बिजनेस स्टैंडर्ड - नोटबंदी और फंसे कर्ज में ही खप गई ऊर्जा
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नोटबंदी और फंसे कर्ज में ही खप गई ऊर्जा

अद्वैत राव पालेपू /  09 02, 2018

आरबीआई गवर्नर के तौर पर पटेल का तीसरा साल शुरू हो रहा है

बिजनेस स्टैंडर्ड नोटबंदी और फंसे कर्ज में ही खप गई ऊर्जा

ऊर्जित पटेल के बड़े कदम

पहला साल:

नीतिगत ब्याज दरों को तय करने के लिए मौद्रिक नीति समिति की पहली बैठक संपन्न

500 और 1000 रुपये के सारे पुराने नोटों को प्रतिबंधित करने वाले फैसले नोटबंदी का क्रियान्वयन करना। इस दौरान कुल नोटों में से 87 फीसदी बदल दिए गए। 

भुगतान बैंकों के गठन के लिए दिशानिर्देश और आरबीआई के भीतर प्रवर्तन विभाग का गठन।

कार्ड से भुगतान को बढ़ावा देने के लिए मर्चेंट रियायती दरों को तर्कसंगत बनाना

12 बड़ी कर्जदार कंपनियों को आईबीसी कानून के तहत दिवालिया समाधान के लिए प्रेषित करना

दूसरा साल:

सार्वजनिक साख पंजीकरण के लिए जमीनी काम की शुरुआत

वर्चुअल मुद्रा में लेनदेन करने वाले उपभोक्ताओं, कारोबारियों, ब्रोकरों और फर्मों पर प्रतिबंध लगाया। 

बैंकों की परिसंपत्ति गुणवत्ता में विभेद को सामने लाने के लिए विशेषज्ञ समिति का गठन।

लेटर ऑफ अंडरस्टैंडिंग (एलओयू) और लेटर ऑफ कम्फर्ट (एलओसी) जारी करने पर रोक लगाई।

वाणिज्यिक बैंकों को गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के साथ मिलकर कर्ज जारी करने की इजाजत।

अगर भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर के तौर पर ऊर्जित पटेल के कार्यकाल का पहला साल नोटबंदी से फैली अराजकता पर लगाम लगाने में बीता था तो दूसरा साल बैंकिंग उद्योग को गहराई तक चपेट में ले चुकी फंसे कर्ज की समस्या से जूझने में बीत गया। इस दौरान पटेल को नॉर्थ ब्लॉक में बैठे अफसरों और उद्योगपतियों की ताकतवर लॉबी से भी तगड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। आरबीआई गवर्नर के तौर पर पटेल का तीसरा साल शुरू हो रहा है।

सवाल है कि क्या उनका तीसरा साल मुद्रा संकट से निपटने में बीतेगा? हकीकत यह है कि रिजर्व बैंक का कोई भी गवर्नर इस समस्या से बच नहीं पाया है और पटेल को भी इसका अहसास है। वह दुनिया के चुनिंदा गवर्नरों में से एक हैं जो दुनिया के मुद्रा युद्ध की तरफ बढऩे का अंदेशा जता चुके हैं। अगर उनकी यह आशंका वाकई में सच साबित होती है तो भारतीय मुद्रा बुरी तरह प्रभावित होगी। इस साल अब तक रुपये में 9 फीसदी से अधिक गिरावट आ चुकी है। इसका नतीजा यह हुआ है कि डॉलर के मुकाबले रुपये की विनिमय दर 71 रुपये प्रति डॉलर के करीब जा चुकी है।  

भारतीय बैंकिंग प्रणाली में कुल फंसे कर्ज की मात्रा जून 2018 तक 10 लाख करोड़ रुपये से भी अधिक हो चुकी है जबकि दो साल पहले यह आकंड़ा महज 6.55 लाख करोड़ रुपये था। क्रेडिट रेटिंग एजेंसी इक्रा की मानें तो 3.5 लाख करोड़ रुपये मूल्य की कर्जदार परिसंपत्तियों के लिए दिवालिया प्रक्रिया शुरू की जा चुकी है और करीब इतनी ही राशि की परिसंपत्ति राष्ट्रीय कंपनी कानून अधिकरण (एनसीएलटी) का रुख करने जा रही हैं।

लेनदार बैंकों ने दिवालिया प्रक्रिया के जरिये कुछ अहम परिसंपत्तियों की बिक्री कर अपना बकाया कुछ हद तक वसूला है या फिर उसकी तैयारी में हैं। बकाया राशि की वसूली के लिए कई और ऋणग्रस्त परिसंपत्तियों पर भी ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) का इस्तेमाल किया जाएगा।

