़ती कारोबारी जंग के बीच 20 वर्ष में पहली बार, दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन ने वर्ष की पहली छमाही में 2,830 करोड़ डॉलर का चालू खाते का घाटा दर्ज किया है। गत 31 जुलाई को अमेरिका के ट्रंप प्रशासन ने चीनी वस्तुओं पर 20,000 करोड़ डॉलर मूल्य का अतिरिक्त शुल्क लगाया था। अब उसने 2,200 करोड़ डॉलर के नए शुल्क की घोषणा की है। बदले में चीन ने भी 6,000 करोड़ डॉलर मूल्य के शुल्क की घोषणा कर दी। अमेरिका और चीन ऐसी कारोबारी जंग में शामिल हैं जो उनके लिए तो आत्महंता साबित होगी ही, अन्य देशों के लिए भी कम नुकसानदेह नहीं साबित होगी। अमेरिका ने जनवरी में आयातित सोलर पैनल और वॉशिंग मशीन पर आयात शुल्क लगाने की घोषणा की थी। मार्च में स्टील और एल्युमीनियम पर यही शुल्क लगाया गया। कनाडा और मैक्सिको जैसे सहयोगी राष्ट्रों तथा यूरोपीय संघ की मदद से किए जाने वाले अमेरिकी निर्यात पर प्रतिरोध स्वरूप शुल्क लगाकर इसका विरोध किया गया। स्टील और एल्युमीनियम पर अमेरिकी शुल्क वृद्धि का विरोध भारत ने भी किया। उसने अमेरिका से आने वाले बादाम, सेब और अन्य धातु उत्पादों पर आयात शुल्क बढ़ाकर इसका विरोध किया। भारत ने अमेरिका द्वारा स्टील और एल्युमीनियम आयात शुल्क के विरोध में करीब 24.1 करोड़ डॉलर मूल्य की शुल्क वृद्धि की। 
 
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के अनुमान के मुताबिक अमेरिका और शेष विश्व के बीच बढ़ता कारोबारी तनाव 2020 तक वैश्विक कारोबारी वृद्धि दर में 0.5 फीसदी की गिरावट ला सकता है। यानी दुनिया भर के जीडीपी में 43,000 करोड़ डॉलर का नुकसान। आईएमएफ का कहना है कि व्यापारिक युद्ध सभी अर्थव्यवस्थाओं को नुकसान पहुंचाएगा। अमेरिका वैश्विक प्रतिरोध का केंद्र होगा क्योंकि वैश्विक बाजार के निर्यात में उसकी हिस्सेदारी अधिक है। आईएमएफ ने कहा कि अगर संरक्षणवादी उपायों में इजाफा होता है तो निवेशकों पर इसका असर होगा। इतना ही नहीं इससे वैश्विक आपूर्ति शृंखला प्रभावित होगी, उत्पादकता बढ़ाने वाली प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल कम होगा और उपभोक्ता वस्तुओं का मूल्य बढ़ेगा। एक दृष्टिकोण यह भी है कि अगर व्यापारिक युद्ध में बढ़ोतरी होती है तो अमेरिका और चीन के बीच घटते व्यापार का फायदा भारत और ब्राजील जैसे देशों को मिल सकता है। सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अनुमान के मुताबिक चूंकि चीन के सोयाबीन आयात का बड़ा हिस्सा सोयाबीन तेल और खाद्य पदार्थ में जाता है जिनका निर्यात किया जाता है। अगर अमेरिकी सोयाबीन पर लगने वाला शुल्क चीन के आयात को प्रभावित करता है तो उसके निर्यात पर भी असर होगा। भारत अन्य देशों की मांग पूरी कर सकता है।
 
