बिजनेस स्टैंडर्ड - अस्वाभाविक चूक
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अस्वाभाविक चूक

संपादकीय /  September 03, 2018

हाल में दो ऐसी घटनाएं हुई हैं जो निजी बैंकों के संचालन में रिजर्व बैंक के रुख को लेकर प्रश्न खड़े करती हैं। पहली घटना में उसने येस बैंक के प्रबंध निदेशक और सीईओ पद पर राणा कपूर की पुनर्नियुक्ति को मंजूरी दे दी। कपूर के तीन वर्ष के कार्यकाल का अंतिम दिन 31 अगस्त को था और केंद्रीय बैंक 30 अगस्त तक इस विषय पर खामोश था। इसके चलते बैंक के शेयरों की कीमतों में काफी गिरावट आई। बैंक के बोर्ड ने जून में ही उनकी दोबारा नियुक्ति को मंजूरी दे दी थी और बैंकिंग नियामक के पास इस विषय पर विचार करने के लिए बहुत समय था। दूसरी बात, उनको सशर्त मंजूरी देकर उसने पहले से चुनौती झेल रहे बैंक की अनिश्चितता बरकरार रखी है। येस बैंक के आकार का वाणिज्यिक संस्थान सुगम तरीके से कैसे संचालित हो सकता है अगर उसके सीईओ की तकदीर ही अधर में लटकी हो। आरबीआई कपूर की दोबारा नियुक्ति की पुष्टि करने को बाध्य नहीं था, खासतौर पर तब जबकि उसने अतीत में यह स्पष्ट कर दिया था कि वह लगातार दूसरे वर्ष फंसे हुए कर्ज के आकलन में भारी अंतर को लेकर खासा अप्रसन्न है। परंतु नियामक को ऐसा अस्पष्ट रुख नहीं अपनाना चाहिए था। संकटग्रस्त ऐक्सिस बैंक के मामले में उसने कड़ा रुख अपनाया था और बोर्ड से कहा था कि बैंक की सीईओ और प्रबंध निदेशक शिखा शर्मा को चौथी बार तीन वर्ष का कार्यकाल सौंपने के बारे में दोबारा सोचे। इसके बाद ही शर्मा ने अनुरोध किया था कि उनका कार्यकाल दिसंबर में समाप्त हो रहा है और बोर्ड को इस बीच उनके उत्तराधिकारी की तलाश करनी चाहिए। बैंक के साथ भी अगर यह दोहराया जाता तो उसे फायदा होता। 

 
दूसरी चिंता आईसीआईसीआई बैंक की अनुषंगी आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज से जुड़ी है जिसने हाल ही में चंदा कोछड़ को अपने बोर्ड में दोबारा चुन लिया। इस मामले में आईसीआईसीआई बैंक बोर्ड के आचरण को लेकर कई सवाल उठे हैं। इनमें सबसे अहम सवाल यह है कि जब आईसीआईसीआई बैंक के पास इस सूचीबद्ध अनुषंगी कंपनी के 79.22 फीसदी शेयर हैं तो बैंक का बोर्ड कोछड़ के पक्ष में मतदान कैसे कर सकता है जबकि वह स्वयं हितों के टकराव वाले लेनदेन की जांच के चलते खुद छुट्टी पर चल रही हैं। यह आंतरिक जांच न्यायमूर्ति श्रीकृष्ण के नेतृत्व में की जा रही है। जब तक वह दोषमुक्त साबित नहीं हो जाती हैं उनका नाम कैसे शामिल किया जा सकता है।
 
बैंक की सबसे बड़ी अनुषंगी में उनको पुनर्नियुक्त करके बोर्ड ने अपना पूर्वग्रह जाहिर कर दिया है। जब बैंक के पास आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज की 80 फीसदी हिस्सेदारी है तो इस बात का कोई अर्थ नहीं है कि 95.78 फीसदी अंशधारकों ने कोछड़ के पक्ष में मत दिया। बेहतर तो यही होता कि आईसीआईसीआई बैंक बोर्ड वोटिंग से दूर रहता। यह सोचने वाली बात है कि अगर प्रवर्तक बोर्ड यह सैद्धांतिक तरीका अपनाता तो क्या नतीजा अलग होता? यह बात चकित करती है कि रिजर्व बैंक, जिसने मानक संचालन के लिए निजी बैंकों के बोर्ड में स्वतंत्र निदेशकों को संवेदनशील बनाने की कवायद की पहल की, उसने बोर्ड के ऐसे आचरण पर ध्यान नहीं दिया जो वाकई सवाल उठाने लायक था। केंद्रीय बैंक कह सकता है कि आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज उसके दायरे में नहीं आती। परंतु आईसीआईसीआई बैंक बोर्ड का आचरण यकीनन उसके क्षेत्र का विषय है और यह बोर्ड जब बहुलांश हिस्सेदारी वाली अनुषंगी को लेकर जवाबदेही तय करता है तो यह मामला बैंकिंग नियामक के दायरे में आना ही चाहिए। एक प्रश्न यह भी है कि जब आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज सूचीबद्ध है तो बाजार नियामक सेबी ने इसमें हस्तक्षेप क्यों नहीं किया?
Keyword: bank, loan, debt, RBI, yes bank,,
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