इससे भारत में अभी तक मौजूद कारोबारी एवं साख प्रणाली का ढांचा काफी हद तक बदल रहा है। भले ही पटेल के रिजर्व बैंक गवर्नर रहते समय बैंकों को सशक्त किया गया है लेकिन बैंकर आरबीआई की तरफ से लचीलापन नहीं दिखाने से कुछ नाखुश भी हैं।

खासकर बिजली क्षेत्र में बकाया 1.77 लाख करोड़ रुपये के कर्ज को लेकर आरबीआई की सख्ती बैंकरों को नागवार गुजर रही है। पटेल ने पिछले साल कहा था कि ऋणग्रस्त परिसंपत्तियों का त्वरित निपटान या समयबद्ध ऋणशोधन बैंकों के बैलेंस शीट को दुरूस्त करने और पूंजी के कारगर आवंटन के लिए महत्त्वपूर्ण होगा।  

भले ही बैंकों के शीर्ष अधिकारियों को यह पसंद न आए लेकिन कुछ विश्लेषक आरबीआई के इस रवैये की तारीफ करते हैं। दिसंबर 2016 में आईबीसी कानून लागू किए जाने के बाद ऋणग्रस्त कंपनियों और उनके बकाया कर्ज का निपटान समयबद्ध तरीके से किए जाने की व्यवस्था बनी है।

यह अलग बात है कि दिवालिया प्रक्रिया में बैंकों को अपने कर्ज का एक बड़ा हिस्सा हेयरकट के तौर पर गंवाना पड़ रहा है। बिजली क्षेत्र की कंपनियों पर बकाया कर्ज के मामले में बैंकों ने आरबीआई से कहा था कि कर्ज समाधान के लिए रखी गई 27 अगस्त की समयसीमा को बढ़ा दिया जाए।

सरकार भी कुछ हद तक बैंकों की इस मांग का समर्थन कर रही थी लेकिन आरबीआई ने अपने फैसले में कोई बदलाव नहीं किया जिसके बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सभी कर्जदार बिजली परियोजनाओं को दिवालिया प्रक्रिया का सामना करने के लिए कह दिया है।  

एक अर्थशास्त्री ने अपना नाम सामने न आने की शर्त पर कहा, 'इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बिजली क्षेत्र के एनपीए को लेकर आरबीआई के रुख की पुष्टि कर दी है। बड़ी उपलब्धि यह है कि फरवरी में बिजली क्षेत्र के एनपीए के लिए दिशानिर्देश जारी करने के बाद आरबीआई उस पर डटा रहा है।

उसने यह सुनिश्चित किया कि किसी भी तरह की रियायत न मिले।' उनका मानना है कि कुछ खास क्षेत्रों के एनपीए का बोझ कम करने के लिए बैंक और सरकार दोनों ही अधिक लचीलापन चाहेंगे। यह पटेल के कार्यकाल में आरबीआई के चरित्र को बयां करता है। पटेल की अगुआई वाला रिजर्व बैंक एनपीए के बढ़ते बोझ से बेहाल बैंकों को अधिक राहत नहीं देगा। 

अभी तक रिजर्व बैंक ने 11 बैंकों को अपने त्वरित दोषनिवारक कार्रवाई (पीसीए) मसौदे में शामिल किया है। यह मसौदा बैंकों को सामान्य कारोबारी गतिविधियों से रोकता है। बैंक पूंजी की किल्लत से जूझ रहे हैं लेकिन उन्हें फंसे कर्ज की समस्या से बेहाल एक स्वस्थ बैंक के लिए जरूरी पूंजी को अलग रखना होगा।

भले ही इसका मकसद बैंकों के बैलेंस शीट को साफ-सुथरा करना है लेकिन इन बैंकों में निवेश करने वालों ने आरबीआई की सख्ती की आशंका के चलते बैंकों के शेयरों से परहेज ही करना बेहतर समझा है। पटेल फंसे हुए कर्ज की समस्या छिपाने की कोशिश करने वाले बैंकों पर भी काफी सख्त रहे हैं।

बैंकों ने अपने एनपीए के बारे में खुद जो खुलासा किया वह आरबीआई के आकलन से कम था। इस खुलासे के बाद रिजर्व बैंक ने सख्ती बरती तो एक निजी बैंक के मुख्य कार्यकारी अधिकारी की कुर्सी खतरे में पड़ गई। 

पटेल ने एनपीए की सटीक जानकारी नहीं देने वाले बैंकों के बारे में कहा था, 'यह सच है कि एनपीए में भारी अंतर होने से वास्तविक जोखिम का समय पर अंदाजा लगाने, बहीखाते को विश्वसनीय एवं पारदर्शी बनाने और प्रभावी प्रबंधन पर विपरीत असर होता है।'