यह नजरिया सही नहीं है। लंबी अवधि में यह उच्च मुद्रास्फीति वाला और वैश्विक वृद्धि को कमजोर करने वाला साबित होगा। व्यापारिक युद्ध का मुद्रास्फीतिक प्रभाव अमेरिकी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाएगा। इसका चरणबद्ध प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। उच्च शुल्क दरों के कारण उपभोक्ता मूल्य में इजाफा हुआ ही है, साथ ही अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने गत सितंबर में कहा था कि वह 4 लाख करोड़ डॉलर के ट्रेजरी बॉन्ड और मॉर्गेज समर्थित परिसंपत्तियों की बिक्री करेगा। वर्ष 2008 के वित्तीय संकट के बाद से ही ये परिसंपत्तियां एकत्रित हो रही थीं। अमेरिकी घटनाक्रम से जुड़े ये जोखिम भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी असर डाल सकते हैं। यह ऐसे वक्त में होगा जब भारतीय बैंकिंग तंत्र फंसे हुए कर्ज से निपटने के लिए जूझ रहा है। भारतीय अर्थव्यवस्था, खासतौर पर वित्तीय बाजारों को अस्थिरता के लिए तैयार रहना चाहिए। वैश्विक और घरेलू चुनौतियों का मिलाजुला प्रभाव उन्हें प्रभावित कर सकता है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दरों के जरिये मुद्रास्फीति को सीमित रखेगा। अमेरिकी बाजारों में प्रतिफल वर्ष 2016 के मध्य से ही बढ़ रहा है। ऐसे में उपर्युक्त कदम उठाए जाने के बाद प्रतिफल और अधिक तेजी से बढ़ सकता है।
 
इसका असर भारतीय सरकारी प्रतिभूतियों में नजर आ रहा है जिनमें पिछले सात महीनों से गिरावट आ रही है। इस गिरावट का सीधा संबंध अमेरिकी प्रतिफल में इजाफे और स्थानीय मुद्रास्फीति में इजाफे से है। जब प्रतिफल बढ़ता है तो बॉन्ड कीमतों में गिरावट आती है। अमेरिका में बढ़ती ब्याज दरें देश के शेयर बाजार में अस्थिरता ला सकती हैं। व्यापार युद्ध सबको नुकसान पहुंचाएगा लेकिन इसकी शुरुआत करने वाला अमेरिका इससे सबसे अधिक प्रभावित होगा। वैश्विक अर्थव्यवस्था पहले ही अमेरिका से दूर हो रही है। बीते दशक में यूरोपीय संघ से एशिया को होने वाले निर्यात में अमेरिका को होने वाले निर्यात की तुलना में करीब दोगुनी वृद्धि हुई है। सन 2017 में यूरोपीय संघ से एशिया को होने वाला निर्यात अमेरिका को होने वाले निर्यात से अधिक था जबकि एशिया से यूरोपीय संघ को होने वाला निर्यात अभी भी अमेरिका की तुलना में कम था लेकिन इसमें तेजी से वृद्धि हो रही थी। जाहिर है एशिया के लिए यूरोपीय संघ की महत्ता बढ़ रही है। बाजार के आकार के मुताबिक भी एशिया यूरोपीय संघ के लिए अमेरिका से अधिक अहमियत रखता है। जल्दी ही यूरोपीय संघ भी एशिया के लिए अमेरिका से अधिक अहम हो जाएगा।
 
एशिया के आयात का आकार बताता है कि वह एक बढ़ता हुआ जीवंत बाजार है। यहां लोगों की क्रय शक्ति बढ़ रही है। निजी उपभोक्ता व्यय के मुताबिक देखें तो आज एशिया उतना ही बड़ा है जितना कि अमेरिका, लेकिन एशिया की गति बहुत तेज है। बीते दशक में चीन की निजी खपत व्यय की औसत दर 13.8 फीसदी रही जो अमेरिका से चार गुना तेज है। आश्चर्य नहीं कि चीन अब ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, रूस, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण कोरिया और इंडोनेशिया आदि देशों के लिए सबसे बड़ा बाजार है। अगर अमेरिका और चीन में आयात की मौजूदा वृद्धि दर कायम रही तो 2021 तक चीन अमेरिका को पीछे छोड़ दुनिया का सबसे बड़ा आयातक बन जाएगा।
 
अमेरिका ने जो व्यापारिक युद्ध छेड़ा है वह यूरोपीय संघ और एशिया को अवसर दे रहा है कि वे एक दूसरे के लिए अपना बाजार खोलें और करीबी आर्थिक रिश्ते कायम करें। अमेरिका से बाहर हर जगह क्षेत्रीय मुक्त व्यापार समझौतों की जरूरत महसूस की जा रही है। देखना होगा कि भारत अपनी नीतियों को कितनी तेजी से सुसंगत बनाता है क्योंकि उभरती विश्व व्यवस्था में उसकी स्थिति इसी से तय होगी।
 
(लेखक पूर्व वित्त सचिव हैं और फिलहाल सीयूटीएस इंस्टीट्यूट फॉर रेग्युलेशन ऐंड कंपटीशन के चेयरमैन हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।)
Keyword: india, america, china, trade,,
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