गवर्नर के तौर पर पटेल के कार्यभार संभालने के कुछ समय बाद ही नोटबंदी का फैसला हुआ था। एक ही झटके में समूची बैंकिंग व्यवस्था में मौजूद 87 फीसदी नोटों को प्रतिबंधित घोषित कर दिया गया था। इसके क्रियान्वयन में शुरुआत में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा लेकिन कुछ दिनों बाद आरबीआई और तमाम बैंक हालात पर काबू पाने में सफल रहे। कुछ महीनों में नकदी कमी की समस्या खत्म हो गई थी।  

पटेल के गवर्नर रहने के दौरान ही मौद्रिक नीति तय करने वाली शीर्ष संस्था के तौर पर मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) का पहली बार गठन किया गया। मौद्रिक नीतियों के बारे में सलाह देने वाली इस समिति के प्रमुख आरबीआई गवर्नर ही होते हैं। एक अनुसंधान फर्म के मुख्य अर्थशास्त्री कहते हैं, 'पटेल के गवर्नर रहते समय आरबीआई ने एमपीसी ढांचे के तहत मौद्रिक नीति की समीक्षा का कार्य शानदार तरीके से किया है।

इसके पहले सरकार और रिजर्व बैंक के बीच नीतिगत मसलों पर अक्सर टकराव पैदा होता रहता था। लेकिन एमपीसी के गठन के बाद इन मामलों पर फैसले अधिक पारदर्शी तरीके से लिए जा रहे हैं। पटेल ने अपने कार्यकाल में विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाने पर भी पूरी सक्रियता दिखाई। इसका नतीजा यह हुआ कि मध्य अप्रैल तक विदेशी मुद्रा भंडार 426 अरब डॉलर तक जा पहुंचा था। हालांकि पिछले कुछ हफ्तों में इस मुद्रा भंडार में गिरावट आई है लेकिन अब भी यह 400 अरब डॉलर से अधिक ही है।  

विदेशी मुद्रा भंडार का एक हिस्सा रुपये की गिरावट को थामने में खर्च हो गया है। डॉलर के मुकाबले रुपया अब तक के निम्नतम स्तर 71 रुपये प्रति डॉलर पर आ चुका है। पटेल ने अगस्त की शुरुआत में नीतिगत ब्याज दरों की घोषणा के बाद कहा था कि व्यापार युद्ध के बाद अब मुद्रा युद्ध की आशंका दिख रही है।

सरकार के साथ संबंध

वित्तीय मामलों पर संसद की स्थायी समिति के समक्ष पेश होते समय पटेल को नोटबंदी और बढ़ते एनपीए पर सांसदों के मुश्किल सवालों का सामना करना पड़ा था। यह समिति नोटबंदी के अलावा बैंकों के बढ़ते कर्ज बोझ के प्रभावों की समीक्षा कर रही है। समिति ने पटेल से पूछा था कि हीरा कारोबारी नीरव मोदी और मेहुल चोकसी की धोखाधड़ी के चलते पंजाब नैशनल बैंक (पीएनबी) में हुए 140 अरब रुपये के घोटाले को रोक पाने में आरबीआई क्यों नहीं सफल हो पाया?

इस पर पटेल ने संसदीय समिति को बताया था कि रिजर्व बैंक के पास सार्वजनिक बैंकों पर नाकाफी नियंत्रण है। उन्होंने सरकारी नियंत्रण वाले बैंकों पर निगरानी के लिए आरबीआई को अधिक शक्तियां देने की वकालत की थी। पटेल कई मौकों पर केंद्रीय बैंक की भूमिका और शक्तियों को लेकर मुखर रहे हैं।

मार्च में उन्होंने कहा था कि आरबीआई का सार्वजनिक बैंकों पर नियामकीय प्राधिकार निजी बैंकों की तुलना में कमजोर है। उनका कहना था कि सार्वजनिक बैंकों के मामले में आरबीआई के साथ वित्त मंत्रालय भी निगरानी रखता है। पटेल ने कहा, 'दोहरे नियमन से सार्वजनिक बैंकों में एनपीए की समस्या बढ़ी है।' सरकार को पटेल का यह बयान पसंद नहीं आया था। खुद जेटली ने कहा था कि आरबीआई के समय पर सचेत नहीं होने से यह घोटाला हुआ।

जेटली ने कहा था कि नेताओं को गलती के लिए जवाबदेह माना जाता है लेकिन नियामकों की जवाबदेही नहीं होती है। इस संदर्भ में एक विश्लेषक ने कहा कि किसी भी धोखाधड़ी के बारे में ऐसी बातें कही जा सकती हैं लेकिन बैंकिंग नियामक के लिए बैंकिंग गतिविधि के हरेक कोने में मौजूद रहकर धोखाधड़ी को रोक पाना अव्यावहारिक है।

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